भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 187

१५२ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

यों कहकर राजा विदूरथ, जिसके नेत्र क्रोधवश लाल हो गये थे, उसी प्रकार राजभवनसे बाहर निकला, जैसे मदमत्त गजराजद्वारा वनके छिन्न-भिन्न कर दिये जानेपर सिंह अपनी गुहासे बाहर निकला हो। तदनन्तर प्रबुद्ध लीलाने अपनी ही रूप-रेखाके तुल्य आकृतिवाली सुन्दरी लीलाको दर्पणमें प्रतिबिम्बित हुई-सी देखा और कहा।

प्रबुद्ध लीलाने पूछा—देवि ! किस कारणसे मैं यह हो गयी ? पहले मैं जो थी, वही मैं इस रूपमें कैसे स्थित हूँ ? इसका क्या रहस्य है ? यह मुझे बतलानेकी कृपा कीजिये। ये सभी मन्त्री आदि पुरवासी तथा सेना और सवारियोंसहित शूरवीर पूर्ववत् ही हैं। ये जैसे यहाँ स्थित हैं, वैसे ही वहाँ भी हैं। देवि ! जैसे दर्पणमें प्रतिबिम्बित वस्तु बाहर और भीतर दोनों ओर दीखती है, उसी तरह ये सभी यहाँ और वहाँ स्थित हैं—इसका क्या कारण है ? क्या वे सचेतन हैं ?

श्रीदेवीजीने कहा—लीले ! भीतर जैसा ज्ञान उद्भूत होता है, वैसा ही बाहर क्षणमात्रमें अनुभव होने लगता है। जैसे मन चित्तार्थता—स्वप्न आदिमें चित्तद्वारा अनुभूत जाग्रत्‌की स्वरूपताको प्राप्त हो जाता है, उसी तरह चेतन दृश्याकारताको प्राप्त हो जाता है। हृदयके अंदर उद्भूत पदार्थ बाह्य-से प्रतीत होते हैं। इस विषयमें स्वप्नदृष्ट पदार्थ ही प्रमाण हैं; क्योंकि हृदयके भीतर जो स्वप्नमें संकल्प-नगरका स्फुरण होता है, वह चेतनका विकास है। इस राजाके जिन मन्त्री आदिका जो अविरोध तथा सर्वार्थरूपसे अनुभव हो रहा है, इसका कारण यह है कि वे स्वप्नमें संकल्पित सैन्यकी भाँति चेतन सत्तात्मक होनेसे सद्रूप ही हैं। अथवा यदि यों कहें कि उत्तरकाल अर्थात् जाग्रदवस्थामें स्वप्नके विनाशी होनेके कारण वह असत् है तो ऐसा तो यह सारा जाग्रत्-जगत् ही है; क्योंकि स्वप्नमें जाग्रत् असत् है और जाग्रत्-कालमें स्वप्न असत् है। फिर जाग्रत्में कौन-सी विशेष सत्यता सिद्ध हुई ? अनघे !

इस प्रकार यह स्वप्न और जाग्रत्-जगत् न सत् है और न असत् ही। ये केवल भ्रान्तिरूपसे ही प्रतीत होते हैं; क्योंकि महाकल्पके अन्तमें, आज और अगले युगमें अर्थात् भूत, भविष्य और वर्तमान आदि तीनों कालोंमें भी जो कभी उस स्वरूपसे नहीं था, वही ब्रह्म है, अतः वही जगत् है। उस ब्रह्मस्वरूप जगत्‌में ये सृष्टि नामवाली भ्रान्तियाँ विकसित होती हैं। पर वास्तवमें विकसित-सी नहीं दीखतीं; क्योंकि जैसे महासागरमें लहरें उठती हैं, उसी प्रकार ये सृष्टियाँ परब्रह्ममें उत्पन्न हो-होकर पुनः आँधीमें घुले-मिले हुए धूलिकणोंकी भाँति उसी परब्रह्ममें विलीन हो जाती हैं। इसलिये जिसमें 'त्वम्' और 'अहम्' आदिका विभाग मिथ्या ही है तथा जो मृगतृष्णाके जलसमूहकी भाँति भ्रान्तिमय आभासित हो रहा है, उस जले हुए वस्त्रके भस्मके समान प्रपञ्चमें कौन-सी आस्था है ? इस सारे प्रपञ्चके शान्त होनेपर जो अवशिष्ट रहता है, वही ब्रह्म है। उस ब्रह्मसे पृथक् होनेपर यह दृश्य जगत् कभी भी सत्य नहीं है और ब्रह्मस्वरूप होनेके कारण असत्य भी नहीं है। तत्पश्चात् उसी तरहका अनुभव होनेके कारण यह स्पष्टरूपसे जीवभावको प्राप्त होता है। यह जगत् सत्य हो या असत्य, पर यह चिदाकाशमें विभासित हो रहा है।

(श्रीसरस्वतीजीने पुनः कहा)—जैसे राजारूप चिदाकाशमें सन्मयी प्रतिभा उदित होती है, उसी तरह उससे पूर्व होनेवाली सत्यसङ्कल्परूपा प्रतिभा अव्याकृत आकाशरूप ईश्वरमें उत्पन्न होती है। इसी तरह प्रतिभा-के प्रतिबिम्बसे उत्पन्न हुई यह लीला तुम्हारे-सरीखे शील, आचार, कुल और शरीरसे युक्त दीख रही है। सर्व-व्यापक ज्ञानवृत्तिरूपी दर्पणमें जैसी प्रतिभा प्रतिबिम्बित होती है, वह जहाँ जिस रूपमें उत्पन्न होती है, वहाँ निरन्तर उसी रूपमें प्रकट होती है। अन्तर्यामी ईश्वरकी जो प्रतिभा भीतर वर्तमान है, वही स्वयं बाहर भी कार्य