संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
तुम मेरी सम्यक् प्रकारसे आराधना कर रही थी, उस समय चिरकालतक तुम्हारे मनमें जो जीव-शक्ति उत्पन्न हुई थी, उसकी कामना थी कि यदि इसी जन्ममें मैं मुक्त हो जाती तो अच्छा होता । अतः उत्तम रूप-रंगवाली लीले ! उसी-उसी प्रकारसे मैंने तुम्हें भलीभाँति समझाया है और उसी युक्तिद्वारा तुम इस निर्मल भावको प्राप्त हुई हो। जब चिरकालतक मैंने तुम्हें इसी भावनासे ज्ञानोपदेश किया है, तभी तुम अपनी चेतनशक्तिके प्रभावसे सदाके लिये उसी अर्थको प्राप्त हुई हो; क्योंकि जिस जिसका चिरकालतक जैसा अपनी चेतनशक्तिका प्रयत्न होता है, वह समयानुसार उस-उसको वैसा ही फल प्रदान करता है। अपनी चेतनशक्ति ही तपस्या अथवा देवताका रूप धारण करके स्वच्छन्दरूपसे आकाशसे फल गिरनेकी भाँति फल देती है। अपनी ज्ञानशक्ति प्रयत्नके बिना कभी कुछ भी फल नहीं देती; इस कारण तुम्हारी जैसी अभिलाषा हो, शीघ्र ही तदनुरूप कार्य आरम्भ कर दो। तुम ऐसी धारणा कर लो कि चित्सत्ता ही सबमें अन्तरङ्गरूपसे व्याप्त है। वही विहित अथवा निषिद्ध जिस कर्मका विचार करती है और उसके लिये प्रयत्न करने लग जाती है, उसीकी फलश्री प्राप्त होती है। इसलिये जो पावन पद है, उसे जानकर तुम उसीमें स्थित हो जाओ।
(सर्ग ४१-४५)
राजा विदूरथका विशाल सेनाके साथ युद्धके लिये प्रयाण, युद्धारम्भ, लीलाके पूछनेपर सरस्वतीद्वारा राजा सिन्धुके विजयी होनेमें हेतु-कथन, विदूरथ और राजा सिन्धुके दिव्यास्त्रोंद्वारा किये गये युद्धका सविस्तर वर्णन, राजा विदूरथकी पराजय और देशपर राजा सिन्धुके अधिकारका कथन
श्रीरामजीने पूछा—मुने ! जब वे तीनों देवियाँ उस राजमहलके भीतर यों परस्पर वार्तालाप कर रही थीं, उस समय विदूरथने क्रोधावेशमें महलसे निकलकर क्या किया ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—वत्स राम ! जिस समय राजा विदूरथ अपने भवनसे बाहर निकला, उस समय वह नक्षत्रसमूहसे घिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति विशाल सैन्यदलसे परिवेष्टित था । उसका सारा शरीर कवच आदिसे सुरक्षित था । हार आदि आभूषण उसके शरीरकी शोभा बढ़ा रहे थे । वह जय-जयकारकी तुमुल ध्वनिके साथ देवराज इन्द्रके समान बाहर निकला । उस समय वह योद्धाओंको आदेश दे रहा था । मन्त्री व्यूह-रचना एवं जनपद-व्यवस्था-सम्बन्धी व्यवस्था उसे सुना रहे थे । वह वीरगणोंका निरीक्षण करता हुआ एक ऐसे रथपर आरूढ़ हुआ, जिसमें आठ घोड़े जुते थे । उत्तम जातिवाले उन अश्वोंकी गर्दन बड़ी सुहावनी थी । वे शुभलक्षणोंसे युक्त, फुर्तीले और एकहरे बदनके थे तथा अपनी हिनहिनाहटसे सारी दिशाओंको निनादित कर रहे थे । उस समय जिन्हें सरस्वती देवीने दिव्यदृष्टि प्रदान की थी, वे दोनों लीला नामवाली देवियाँ और वह राजकुमारी उस महायुद्धको देख रही थीं । उसे देखकर उनका हृदय विदीर्ण-सा हो रहा था । राजा विदूरथकी युद्ध-यात्राके पश्चात् शत्रु-सैनिकोंके बाणों एवं आयुधोंसे निकलता हुआ कट्कट् शब्द पूर्णरूपसे शान्त हो गया—ठीक उसी तरह, जैसे एकार्णवके जलप्रवाहोंसे वडवानल शान्त हो जाता है । उस समय राजा विदूरथ अपनी सेनाको धीरे-धीरे आगे बढ़ा रहे थे। उन्हें अपने तथा शत्रुपक्षके बलाबलका ज्ञान नहीं हो पाया था—इसी दशामें उन्होंने शत्रु-सेनामें प्रवेश किया ।
जिस समय समरभूमिमें दोनों सेनाओंकी भीषण मुठभेड़ हो रही थी, उसी समय दोनों लीलाओंने भगवती सरस्वतीसे पुनः प्रश्न किया ।
दोनों लीलाओंने पूछा—देवि ! यह बतलाइये कि आपके संतुष्ट होनेपर भी मेरे पतिदेव इस युद्धमें, जिसमेंसे