संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
घिर आया। तब विदूरथने भी जैसे प्रलयकालीन वायु उमड़े हुए साधारण मेघको उड़ा देती है, उसी तरह अपने उत्तम सायकोंसे शीघ्र ही उस बाणरूपी मेघमण्डलको विध्वंस कर डाला। इस प्रकार वे दोनों भूपाल परस्पर बदला लेनेकी भावनासे एक-दूसरेको लक्ष्य बनाकर बाणोंकी वर्षा करते थे और एक-दूसरेके प्रहारको व्यर्थ कर देते थे।
तदनन्तर राजा सिन्धुने मोहनास्त्रका संधान किया। यह अस्त्र उसे किसी गन्धर्वके साथ मित्रता होनेके कारण प्राप्त हुआ था। उस मोहनास्त्रके प्रयोगसे विदूरथके अतिरिक्त शेष सभी सैनिक मूर्च्छित हो गये। उनके शस्त्रास्त्र और वस्त्र अस्त-व्यस्त हो गये, मुख और नेत्रोंमें उदासी छा गयी। उनकी बोलती बंद हो गयी और वे मृतक-तुल्य अथवा चित्रलिखित-से प्रतीत होने लगे। तब राजा विदूरथने प्रबोधास्त्र हाथमें लिया। फिर तो प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर जैसे कमलिनी विकसित हो जाती है, उसी तरह उस अस्त्रके प्रयोगसे सभी योद्धाओंकी मूर्च्छा जाती रही और वे उठ बैठे। तत्पश्चात् राजा सिन्धुने भयंकर नागास्त्रको, जो नागपाश-बन्धनद्वारा महान् कष्ट-दायक था, धनुषपर चढ़ाया। उसके संधानसे आकाश पर्वत-सरीखे विशालकाय नागोंसे व्याप्त हो गया। मृणालों-द्वारा सुशोभित हुई पोखरीकी तरह पृथ्वी श्वेत वर्णके सर्पोंसे विभूषित हो गयी। सारे पर्वत काले नागरूपी कम्बलोंसे सम्पन्न हो गये। ये सभी पदार्थ विषकी ऊष्मासे मलिन हो गये और वन तथा पर्वतोंकी विशालतासे युक्त पृथ्वी व्याकुल हो गयी। तब महान् अस्त्रोंके मर्मज्ञ विदूरथने भी गरुडास्त्रका प्रयोग किया। उस अस्त्रसे पर्वत-सदृश विशालकाय इतने गरुड प्रकट हुए, जिनसे सारी दिशाएँ भर गयीं। उनके सुनहरे पक्षोंकी चमकसे सभी दिशाएँ स्वर्णमय प्रतीत होने लगीं। उड़ते हुए उन गरुडोंके पंखसे पक्षधारी पर्वतोंकी उड़ानसे उत्पन्न हुए प्रलयकालीन वायुकी भाँति भयंकर आँधी प्रकट हो गयी। वे अपने श्वासवेगसे फुफकारते हुए नाग-समूहोंको अपनी ओर खींच लेते थे। उनकी घुरघुराहटकी तीव्र आवाज समुद्रपर्यन्त व्याप्त हो गयी। तत्पश्चात् राजा सिन्धुने तमोऽस्त्र प्रकट किया, जो अंधा बना देनेवाले अन्धकारका उत्पादक था। उससे भूगर्भका-सा घना अन्धकार फैल गया। उस समय सारी प्रजाएँ अन्धकूपमें गिरे हुएकी भाँति प्रतीत होने लगीं और कल्पान्तकी तरह सभी दिशाओंके व्यवहार एकदम बंद हो गये। तब मन्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ विदूरथने किसी गुप्त मन्त्रणाकी अपेक्षा किये बिना ही ब्रह्माण्ड-मण्डपमें दीपककी तरह प्रकाश फैलानेवाले सूर्यास्त्रकी सृष्टि करके सबको सचेष्ट कर दिया। उस समय सूर्यरूपी अगस्त्यने अपनी किरणोंसे उस प्रकट हुए अन्धकारके महासागरको पी लिया—ठीक उसी तरह, जैसे निर्मल शरद-ऋतु काले बादलोंको पी जाती है। यह देखकर राजा सिन्धु क्रोधसे भर गया। फिर तो उसने उसी क्षण अत्यन्त भीषण राक्षसास्त्र प्रकट किया, जिससे मन्त्रोच्चारण करते ही बाण निकलने लगते थे। उस राक्षसास्त्रका प्रयोग करते ही पातालनिवासी दिग्गजोंके फूत्कारसे विक्षुब्ध हुए महासागरकी भाँति बहुत-से भयंकर एवं क्रूर स्वभाववाले वनराक्षस सभी दिशाओंसे प्रकट हो गये। इसी बीचमें लीलाके स्वामी राजा विदूरथने उस युद्धस्थलमें नारायणास्त्रका प्रयोग किया, जो दुष्ट प्राणियोंके निवारण करनेमें सिद्धहस्त है। उस अस्त्रराजके प्रकट होते ही राक्षसोंके अस्त्रसमूह पूर्णरूपसे शान्त हो गये, जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकार विलीन हो जाता है। तदनन्तर राजा सिन्धुने वायव्यास्त्रकी सृष्टि की, जिसने आकाशमण्डलको प्रचण्ड वायुसे भर दिया। तब महान् अस्त्रवेत्ता विदूरथने पार्वतास्त्र चलाया, जो मानो मेघ-जलसहित आकाशको भी आत्मसात् कर लेनेके लिये उद्यत था। तदुपारान्त राजा सिन्धुने उदीप्त वज्रास्त्र प्रकट किया, जिससे झुंड-के-झुंड वज्र निकलकर रणभूमिमें विचरने लगे। वे ईंधनको भस्मसात् कर लेनेवाली आगकी भाँति विशाल पर्वतरूपी अन्धकारको पी जाते थे