संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति-प्रकरण ] * राजा पद्मके भवनमें सरस्वती और लीलाका प्रवेश तथा राजाद्वारा उनका पूजन * १५३
करती है, इसलिये चिन्मय दर्पणमें प्रतिबिम्बित होनेके कारण यह तुम्हारे ही समान स्थित है । लीले ! इस निश्चयमें तुम ऐसा समझो कि यह आकाश, उसके भीतर भुवन, उसके अन्तर्गत पृथ्वी, उसपर यह तुम, मैं और राजा—यों जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह सब-का-सब ब्रह्मरूपसे मैं ही हूँ, इस कारण तुम स्वरूपमें स्थित होकर पूर्णरूपसे शान्त हो जाओ । तुम्हारा पति यह विदूरथ रणाङ्गणमें शरीरका त्याग करके उसी अन्तःपुरमें पहुँचकर राजा पद्मके रूपमें उत्पन्न होगा ।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं— रघुनन्दन ! देवीकी बात सुनकर उस नगरमें रहनेवाली लीला हाथ जोडकर देवीके आगे खड़ी हो गयी और भक्तिविनम्र होकर बोली ।
द्वितीय लीलाने कहा— देवेशि ! मैंने नित्य ही भगवती सरस्वती देवीकी अर्चा-पूजा की है और वे देवी रात्रिके समय स्वप्नमें मुझे दर्शन दिया करती हैं । अम्बिके ! उन देवीका जैसा आकार-प्रकार है, वैसी ही आप भी हैं । सुमुखि ! आप दीनोंपर करुणा करनेवाली हैं, अतः मुझे वर प्रदान कीजिये ।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं— श्रीराम ! लीलाके ऐसा कहनेपर भगवती सरस्वती उस समय उसके भक्तिपूर्वक किये गये ध्यान-पूजनका स्मरण करके प्रसन्न हो गयीं और उस नगरनिवासिनी लीलासे यों बोलीं ।
श्रीदेवीजीने कहा— वत्से ! जीवनपर्यन्त की गयी तुम्हारी अनन्यभक्तिसे, जो कभी भी शिथिल नहीं हुई, मैं परम संतुष्ट हूँ; अतः तुम मुझसे अपना मनोऽभिलषित वरदान ग्रहण करो ।
तब वह नगरनिवासिनी लीला बोली— देवि ! मेरे पतिदेव रणभूमिमें शरीरका परित्याग करके जहाँ स्थित होंगे, मैं भी इसी शरीरसे वहाँ उनकी पत्नी होऊँ ।
श्रीदेवीजीने कहा— पुत्रि ! तुमने चिरकालतक अनन्य-भक्तिभावसे पुष्प-धूप आदि प्रचुर पूजन-सामग्रीद्वारा मेरी निर्विघ्न पूजा की है, इसलिये 'एवमस्तु'—तुम्हारी कामना पूर्ण हो ।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं— राघव ! तदनन्तर जब उस वर-प्राप्तिसे तद्देशवासिनी लीला हर्षोत्फुल्ल हो रही थी, उसी समय पूर्व लीलाने, जिसका हृदय सन्देहके दोलेमें झूल रहा था, देवीसे कहा ।
पूर्व लीला बोली— ऐश्वर्यशालिनी देवि ! जो आपके सदृश सत्य कामना एवं सत्य संकल्पवाले हैं, अतएव जो ब्रह्मस्वरूप हो गये हैं, उनका सारा मनोरथ जब शीघ्र ही सिद्ध हो जाता है, तब यह बतलाइये कि आपने मुझे किसलिये इसी शरीरसे गिरिग्रामक नामवाले उस लोकान्तरमें नहीं पहुँचाया ?
श्रीदेवीजीने कहा— सुन्दरि ! मैं किसीका कुछ नहीं करती, बल्कि जीव स्वयं ही अपनी समस्त अभिलाषाओंका शीघ्र ही सम्पादन कर लेता है; क्योंकि प्रत्येक जीवमें जीवशक्तिस्वरूपा चेतनशक्ति वर्तमान है । इसलिये जिस-जिस जीवकी जो शक्ति जिस-जिस रूपमें प्रकट होती है, वह उसी-उसी रूपमें उस-उस जीवको सदा तदनुरूप फल प्रदान करती हुई-सी प्रतीत होती है । जिस समय