भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उत्पत्ति-प्रकरण] * राजा विदूरथका सेनाके साथ युद्धके लिये प्रयाण, युद्धारम्भ तथा विदूरथकी पराजय ~ १५५


गजराज भागे जा रहे हैं, अकस्मात् विजय क्यों नहीं प्राप्त कर रहे हैं ?

श्रीसरस्वतीजीने कहा—पुत्रि ! राजा विदूरथके शत्रु इस राजा सिन्धुने विजय-प्राप्तिकी कामनासे चिरकालतक मेरी आराधना की थी, परंतु भूपाल विदूरथकी आराधना विजयार्थ नहीं थी; इसलिये यह राजा सिन्धु ही विजयी होगा और विदूरथ पराजित हो जायगा । क्योंकि समस्त प्राणियोंके हृदयान्तर्गत ज्ञानवृत्तिरूपसे मै ही स्थित हूँ, अत. जो मुझको जिस समय जिस रूपसे प्रेरित करता है, मै शीघ्र ही उसके लिये उस समय वैसे ही फलका सम्पादन करती हूँ । बाले ! इस राजा विदूरथने 'मैं मुक्त हो जाऊँ' इसी भावनासे मुझ प्रतिभारूपिणीका ध्यान किया था, इस कारण यह मुक्त हो जायगा । और इसके शत्रु राजा सिन्धुने 'मैं स्वयं संग्राममें विजयी होऊँ' इस कामनासे मेरी पूजा की थी; इसलिये बाले ! विदूरथ भार्यारूपिणी तुम्हारे और इस लीलाके साथ समयानुसार उस शवस्वरूप देहको प्राप्त होकर मुक्त हो जायगा तथा इसका शत्रु राजा सिन्धु स्वयं उसे मारकर विजयश्रीसे सुशोभित हो भूतलपर राज्य करेगा ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! देवी सरस्वती यों कह ही रही थीं, तबतक भगवान् सूर्य उदयाचलपर आ पहुँचे, मानो वे जूझती हुई दोनो सेनाओंका आश्चर्यमय युद्ध देखना चाहते थे । उस समय जैसे द्युलोकमें आकाशके चिह्नभूत सूर्य और चन्द्रमा दिखायी देते हैं, उसी तरह जनसंहार हो जानेके कारण उस शून्य संग्रामभूमिमें राजा पद्म (विदूरथ) और राजा सिन्धुके प्रकाशमान रथ चलते हुए दीख रहे थे । उन दोनो रथोंमें चक्र, शूल, मुशुण्डी, ऋष्टि और प्रास आदि आयुध खचाखच भरे थे । उन रथोंके पीछे बहुसंख्यक शूरवीर योद्धा, जिनके सैनिक भयभीत हो गये थे, रणभूमिमें भालो, बाणो, धनुषो, शक्तियों, प्रासो, शङ्खओ और चमकते हुए चक्रोंकी भयंकर वृष्टि करते हुए चल रहे थे । इतनेमें ही प्रलयकालीन वायुद्वारा गिराये गये शिलाखण्डोकी तरह दोनों सेनाओंपर बाण गिरने लगे । उस समय राजा विदूरथ और राजा सिन्धुकी परस्पर ऐसी भयंकर मुठभेड़ हुई जिसे देखकर लोगोंको ऐसी आशङ्का होने लगी मानो प्रलयके लिये विशेषरूपसे बढ़े हुए दो महासागर परस्पर टकरा रहे हों ।

राजा विदूरथ अपने विपक्षी राजा सिन्धुको, जिसके कंधे ऊँचे थे, सामने उपस्थित पाकर मध्याह्नालिक सूर्यके दुस्सह आतपकी भाँति प्रचण्ड कोपसे भर गया । फिर तो उसने अपने धनुषको, जिसकी टंकारध्वनि चिरकालके लिये सारी दिशाओको निनादित कर देती थी, कानतक खींचा । उस समय ऐसा भयंकर शब्द हुआ, जैसे कल्पान्त-कालमें उठी हुई वायु मेरुगिरिके तटप्रान्तसे टकरा रही हो । राजा विदूरथका हस्तलाघव सराहनीय था; क्योंकि लोग देखते थे कि उसकी प्रत्यञ्चासे एक ही बाण छूटता है, परंतु वह आकाशमें पहुँचते-पहुँचते हजार हो जाता है और विपक्षियोंपर एक लाख होकर गिरता है । राजा सिन्धुकी भी शक्ति और फुर्ती विदूरथके ही समान थी । उन दोनोंको ऐसी धनुर्युद्ध-कुशलता वरदायक भगवान् विष्णुके वरप्रसादसे उपलब्ध हुई थी । तदनन्तर उन दोनोंके छोड़े हुए मुसल नामक बाणोसे, जिनकी आकृति मूसलकी-सी थी, आकाश आच्छादित हो गया । उन बाणोसे प्रलयकालीन वज्रोंकी गड़गड़ाहटके समान भीषण शब्द हो रहा था । युद्धस्थलमें राजा विदूरथके बाणसमूह वेगपूर्वक घरघर शब्द करते हुए राजा सिन्धुके सम्मुख उसी प्रकार बढ़ रहे थे, मानो आकाश-मार्गसे गिरते हुए गङ्गाके प्रवाह कलकलनाद करते हुए महासागरकी ओर जा रहे हो । परंतु राजा सिन्धुरूपी बड़वानलने अपने अगस्त्य-तुल्य बाणोकी ऊष्मासे विदूरथके उस बाण-महासागरको पी लिया—ठीक उसी तरह, जैसे महर्षि जहु गङ्गाजीको पी गये थे । तदनन्तर राजा सिन्धुने बाणोंकी उस वृष्टिको छिन्न-भिन्न करके स्वयं बाणोकी इतनी झड़ी लगायी कि आकाशमें सायकोका ही मेघमण्डल