संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति-प्रकरण ] * राजा पद्मके भवनमें सरस्वती और लीलाका प्रवेश तथा राजाद्वारा उनका पूजन * १५१
थे। उनके उस भीषण कोलाहलसे वह नगर भयानक लग रहा था। तदनन्तर राजा विदूरथने अपने योद्धाओ-का तथा उन लोगोंका, जिनका देखते-देखते ही स्त्री-पुत्र आदि सर्वस्व स्वाहा हो गया था, इसलिये वे इधर-उधर दौड़ लगा रहे थे, करुण-क्रन्दन सुना। अहो ! यह तो सदाचारसे हीन महान् अनुचित कार्य हो रहा है, जो शस्त्रधारी शत्रुसैनिक राजरानियोंको भी पकड़ रहे हैं।
इसी बीचमें जैसे लक्ष्मी कमलकोशमें प्रविष्ट होती है, उसी तरह राजमहिषीने, जो यौवनके मदसे उन्मत्त हो रही थी, राजा आदिद्वारा अधिष्ठित उस गृहमें प्रवेश किया। उस समय वह हारके छिन्न-भिन्न हो जानेसे व्याकुल एवं भयसे घबरायी हुई थी। उसके पुष्पहार और वस्त्र जोर-जोरसे हिल रहे थे तथा सखियाँ और दासियाँ उसके पीछे-पीछे चल रही थीं, वहाँ पहुँचकर जैसे कोई अप्सरा संग्राममें संलग्न हुए देवराज इन्द्रसे निवेदन करे, उसी तरह उसकी एक सखी राजा विदूरथसे निवेदन करने लगी—'देव ! महारानी हम-लोगोंके साथ अन्तःपुरसे भागकर आपकी शरणमें आयी हैं—ठीक उसी तरह, जैसे झंझावातसे पीडित लता वृक्षका आश्रय ग्रहण करती है। राजन् ! जैसे महासागरकी लहरियाँ तटवर्ती वृक्षोंपर लिपटी हुई लताओंको अपने साथ समेट ले जाती हैं, उसी तरह अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित उन बलवान् शत्रुओंने आपकी अन्यान्य रानियोंका अपहरण कर लिया है। अचानक आ धमके हुए उन उद्दण्ड शत्रुओंने आँधीद्वारा नष्ट-भ्रष्ट किये गये बड़े-बड़े वृक्षोंकी भाँति अन्तःपुरके सभी संरक्षकोंको चकनाचूर कर दिया है। इस प्रकार हमलोगोंको जो यह विविध प्रकारकी विपत्तिने आ घेरा है, उसका सर्वथा निवारण करनेके लिये आपकी ही सामर्थ्य है।' यह सुनकर राजाने दोनो देवियोंकी ओर देखकर कहा—
'देवियो ! मै युद्धके लिये जाता हूँ, अब आप मुझे क्षमा करें ! अब मेरी यह भार्या आपलोगोंके चरणकमलों-की भ्रमरी बनेगी अर्थात् आपके चरणोंकी सेवा करेगी।'