भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

उत्पत्ति-प्रकरण ] * राजा पद्मके भवनमें सरस्वती और लीलाका प्रवेश तथा राजाद्वारा उनका पूजन * १५३

करती है, इसलिये चिन्मय दर्पणमें प्रतिबिम्बित होनेके कारण यह तुम्हारे ही समान स्थित है । लीले ! इस निश्चयमें तुम ऐसा समझो कि यह आकाश, उसके भीतर भुवन, उसके अन्तर्गत पृथ्वी, उसपर यह तुम, मैं और राजा—यों जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह सब-का-सब ब्रह्मरूपसे मैं ही हूँ, इस कारण तुम स्वरूपमें स्थित होकर पूर्णरूपसे शान्त हो जाओ । तुम्हारा पति यह विदूरथ रणाङ्गणमें शरीरका त्याग करके उसी अन्तःपुरमें पहुँचकर राजा पद्मके रूपमें उत्पन्न होगा ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं— रघुनन्दन ! देवीकी बात सुनकर उस नगरमें रहनेवाली लीला हाथ जोडकर देवीके आगे खड़ी हो गयी और भक्तिविनम्र होकर बोली ।

द्वितीय लीलाने कहा— देवेशि ! मैंने नित्य ही भगवती सरस्वती देवीकी अर्चा-पूजा की है और वे देवी रात्रिके समय स्वप्नमें मुझे दर्शन दिया करती हैं । अम्बिके ! उन देवीका जैसा आकार-प्रकार है, वैसी ही आप भी हैं । सुमुखि ! आप दीनोंपर करुणा करनेवाली हैं, अतः मुझे वर प्रदान कीजिये ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं— श्रीराम ! लीलाके ऐसा कहनेपर भगवती सरस्वती उस समय उसके भक्तिपूर्वक किये गये ध्यान-पूजनका स्मरण करके प्रसन्न हो गयीं और उस नगरनिवासिनी लीलासे यों बोलीं ।

श्रीदेवीजीने कहा— वत्से ! जीवनपर्यन्त की गयी तुम्हारी अनन्यभक्तिसे, जो कभी भी शिथिल नहीं हुई, मैं परम संतुष्ट हूँ; अतः तुम मुझसे अपना मनोऽभिलषित वरदान ग्रहण करो ।

तब वह नगरनिवासिनी लीला बोली— देवि ! मेरे पतिदेव रणभूमिमें शरीरका परित्याग करके जहाँ स्थित होंगे, मैं भी इसी शरीरसे वहाँ उनकी पत्नी होऊँ ।

श्रीदेवीजीने कहा— पुत्रि ! तुमने चिरकालतक अनन्य-भक्तिभावसे पुष्प-धूप आदि प्रचुर पूजन-सामग्रीद्वारा मेरी निर्विघ्न पूजा की है, इसलिये 'एवमस्तु'—तुम्हारी कामना पूर्ण हो ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं— राघव ! तदनन्तर जब उस वर-प्राप्तिसे तद्देशवासिनी लीला हर्षोत्फुल्ल हो रही थी, उसी समय पूर्व लीलाने, जिसका हृदय सन्देहके दोलेमें झूल रहा था, देवीसे कहा ।

पूर्व लीला बोली— ऐश्वर्यशालिनी देवि ! जो आपके सदृश सत्य कामना एवं सत्य संकल्पवाले हैं, अतएव जो ब्रह्मस्वरूप हो गये हैं, उनका सारा मनोरथ जब शीघ्र ही सिद्ध हो जाता है, तब यह बतलाइये कि आपने मुझे किसलिये इसी शरीरसे गिरिग्रामक नामवाले उस लोकान्तरमें नहीं पहुँचाया ?

श्रीदेवीजीने कहा— सुन्दरि ! मैं किसीका कुछ नहीं करती, बल्कि जीव स्वयं ही अपनी समस्त अभिलाषाओंका शीघ्र ही सम्पादन कर लेता है; क्योंकि प्रत्येक जीवमें जीवशक्तिस्वरूपा चेतनशक्ति वर्तमान है । इसलिये जिस-जिस जीवकी जो शक्ति जिस-जिस रूपमें प्रकट होती है, वह उसी-उसी रूपमें उस-उस जीवको सदा तदनुरूप फल प्रदान करती हुई-सी प्रतीत होती है । जिस समय

१५४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

तुम मेरी सम्यक् प्रकारसे आराधना कर रही थी, उस समय चिरकालतक तुम्हारे मनमें जो जीव-शक्ति उत्पन्न हुई थी, उसकी कामना थी कि यदि इसी जन्ममें मैं मुक्त हो जाती तो अच्छा होता । अतः उत्तम रूप-रंगवाली लीले ! उसी-उसी प्रकारसे मैंने तुम्हें भलीभाँति समझाया है और उसी युक्तिद्वारा तुम इस निर्मल भावको प्राप्त हुई हो। जब चिरकालतक मैंने तुम्हें इसी भावनासे ज्ञानोपदेश किया है, तभी तुम अपनी चेतनशक्तिके प्रभावसे सदाके लिये उसी अर्थको प्राप्त हुई हो; क्योंकि जिस जिसका चिरकालतक जैसा अपनी चेतनशक्तिका प्रयत्न होता है, वह समयानुसार उस-उसको वैसा ही फल प्रदान करता है। अपनी चेतनशक्ति ही तपस्या अथवा देवताका रूप धारण करके स्वच्छन्दरूपसे आकाशसे फल गिरनेकी भाँति फल देती है। अपनी ज्ञानशक्ति प्रयत्नके बिना कभी कुछ भी फल नहीं देती; इस कारण तुम्हारी जैसी अभिलाषा हो, शीघ्र ही तदनुरूप कार्य आरम्भ कर दो। तुम ऐसी धारणा कर लो कि चित्सत्ता ही सबमें अन्तरङ्गरूपसे व्याप्त है। वही विहित अथवा निषिद्ध जिस कर्मका विचार करती है और उसके लिये प्रयत्न करने लग जाती है, उसीकी फलश्री प्राप्त होती है। इसलिये जो पावन पद है, उसे जानकर तुम उसीमें स्थित हो जाओ।

(सर्ग ४१-४५)


राजा विदूरथका विशाल सेनाके साथ युद्धके लिये प्रयाण, युद्धारम्भ, लीलाके पूछनेपर सरस्वतीद्वारा राजा सिन्धुके विजयी होनेमें हेतु-कथन, विदूरथ और राजा सिन्धुके दिव्यास्त्रोंद्वारा किये गये युद्धका सविस्तर वर्णन, राजा विदूरथकी पराजय और देशपर राजा सिन्धुके अधिकारका कथन

श्रीरामजीने पूछा—मुने ! जब वे तीनों देवियाँ उस राजमहलके भीतर यों परस्पर वार्तालाप कर रही थीं, उस समय विदूरथने क्रोधावेशमें महलसे निकलकर क्या किया ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—वत्स राम ! जिस समय राजा विदूरथ अपने भवनसे बाहर निकला, उस समय वह नक्षत्रसमूहसे घिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति विशाल सैन्यदलसे परिवेष्टित था । उसका सारा शरीर कवच आदिसे सुरक्षित था । हार आदि आभूषण उसके शरीरकी शोभा बढ़ा रहे थे । वह जय-जयकारकी तुमुल ध्वनिके साथ देवराज इन्द्रके समान बाहर निकला । उस समय वह योद्धाओंको आदेश दे रहा था । मन्त्री व्यूह-रचना एवं जनपद-व्यवस्था-सम्बन्धी व्यवस्था उसे सुना रहे थे । वह वीरगणोंका निरीक्षण करता हुआ एक ऐसे रथपर आरूढ़ हुआ, जिसमें आठ घोड़े जुते थे । उत्तम जातिवाले उन अश्वोंकी गर्दन बड़ी सुहावनी थी । वे शुभलक्षणोंसे युक्त, फुर्तीले और एकहरे बदनके थे तथा अपनी हिनहिनाहटसे सारी दिशाओंको निनादित कर रहे थे । उस समय जिन्हें सरस्वती देवीने दिव्यदृष्टि प्रदान की थी, वे दोनों लीला नामवाली देवियाँ और वह राजकुमारी उस महायुद्धको देख रही थीं । उसे देखकर उनका हृदय विदीर्ण-सा हो रहा था । राजा विदूरथकी युद्ध-यात्राके पश्चात् शत्रु-सैनिकोंके बाणों एवं आयुधोंसे निकलता हुआ कट्कट् शब्द पूर्णरूपसे शान्त हो गया—ठीक उसी तरह, जैसे एकार्णवके जलप्रवाहोंसे वडवानल शान्त हो जाता है । उस समय राजा विदूरथ अपनी सेनाको धीरे-धीरे आगे बढ़ा रहे थे। उन्हें अपने तथा शत्रुपक्षके बलाबलका ज्ञान नहीं हो पाया था—इसी दशामें उन्होंने शत्रु-सेनामें प्रवेश किया ।

जिस समय समरभूमिमें दोनों सेनाओंकी भीषण मुठभेड़ हो रही थी, उसी समय दोनों लीलाओंने भगवती सरस्वतीसे पुनः प्रश्न किया ।

दोनों लीलाओंने पूछा—देवि ! यह बतलाइये कि आपके संतुष्ट होनेपर भी मेरे पतिदेव इस युद्धमें, जिसमेंसे

उत्पत्ति-प्रकरण] * राजा विदूरथका सेनाके साथ युद्धके लिये प्रयाण, युद्धारम्भ तथा विदूरथकी पराजय ~ १५५


गजराज भागे जा रहे हैं, अकस्मात् विजय क्यों नहीं प्राप्त कर रहे हैं ?

श्रीसरस्वतीजीने कहा—पुत्रि ! राजा विदूरथके शत्रु इस राजा सिन्धुने विजय-प्राप्तिकी कामनासे चिरकालतक मेरी आराधना की थी, परंतु भूपाल विदूरथकी आराधना विजयार्थ नहीं थी; इसलिये यह राजा सिन्धु ही विजयी होगा और विदूरथ पराजित हो जायगा । क्योंकि समस्त प्राणियोंके हृदयान्तर्गत ज्ञानवृत्तिरूपसे मै ही स्थित हूँ, अत. जो मुझको जिस समय जिस रूपसे प्रेरित करता है, मै शीघ्र ही उसके लिये उस समय वैसे ही फलका सम्पादन करती हूँ । बाले ! इस राजा विदूरथने 'मैं मुक्त हो जाऊँ' इसी भावनासे मुझ प्रतिभारूपिणीका ध्यान किया था, इस कारण यह मुक्त हो जायगा । और इसके शत्रु राजा सिन्धुने 'मैं स्वयं संग्राममें विजयी होऊँ' इस कामनासे मेरी पूजा की थी; इसलिये बाले ! विदूरथ भार्यारूपिणी तुम्हारे और इस लीलाके साथ समयानुसार उस शवस्वरूप देहको प्राप्त होकर मुक्त हो जायगा तथा इसका शत्रु राजा सिन्धु स्वयं उसे मारकर विजयश्रीसे सुशोभित हो भूतलपर राज्य करेगा ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! देवी सरस्वती यों कह ही रही थीं, तबतक भगवान् सूर्य उदयाचलपर आ पहुँचे, मानो वे जूझती हुई दोनो सेनाओंका आश्चर्यमय युद्ध देखना चाहते थे । उस समय जैसे द्युलोकमें आकाशके चिह्नभूत सूर्य और चन्द्रमा दिखायी देते हैं, उसी तरह जनसंहार हो जानेके कारण उस शून्य संग्रामभूमिमें राजा पद्म (विदूरथ) और राजा सिन्धुके प्रकाशमान रथ चलते हुए दीख रहे थे । उन दोनो रथोंमें चक्र, शूल, मुशुण्डी, ऋष्टि और प्रास आदि आयुध खचाखच भरे थे । उन रथोंके पीछे बहुसंख्यक शूरवीर योद्धा, जिनके सैनिक भयभीत हो गये थे, रणभूमिमें भालो, बाणो, धनुषो, शक्तियों, प्रासो, शङ्खओ और चमकते हुए चक्रोंकी भयंकर वृष्टि करते हुए चल रहे थे । इतनेमें ही प्रलयकालीन वायुद्वारा गिराये गये शिलाखण्डोकी तरह दोनों सेनाओंपर बाण गिरने लगे । उस समय राजा विदूरथ और राजा सिन्धुकी परस्पर ऐसी भयंकर मुठभेड़ हुई जिसे देखकर लोगोंको ऐसी आशङ्का होने लगी मानो प्रलयके लिये विशेषरूपसे बढ़े हुए दो महासागर परस्पर टकरा रहे हों ।

राजा विदूरथ अपने विपक्षी राजा सिन्धुको, जिसके कंधे ऊँचे थे, सामने उपस्थित पाकर मध्याह्नालिक सूर्यके दुस्सह आतपकी भाँति प्रचण्ड कोपसे भर गया । फिर तो उसने अपने धनुषको, जिसकी टंकारध्वनि चिरकालके लिये सारी दिशाओको निनादित कर देती थी, कानतक खींचा । उस समय ऐसा भयंकर शब्द हुआ, जैसे कल्पान्त-कालमें उठी हुई वायु मेरुगिरिके तटप्रान्तसे टकरा रही हो । राजा विदूरथका हस्तलाघव सराहनीय था; क्योंकि लोग देखते थे कि उसकी प्रत्यञ्चासे एक ही बाण छूटता है, परंतु वह आकाशमें पहुँचते-पहुँचते हजार हो जाता है और विपक्षियोंपर एक लाख होकर गिरता है । राजा सिन्धुकी भी शक्ति और फुर्ती विदूरथके ही समान थी । उन दोनोंको ऐसी धनुर्युद्ध-कुशलता वरदायक भगवान् विष्णुके वरप्रसादसे उपलब्ध हुई थी । तदनन्तर उन दोनोंके छोड़े हुए मुसल नामक बाणोसे, जिनकी आकृति मूसलकी-सी थी, आकाश आच्छादित हो गया । उन बाणोसे प्रलयकालीन वज्रोंकी गड़गड़ाहटके समान भीषण शब्द हो रहा था । युद्धस्थलमें राजा विदूरथके बाणसमूह वेगपूर्वक घरघर शब्द करते हुए राजा सिन्धुके सम्मुख उसी प्रकार बढ़ रहे थे, मानो आकाश-मार्गसे गिरते हुए गङ्गाके प्रवाह कलकलनाद करते हुए महासागरकी ओर जा रहे हो । परंतु राजा सिन्धुरूपी बड़वानलने अपने अगस्त्य-तुल्य बाणोकी ऊष्मासे विदूरथके उस बाण-महासागरको पी लिया—ठीक उसी तरह, जैसे महर्षि जहु गङ्गाजीको पी गये थे । तदनन्तर राजा सिन्धुने बाणोंकी उस वृष्टिको छिन्न-भिन्न करके स्वयं बाणोकी इतनी झड़ी लगायी कि आकाशमें सायकोका ही मेघमण्डल

१५६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


घिर आया। तब विदूरथने भी जैसे प्रलयकालीन वायु उमड़े हुए साधारण मेघको उड़ा देती है, उसी तरह अपने उत्तम सायकोंसे शीघ्र ही उस बाणरूपी मेघमण्डलको विध्वंस कर डाला। इस प्रकार वे दोनों भूपाल परस्पर बदला लेनेकी भावनासे एक-दूसरेको लक्ष्य बनाकर बाणोंकी वर्षा करते थे और एक-दूसरेके प्रहारको व्यर्थ कर देते थे।

तदनन्तर राजा सिन्धुने मोहनास्त्रका संधान किया। यह अस्त्र उसे किसी गन्धर्वके साथ मित्रता होनेके कारण प्राप्त हुआ था। उस मोहनास्त्रके प्रयोगसे विदूरथके अतिरिक्त शेष सभी सैनिक मूर्च्छित हो गये। उनके शस्त्रास्त्र और वस्त्र अस्त-व्यस्त हो गये, मुख और नेत्रोंमें उदासी छा गयी। उनकी बोलती बंद हो गयी और वे मृतक-तुल्य अथवा चित्रलिखित-से प्रतीत होने लगे। तब राजा विदूरथने प्रबोधास्त्र हाथमें लिया। फिर तो प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर जैसे कमलिनी विकसित हो जाती है, उसी तरह उस अस्त्रके प्रयोगसे सभी योद्धाओंकी मूर्च्छा जाती रही और वे उठ बैठे। तत्पश्चात् राजा सिन्धुने भयंकर नागास्त्रको, जो नागपाश-बन्धनद्वारा महान् कष्ट-दायक था, धनुषपर चढ़ाया। उसके संधानसे आकाश पर्वत-सरीखे विशालकाय नागोंसे व्याप्त हो गया। मृणालों-द्वारा सुशोभित हुई पोखरीकी तरह पृथ्वी श्वेत वर्णके सर्पोंसे विभूषित हो गयी। सारे पर्वत काले नागरूपी कम्बलोंसे सम्पन्न हो गये। ये सभी पदार्थ विषकी ऊष्मासे मलिन हो गये और वन तथा पर्वतोंकी विशालतासे युक्त पृथ्वी व्याकुल हो गयी। तब महान् अस्त्रोंके मर्मज्ञ विदूरथने भी गरुडास्त्रका प्रयोग किया। उस अस्त्रसे पर्वत-सदृश विशालकाय इतने गरुड प्रकट हुए, जिनसे सारी दिशाएँ भर गयीं। उनके सुनहरे पक्षोंकी चमकसे सभी दिशाएँ स्वर्णमय प्रतीत होने लगीं। उड़ते हुए उन गरुडोंके पंखसे पक्षधारी पर्वतोंकी उड़ानसे उत्पन्न हुए प्रलयकालीन वायुकी भाँति भयंकर आँधी प्रकट हो गयी। वे अपने श्वासवेगसे फुफकारते हुए नाग-समूहोंको अपनी ओर खींच लेते थे। उनकी घुरघुराहटकी तीव्र आवाज समुद्रपर्यन्त व्याप्त हो गयी। तत्पश्चात् राजा सिन्धुने तमोऽस्त्र प्रकट किया, जो अंधा बना देनेवाले अन्धकारका उत्पादक था। उससे भूगर्भका-सा घना अन्धकार फैल गया। उस समय सारी प्रजाएँ अन्धकूपमें गिरे हुएकी भाँति प्रतीत होने लगीं और कल्पान्तकी तरह सभी दिशाओंके व्यवहार एकदम बंद हो गये। तब मन्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ विदूरथने किसी गुप्त मन्त्रणाकी अपेक्षा किये बिना ही ब्रह्माण्ड-मण्डपमें दीपककी तरह प्रकाश फैलानेवाले सूर्यास्त्रकी सृष्टि करके सबको सचेष्ट कर दिया। उस समय सूर्यरूपी अगस्त्यने अपनी किरणोंसे उस प्रकट हुए अन्धकारके महासागरको पी लिया—ठीक उसी तरह, जैसे निर्मल शरद-ऋतु काले बादलोंको पी जाती है। यह देखकर राजा सिन्धु क्रोधसे भर गया। फिर तो उसने उसी क्षण अत्यन्त भीषण राक्षसास्त्र प्रकट किया, जिससे मन्त्रोच्चारण करते ही बाण निकलने लगते थे। उस राक्षसास्त्रका प्रयोग करते ही पातालनिवासी दिग्गजोंके फूत्कारसे विक्षुब्ध हुए महासागरकी भाँति बहुत-से भयंकर एवं क्रूर स्वभाववाले वनराक्षस सभी दिशाओंसे प्रकट हो गये। इसी बीचमें लीलाके स्वामी राजा विदूरथने उस युद्धस्थलमें नारायणास्त्रका प्रयोग किया, जो दुष्ट प्राणियोंके निवारण करनेमें सिद्धहस्त है। उस अस्त्रराजके प्रकट होते ही राक्षसोंके अस्त्रसमूह पूर्णरूपसे शान्त हो गये, जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकार विलीन हो जाता है। तदनन्तर राजा सिन्धुने वायव्यास्त्रकी सृष्टि की, जिसने आकाशमण्डलको प्रचण्ड वायुसे भर दिया। तब महान् अस्त्रवेत्ता विदूरथने पार्वतास्त्र चलाया, जो मानो मेघ-जलसहित आकाशको भी आत्मसात् कर लेनेके लिये उद्यत था। तदुपारान्त राजा सिन्धुने उदीप्त वज्रास्त्र प्रकट किया, जिससे झुंड-के-झुंड वज्र निकलकर रणभूमिमें विचरने लगे। वे ईंधनको भस्मसात् कर लेनेवाली आगकी भाँति विशाल पर्वतरूपी अन्धकारको पी जाते थे

उत्पत्ति-प्रकरण] * राजा विदूरथका सेनाके साथ युद्धके लिये प्रयाण, युद्धारम्भ तथा विदूरथकी पराजय * १५७

तथा अपने करोड़ों चोंचोंसे पर्वतोंके शिखरोंको काट-काट- कर उसी प्रकार भूतलपर गिरा देते थे, जैसे प्रचण्ड वायु फलोंको गिराकर पृथ्वीपर बिछा देती है । तब विदूरथने वज्रास्त्रको शान्त करनेके लिये ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया । फिर तो ब्रह्मास्त्र और वज्रास्त्र दोनों एक साथ ही शान्त हो गये।

इस प्रकार जब वह भयकर संग्राम चल ही रहा था, उसी समय प्रतिभाशालीयोंमें सर्वश्रेष्ठ, महान् उदार एवं उत्कृष्ट धैर्यशाली राजा सिन्धुने विपक्षियोंकी सारी सेनाका विनाश और अपनी सेनाकी पीड़ा-शान्तिके लिये एकमात्र वैष्णवास्त्रका स्मरण किया, जो दिव्यास्त्रोंका राजा, परम ऐश्वर्यशाली एवं कालरुद्रके समान संहारकारी था । उस वैष्णवास्त्रसे अभिमन्त्रित करके राजा सिन्धुने जो बाण चलाया, उसके फलके अग्रभागसे उल्मुक आदि निकलने लगे । उससे निकली हुई प्रकाशमान चक्रोंकी पङ्क्तियोंने दिशाओंको सैकड़ों सूर्योंसे युक्त-सा बना दिया । पङ्किरूपमें सम्मुख दौड़ती हुई गदाएँ आकाशमें सैकड़ों बाँसोंकी भाँति प्रतीत होती थीं । सौ धारवाले वज्रसमूहोंने आकाशको तृणराशिसे आच्छादित-सा कर दिया। पद्माकार पट्टिशोंकी कतारें आकाशमें कटे हुए वृक्षों-सी दीख रही थीं । तीक्ष्ण- धारवाले बाणोंकी पङ्क्तियाँ ऐसी जान पड़ती थीं, जैसे आकाशमें पुष्पजाल बिछा हो। काली आकृतिवाले खड्गोंकी कतारें नभोमण्डलको पत्र-समूहोंसे व्याप्त-सा कर रही थीं । तब विपक्षी राजा विदूरथने भी उस वैष्णवास्त्रकी शान्तिके लिये वैष्णवास्त्रका ही प्रयोग किया, जो शत्रुके पराक्रमके अनुरूप ही था। उससे भी बाण, शक्ति, गदा, प्रास, पट्टिश आदि आयुधरूपी जलसे परिपूर्ण बहुत-सी शस्त्रास्त्रोंकी सरिताएँ प्रकट हुईं, जिन्होंने पूर्वप्रयुक्त वैष्णवास्त्रसे उद्भूत हथियारोंको नष्ट कर दिया । उन शस्त्रास्त्रपूर्ण नदियोंका आकाशमें ही ऐसा भीषण युद्ध प्रारम्भ हुआ, जो द्युलोक और पृथ्वीके अवकाशका विनाश करनेवाला तथा बड़े-बड़े कुलपर्वतोंको विदीर्ण कर देनेवाला था । जैसे मेरे आयुधोंने विश्वामित्रके अस्त्रोंका निवारण किया था, उसी तरह परस्पर जूझते हुए उन दोनों वैष्णवास्त्रोंकी धारावाहिक बाण-वृष्टिने शस्त्र-समूहोंको काट डाला और उन अस्त्रोंसे प्रकट हुए वज्रोंने अकाट्य पर्वतोंको भी जर्जर कर दिया । इस प्रकार दोनों राजाओंके वे अस्त्र पराक्रमशाली दो सुभटोंकी भाँति क्षणभरतक परस्पर अत्यन्त भयंकर युद्ध करके शान्त हो गये ।

तत्पश्चात् राजा सिन्धु अपने रथको छोड़कर पृथ्वीपर उतर पड़ा और ढाल-तलवारसे लैस हो गया । फिर तो उसने पलक मारते-मारते बड़ी फुर्तीसे अपने शत्रु राजा विदूरथके रथके घोड़ोंके खुरोंको मृणालकी भाँति तलवारसे काट गिराया । अब तो राजा विदूरथ भी रथहीन हो गये, अतः उन्होंने भी ढाल-तलवार उठा ली । उस समय उन दोनोंके आयुध एक-से थे और दोनोंका उत्साह भी समान था; अतः वे परस्पर वार करनेके लिये पैंतरे बदलने लगे। परस्पर प्रहार करते हुए उन दोनोंके खड्ग आरेके समान हो गये थे । इसी बीच राजा विदूरथने खड्ग छोड़कर एक शक्ति हाथमें ली और उसे शत्रुपर चला दिया । वह शक्ति मथे जाते हुए समुद्रके जलकी तरह घर्घर्शब्दसे युक्त अतएव महान् उत्पातकी सूचना देनेवाले वज्रके सदृश थी । वह अविच्छिन्नरूपसे आयी और राजा सिन्धुके वक्षःस्थलपर गिरी; परंतु उस शक्तिके आघातसे राजा सिन्धुकी मृत्यु नहीं हुई ।

तब उस देशकी लीलाने पूर्वलीलासे कहा—'देवि ! बड़े कष्टकी बात है, क्योंकि जैसे देवराज इन्द्र शत्रु का विनाश करनेके लिये वज्रका सहारा लेते हैं, उसी तरह यह राजा सिन्धु प्रहार करनेके लिये मुसलास्त्रकी ओर देख रहा है; परंतु मेरे पतिदेव मुसलधारी राजा सिन्धुको चकमा देकर बड़ी फुर्तीसे सकुशल दूसरे रथपर चढ़ गये और वेगपूर्वक दूर हट गये हैं । फिर भी हाय ! धिक्कार है, महान् कष्ट आ पड़ा। इस राजा सिन्धुने अत्यन्त वेगसे बाण बरसाकर मेरे स्वामीके रथको तहस-नहस करके उन्हें भी व्यथित कर दिया और अब यह अपने वज्र-सरीखे

१५८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

बाणोंद्वारा उनके स्थूल मस्तकको विदीर्ण करके उन्हें भूतपर गिराना ही चाहता है। देखो न, बडी कठिनाईसे होशमें आनेपर जब मेरे पतिदेव सारथिद्वारा लाये गये दूसरे रथपर चढ रहे थे, उसी समय इसने उनके कधेको काट दिया, जिससे वे रक्तके फौवारे छोड़ रहे हैं । हाय ! हाय ! अब तो और भी कष्टकी बात हुई,इस राजा सिन्धुने अपने खङ्गकी तीखी धारसे मेरे पतिदेवकी दोनों पिंडलियोको उसी प्रकार फाड़ डाला, जैसे आरेसे वृक्ष चीरा जाता है । हाय ! अब तो मैं बुरी तरह मारी गयी; क्योंकि मेरे पतिके दोनों घुटने भी मृणालकी तरह काट डाले गये ।' यों कहकर और पतिकी उस अवस्थापर दृष्टिपात करके पति-प्रेम और भयसे आतुर हुई वह लीला फरसेसे कटी हुई लताकी भाँति मूर्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी । विदूरथ यद्यपि जानुरहित हो गये थे, तथापि वे शत्रुपर प्रहार कर ही रहे थे । उसी अवस्थामें वे जड़से कटे हुए वृक्षकी तरह रथसे नीचे गिरना ही चाहते थे, तबतक सारथि उन्हे रथद्वारा संग्रामभूमिसे दूर हटा ले गया ।

जब ये भागे जा रहे थे, उस समय क्रूर-हृदय राजा सिन्धुने इनके गलेपर अस्त्र प्रहार किया, जिससे इनका आधा गला कट गया । फिर भी राजा सिन्धु इनका पीछा कर ही रहा था । तबतक राजा विदूरथ जैसे सूर्यकी किरणें कमलकोशमें घुस जाती है, उसी तरह रथद्वारा भागकर अपने महलमें जा पहुँचे; किंतु राजा सिन्धु उस राज-भवनमें प्रविष्ट न हो सका, क्योंकि वह महल सरस्वती देवीके प्रभावसे सुरक्षित था । वहाँ पहुँचकर सारथिने राजा विदूरथको, जिसके वस्त्र, कवच और शरीर खङ्गसे काटे गये गलेके छिद्रसे बुद्बुद ध्वनिके साथ निकलती हुई रक्तधाराओंसे सन गये थे, महलके भीतर ले जाकर भगवती सरस्वतीके समक्ष मरणशय्यापर लिटा दिया । इधर विपक्षी राजा सिन्धु महलमें प्रवेश न कर सकनेके कारण लौट गया ।

रघुनन्दन ! राजा विदूरथके मृत-तुल्य हो जानेपर जब 'रणभूमिमें प्रतिद्वन्द्वी राजाके हाथसे राजा विदूरथ मार डाले गये, राजा मारे गये' ऐसी खबर फैल गयी, तब सारा राष्ट्र भयभीत हो गया । उस समय विदूरथके राष्ट्रकी ऐसी दशा हो गयी थी कि वह शत्रु-राष्ट्रकी साधारण एवं सैनिक जनताके विजयोल्लासके शब्दसे मुखरित हो रहा था । उसमे स्वामियोसे रहित हो जानेके कारण हाथी, घोडे और वीर सैनिक टकराकर साधारण जनताको धराशायी कर रहे थे। कोषगृहके किंवाडोके तोडे जानेके कारण उठा हुआ घर्घर शब्द चारों ओर गूँज रहा था। शत्रुपक्षका मन्त्रिमण्डल राजा सिन्धुके पुत्रका अभिषेक-कार्य सम्पन्न करनेके लिये आदेश देनेमें तत्पर था। राजा सिन्धुकी रानियाँ नगरकी शोभा देखनेके लिये झरोखों एवं अन्य बनाये गये छिद्रोंपर बैठ रही थीं । अभिषिक्त हुए राजा सिन्धुके पुत्रका जय-जयकारके सैकडों उच्च घोषोके साथ-साथ प्रबल प्रभाव फैला हुआ था। स्वपक्षीय असंख्य नरेशोने राजा सिन्धुद्वारा बनायी गयी राष्ट्रमर्यादाको नतमस्तक होकर स्वीकार कर लिया था ।

उत्पत्ति-प्रकरण] राजा विदूरथकी मृत्यु, संसारकी असत्यता और द्वितीय लीलाकी वासनारूपताका वर्णन * १५९

तदनन्तर 'भूमण्डलके एकच्छत्र सम्राट् राजा सिन्धुकी जय हो!' यों घोषणा करते हुए लोग प्रत्येक नगरमें भेरियाँ बजाने लगे। पुत्रके राज्याभिषेकके पश्चात् राजा सिन्धुने, जो विजयी होनेके कारण उन्नत-मस्तक था, युगान्तके समय जगत्‌की सृष्टि करनेके लिये प्रकट हुए दूसरे मनुकी भाँति प्रजाकी नयी व्यवस्थाके हेतु राजधानीमें प्रवेश किया। तत्पश्चात् राजा सिन्धुके नगरमें दसों दिशाओंसे हाथी-घोड़ोंके रूपमें भेंट आने लगी। मन्त्रियोंने तत्काल ही प्रत्येक दिशाओंके सामन्त राजाओंके पास राजकीय नियम, चिह्न और आदेश भेज दिये। फिर तो जैसे मन्थन-कालमें आवर्तोंके कारण क्षुब्ध हुआ क्षीरसागर मन्दराचलके निकाल लिये जानेपर तुरंत ही प्रकृतिस्थ हो गया था, उसी तरह अराजकताके कारण विक्षुब्ध हुआ सारा राष्ट्र दसों दिशाओंसहित शीघ्र ही शान्त हो गया।

(सर्ग ४६-५१)


राजा विदूरथकी मृत्यु, संसारकी असत्यता और द्वितीय लीलाकी वासनारूपताका वर्णन, लीलाके गमनमार्ग और स्वामी पद्मकी प्राप्तिका कथन, पदार्थोंकी नियति, मरणक्रम, भोग और कर्म, गुण एवं आचारके अनुसार आयुके मानका वर्णन, आदि-सृष्टिसे लेकर जीवकी विचित्र गतियों तथा ईश्वरकी स्थितिका निरूपण

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! इसी बीचमें मूर्च्छित होकर सामने पड़े हुए अपने स्वामीको, जिनका श्वासमात्र ही अवशेष रह गया था, देखकर लीलाने सरस्वतीसे कहा—'अम्बिके ! ये मेरे पतिदेव अब यहाँ अपनी देह-का उत्सर्ग करनेके लिये उद्यत हैं।'

श्रीसरस्वतीजीने कहा—लीले ! इस प्रकार महान् उद्योग-से परिपूर्ण, राष्ट्र-विप्लवकारी और परम विचित्र व्यवसायोंसे युक्त इस संग्रामके आरम्भ होने, चलने और समाप्त होनेपर यह राष्ट्र अथवा भूतल न तो कहीं कुछ भी उत्पन्न हुआ है और न नष्ट ही हुआ है; क्योंकि यह जगत् तो स्वप्नात्मक है। अनघे ! पूर्वोक्त गिरिग्राम-निवासी ब्राह्मणके घरके भीतर स्थित राजा पद्मके शवके निकटवर्ती आकाशमें वर्तमान अन्तःपुरके भीतर तुम्हारे पतिका यह भूतलरूप राष्ट्र प्रतीत हो रहा है। पुनः विन्ध्याद्रि-के ग्राममें वसिष्ठनामक ब्राह्मणके घरके अंदर यह राष्ट्रसहित ब्रह्माण्ड स्थित है। उसी ब्राह्मणके घरमें शवयुक्त गेह-जगत् वर्तमान है। उस शवयुक्त गेह-जगत्‌के मध्यमें इस गेह-जगत्-का अस्तित्व है। यो यह त्रिजगत्, जो महान् व्यवसायोंसे युक्त है, भ्रमरूप ही है तथा गिरिग्रामरूपी देहके मध्यभागमें स्थित आकाशकोशमें यह सागरसहित पृथ्वी दृष्टिगोचर हो रही है और तुमसे, मुझसे, इस लीलासे एवं इस विदूरथसे संयुक्त यह चेतन परमात्मा ही विकसित हो रहा है। इसलिये तुम उत्पत्ति-विनाशरहित उस परमपदरूप परमात्माको जानो। वह स्वयंप्रकाश, परम शान्त और निर्विकार है तथा मण्डपगृहके भीतर अपने चिन्मात्र स्वभावके कारण उदित हुए अपने आत्मा-में जगत्-रूपसे आभासित हो रहा है। यदि भ्रमका द्रष्टा ही न रहे तो भ्रममें भ्रमता कैसे होगी। अतः भ्रमकी सत्ता है ही नहीं। जो कुछ है, वह अविनाशी परमपदरूप परमात्मा ही है। उस परमात्माको तुम ऐसे समझो कि वह उत्पत्ति-विनाशरहित, स्वयंप्रकाश, शान्त, आदिरूप और निर्विकार होते हुए भी जगत्रूपसे प्रतीत हो रहा है। स्वप्नावस्थामें देहके अंदर देखे गये महापुरकी भाँति मेरु आदि पर्वत-समुदायद्वारा उपलक्षित यह सारा दृश्यवर्ग शून्यात्मकरूप ज्ञानमात्र ही है, इसमें स्थूलरूपता कुछ भी नहीं है। शुभे ! यह राजा पद्म जिस लोकमें शवरूपसे वर्तमान है, तुम्हारी यह सपत्नी लीला वहाँ पहले ही पहुँच गयी है। यह लीला तुम्हारे

१६० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ ]


समक्ष ज्यों ही मूर्छित हुई त्यों ही तुम्हारे पति राजा पद्मके शवके निकट जा पहुँची है।

लीलाने पूछा—देवि ! यह पहले ही वहाँ पहुँचकर देहधारिणी कैसे हो गयी ? इसके मेरे सपत्नी-भावको प्राप्त होनेमें क्या कारण है ? तथा राजा पद्मके उस उत्तम राजमहलके जो निवासी हैं, वे इसे किस रूपमें देखते हैं और इसे क्या कहते हैं ?—यह सब मुझे संक्षेपसे बतलाइये।

श्रीदेवीजीने कहा—लीले ! तुमने मुझसे जैसा प्रश्न किया है, तदनुसार मैं सारी घटना तुमसे संक्षेपमें वर्णन करती हूँ; सुनो। यह दूसरी लीलाके रूपमें वर्तमान तुम्हारा ही वृत्तान्त है, जो तुम्हारी शङ्काओंका निर्णायक है। इससे मरण-परलोकगमन आदि भी, जिनका प्रत्यक्षीकरण होना कठिन है, तुम्हारे दृष्टिगोचर हो जायँगे। यह जो नगरादिरूपसे दृष्टिगोचर होनेवाला जगन्मय भ्रम है, उस अत्यन्त विस्तृत भ्रमको तुम्हारा पति यह राजा पद्म उसी शवयुक्त गृहमें देखता है। यहाँतक कि यह सामने घटित हुआ युद्ध भ्रमयुद्ध है। यह लीला भी भ्रान्तिस्वरूप ही है। यह जन-समुदाय जन्मादिरहित आत्मा है। यहाँकी मृत्यु भी भ्रान्तिसे ही दीख पड़ती है। इस प्रकार यह संसार भ्रमात्मक है। इसी भ्रमक्रमसे लीला इस राजा पद्मकी प्रेयसी भार्या हुई है। वरारोहे ! तुम और यह दोनों सुन्दरियाँ भी स्वप्नमात्र ही हो। जिस प्रकार इस राजाकी तुम दोनों सुन्दरी प्रियतमाएँ स्वप्नमात्र हो, उसी तरह तुम दोनोंका पति यह राजा और स्वयं मैं भी स्वप्नमात्र ही हूँ। इसी तरह जगत्की यह सारी शोभा भी भ्रमपूर्ण ही है और यहाँका दृश्यवर्ग भ्रममात्र कहा जाता है। इसी तरह यह लीला, तुम, यह संसारस्थिति, यह राजा पद्म और मैं—ये सबके सब परमात्माके सर्वव्यापक होनेके कारण उसी परमात्मामें सत्यरूपसे स्थित हैं। अतः महाचिद्घनकी स्थितिके सर्वात्मक होनेके कारण ये राजा आदि और हमलोग यथा-परस्पर एक-दूसरेके द्वारा प्रेरित होनेके कारण इस रूपमें परिणत हो गये हैं। जब इस लीलाके लिये पद्मकी मनोवासना जाग्रत् हुई, उसी समय यह तुम्हारे-सरीखे आकार-प्रकार धारण करके चैतन्यरूप चमत्कारमें प्रवृत्त हो गयी तथा तुम्हारे पतिदेवने अपनी मृत्युके अनन्तर शीघ्र ही इसे अपने सामने उपस्थित देखा; क्योंकि जिस समय चित्त वासनाभ्यासवश आधिभौतिक पदार्थोंका स्वप्नमें अनुभव करता है, उस समय उस अनुभवके कारण तब यह दृश्यवर्ग सत्य-सा प्रतीत होता है; वस्तुतः यह मिथ्या कल्पनामात्र ही; परंतु जब चित्त इस भौतिक जगत्के पदार्थोंका सत्यरूपसे अनुभव नहीं करता अथवा असत् समझता है, उस समय तदनुरूप दृढ़ वासनासे उसके मिथ्यात्वका निर्णय हो जाता है।

ये दोनों स्त्री-पुरुष जब स्मरणानुकूल मूर्च्छावस्थाको प्राप्त हुए, उसी समय इन्होंने पूर्ववासनाके जाग्रत् हो जानेके कारण अपने हृदयमें ऐसा अनुभव किया कि 'ये हमारे पिता हैं, ये हमारी माताएँ हैं। यह हमारा देश है। यह हमारी सम्पत्ति है। यह हमारा कर्म है। पूर्वजन्ममें हमने ऐसा ही कर्म किया था। इस प्रकार हम दोनोंका विवाह हुआ और इस रूपमें हम दोनो एकताको प्राप्त हुए।' इनका वह कल्पित जनसमूह भी उसी अवस्थामें सत्यताको प्राप्त हुआ। जैसे स्वप्नावस्थामें देखा हुआ पदार्थ सत्य-सा प्रतीत होता है, उसी तरह यहाँ भी यह दृष्टान्त है। लीले ! इस लीलाने 'मै विधवा न होऊँ' ऐसी भावनासे भावित होकर मेरी आराधना की थी तथा मैंने भी उसे मनोऽनुकूल वर प्रदान किया था। इसी कारण निश्चयही यह बालिका यहाँ पहले ही मृत्युको प्राप्त हुई है। तुम लोग व्यष्टिचेतन हो और मैं तुमलोगोंकी समष्टिचेतन-स्वरूपा कुलदेवी हूँ, अतः सदा पूजनीय हूँ। मैं अपने आप ही सब कुछ करती हूँ। जब इस लीलाके जीवने इसके शरीरसे उत्क्रमण करना चाहा, उसी क्षण उसने

उत्पत्ति-प्रकरण] * राजा विदूरथकी मृत्यु, संसारकी असत्यता और द्वितीय लीलाकी वासणारूपताका वर्णन * १६१

प्राणवायुके रूपमें सूक्ष्मशरीर धारण कर लिया और मन- द्वारा चलायमान हो मुखछिद्रसे निकलकर इस देहका परित्याग कर दिया । तदनन्तर मरणानुकूल मूर्च्छाके उपरान्त जीवात्मारूपसे स्थित इस लीलाने इसी घरके आकाशमें बुद्धिमें संकल्पित पदार्थोंको देखा । फिर यह भावनावश पूर्वदेहकी स्मृति हो जानेसे स्वप्नकी तरह ब्रह्माण्डमण्डलके भीतर जाकर अपने पतिसे संयुक्त हो गयी ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! तदनन्तर यह लीला, जिसे सरस्वतीद्वारा वर उपलब्ध हो चुका था, इसी वासनामय शरीरसे अपने पति राजा पद्मसे मिलनेके लिये आकाशमार्गसे ऊपरके लोकोंमें जानेको उद्यत हुई; उस समय पतिमिलनके सुखका विचार करके यह प्रबल प्रेमभाव- से संयुक्त हो आनन्दपूर्वक उड़ चली । वहाँ पहुँचकर इसे इसकी प्यारी कुमारी कन्या, जिसे सरस्वती देवीने ही वहाँ भेजा था, प्राप्त हुई, मानो वह लीलाके संकल्परूपी महान् दर्पणसे निकलकर आगे खड़ी हो गयी हो ।

कुमारीने कहा—सरस्वती देवीकी सहेली ! तुम्हारा स्वागत है। मैं तुम्हारी कन्या हूँ । सुन्दरि ! तुम्हारी ही प्रतीक्षा करती हुई मैं यहाँ आकाशमार्गमें खड़ी हूँ ।

तब लीलाने कहा—कमलनयनी देवि ! तुम मुझे स्वामीके समीप ले चलो ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तब वह कुमारी 'मातः ! आओ, हम दोनों वहीं चल रही हैं'—यों कहकर लीलाके आगे होकर आकाशमें मार्गप्रदर्शन करने लगी । तत्पश्चात् वह लीला उसके पीछे-पीछे प्रस्थित हुई । आगे बढ़नेपर वह मेघमार्गको लाँघकर वायुमार्गमें प्रविष्ट हुई । फिर वहाँसे चलकर सूर्यमार्गसे निकलती हुई नक्षत्रमार्गमें गयी । उसे भी पार करके ब्रह्माण्ड-कपालमें जा पहुँची । वहाँ जानेपर, अपना चित्तमात्र ही जिसका शरीर है, वह लीला अपने हृदयमें यों अनुभव करने लगी कि निश्चय ही यह सारा दृश्य अपनी कल्पनाके स्वभावसे उत्पन्न हुआ भ्रम ही है । तदनन्तर ब्रह्माण्डके उस पार पहुँचकर वह जलादि आवरणोंको लाँघती हुई आगे बढ़नेपर महान् चेतनाकाशके मध्यमें प्रविष्ट हुई । वह चेतनाकाश इतना विस्तृत है कि यदि अत्यन्त वेगशाली गरुड़ भी उसके चारों ओर चक्कर लगायें तो सैकड़ों करोड़ कल्पोंमें भी उसके ओर-छोरका पता नहीं लगा सकते । जैसे महान् वनमें फलोंकी गणना नहीं हो सकती, उसी तरह उस चेतनाकाशमें लाखों क्या, असंख्य ब्रह्माण्ड हैं, जो परस्पर एक-दूसरेसे अलक्षित हैं। उन्हीं- मेंसे एक ब्रह्माण्डको, जो सामने उपस्थित एवं विस्तृत आवरणसे आवेष्टित था, वेधकर वह लीला उसके भीतर प्रविष्ट हुई—ठीक उसी तरह, जैसे कीड़ा बेरके फलमें छेद करके उसके भीतर घुस जाता है । तदनन्तर भूमण्डलमें राजा पद्मके राज्यान्तर्गत उसके नगरमें पहुँचकर उस मण्डपमें प्रवेश करके वह राजाके शवके निकट स्थित हुई । इतनेमें ही वह कुमारी सुन्दरी लीलाकी आँखोंसे ओझल हो गयी । जैसे पूर्ण ज्ञान हो जानेपर माया विनष्ट हो जाती है, उसी तरह वह भी कहीं चली

६२* अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

यी। तदुपरान्त लीला शत्रुरूपी अपने पतिके मुखको देखकर अपनी प्रतिभाके प्रभावसे इस सत्यको समझ गयी कि 'ये मेरे पतिदेव संग्राममें राजा सिन्धुके हाथों मारे गये और अब इन वीर-लोकोंको प्राप्त होकर सुखपूर्वक सो रहे हैं। मैं भी इस प्रकार श्रीदेवीकी कृपासे सशरीर यहाँ आ पहुँची हूँ, अतः मेरे समान धन्य दूसरी कोई स्त्री नहीं है।' यों भलीभाँति विचारकर लीला अपने हाथमें एक सुन्दर चँवर लेकर डुलाने लगी।

श्रीदेवीजीने कहा—लीले! वह राजा, वह वासनामयी लीला और उसके वे सभी भृत्य परस्पर पति-पत्नी एवं स्वामी-सेवकके भावके अनुकूल ही एक-दूसरेको देखते हैं—जैसे 'यह मेरी स्वाभाविक भार्या है। यह मेरी स्वाभाविक सखी है। यह मेरी स्वाभाविक रानी है और यह मेरा स्वाभाविक नौकर है।' परंतु इस आश्चर्यमय वृत्तान्तको पूर्णरूपसे केवल तुम, मैं और यह लीला—ये तीन ही जान सकेंगी। अन्य किसीके लिये भी इसका जानना असम्भव है। इसलिये जो ज्ञातव्य वस्तुका ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं अथवा जिन्होंने परम धर्मका आश्रय ग्रहण कर लिया है, वे ही आतिवाहिक अर्थात् ब्रह्मादि लोकोंको प्राप्त होते हैं। दूसरोंके लिये वह दुर्लभ है। महाप्रलयके अवसरपर जब सभी पदार्थोंका विनाश हो जाता है, उस समय केवल अनन्त चेतनाकाशस्वरूप शान्त सद्ब्रह्म ही शेष रहता है और जीवात्मा चेतनरूप होनेके कारण 'मैं तेजःस्वरूप सद्ब्रह्मका अंश हूँ' यों अनुभव करता है, जैसे तुम स्वप्नावस्थामें आकाशगमन आदिका अनुभव करती हो। तदनन्तर तेजोंऽशरूप वह जीवात्मा स्वयं ही अपनेमें स्थूलत्व लाभ करता है। फिर वह स्थूलत्व ही यह ब्रह्माण्ड कहा जाता है, जो असत्य होते हुए भी सत्य-सा प्रतीत होता है। उस ब्रह्माण्डके अन्तर्गत स्थित वह ब्रह्म यों समझता है कि 'यह ब्रह्मा मैं ही हूँ।' तब फिर वह अपने-आप मनोराज्यकी सृष्टि करता है। वही मनोराज्य यह जगत् है। उस प्रथम सृष्टिमें जो संकल्प-वृत्तियाँ जहाँ जिस रूपमें विकसित हुईं, वे वहाँ उसी रूपमें आज भी निश्चल भावसे स्थित हैं। प्रलयकालमें भी विश्वरूप परमात्माको सम्पूर्ण वस्तुओंसे शून्य कहना युक्त नहीं। भला, सुवर्ण कटक-कुण्डल आदि स्थानोंको छोड़कर कैसे रह सकता है। अर्थात् जैसे सुवर्ण कटकादिमें ओतप्रोत है, उसी तरह परमात्मा समस्त पदार्थोंमें व्याप्त है।

यद्यपि पृथ्वी आदि दृश्य-प्रपञ्च आकाशरूप है, तथापि सृष्टिके प्रारम्भमें जो जहाँ जिस रूपमें विकसित हुआ, वह आजतक भी वहाँ उसी रूपमें वर्तमान है। अपनी स्थितिसे विचलित होनेमें समर्थ न हो सका। वस्तुतः तो सृष्टिके आदिमें यह जगत् उत्पन्न ही नहीं हुआ था। यह जो कुछ अनुभव हो रहा है वह तो चिदाकाशरूप जीवात्माके संकल्पका विकास है। इसे स्वप्नकालमें घटित हुए स्त्रीप्रसङ्गकी भाँति कल्पित ही समझना चाहिये। सृष्टिके आदिमें चिदाकाशस्वरूप जीवात्मा आकाशका संकल्प करनेके कारण आकाशरूपताको और कालका संकल्प करनेके कारण कालरूपताको प्राप्त होता है।

उत्पत्ति-प्रकरण] ⁠राजा विदूरथकी मृत्यु, संसारकी असत्यता और द्वितीय लीलाकी वासनारूपताका वर्णन⁠ १६३

जैसे स्वप्नमें पुरुष अपनेमें ही जलताका दर्शन करता है, उसी तरह जीवात्मा जलका संकल्प करनेके कारण जलवत् स्थित होता है। स्वप्नकी भाँति जीवात्मा उस-उस रूपको प्राप्त होता है और जैसा होता है, वैसा ही वह ज्यों-का-त्यों स्थित रहता है; क्योंकि चेतनके चमत्कार अर्थात् मायाकी चतुरतासे यह प्रपञ्च असत् होते हुए भी सत्-सा दीख पड़ता है। जैसे स्वप्न, कल्पना और ध्यानमें आयी हुई वस्तुएँ असत् होती हैं, उसी तरह आकाशत्व, जलत्व, पृथिवीत्व, अग्नित्व और वायुत्व—ये सभी असत् हैं—ऐसा चेतन स्वयं अपने अंदर अनुभव करता है। अब मृत्युके पश्चात् कर्मफलके अनुभव करनेका जो क्रम है, उसे सम्पूर्ण संशयोंकी शान्तिके लिये सुनो। वह मरनेपर कल्याणकारी होता है। जगत्में अपने कर्मोंकी देश, काल, क्रिया और द्रव्यजनित शुद्धि और अशुद्धि ही मनुष्योंकी आयुके अधिक और न्यून होनेमें कारण होती हैं। अपने कर्मरूप धर्मका ह्रास होनेपर मनुष्योंकी आयु क्षीण हो जाती है और उस धर्मके बढ़नेपर आयुकी वृद्धि होती है। बाल्यावस्थामें मृत्यु प्रदान करनेवाले कर्मोंको करनेसे बालक, युवावस्थामें मृत्युदायक कर्मोंसे नौजवान और बुढ़ापेमें मृत्युप्रद कर्मोंके करनेसे वृद्ध मृत्युको प्राप्त होता है। जो अपने धर्मका शास्त्रानुकूल आरम्भ करके पीछे उसका अनुष्ठान करता रहता है, वह श्रीमान् पुरुष शास्त्रवर्णित आयुका भागी होता है। यों अपने कर्मोंके अनुसार ही जीवको अन्तिम दशा प्राप्त होती है और उस मरणासन्न अवस्थाको प्राप्त हुआ जीव मर्मघातिनी वेदनाओंका प्रत्यक्ष अनुभव करता है।

प्रबुद्ध लीलाने पूछा—चन्द्रवदनी देवि ! मरण सुखरूप है अथवा दुःखरूप ? और मरनेके बाद फिर क्या होता है ? इस प्रकार मरणका वृत्तान्त मुझसे संक्षेपमें कहिये।

श्रीदेवीजीने कहा—लीले ! शरीरान्तके समय मुमूर्षु पुरुष तीन प्रकारके होते हैं—मूर्ख, धारणाभ्यासी और युक्तिमान् । इनमें धारणाभ्यासी दृढतापूर्वक धारणाका अभ्यास करके शरीरको छोड़कर सुखपूर्वक प्रयाण करता है। उसी प्रकार युक्तिमान् भी सुखपूर्वक ही गमन करता है; परंतु जिसने न तो धारणाका अभ्यास किया है और न युक्ति ही प्राप्त की है, वह मूर्ख पुरुष अपने मृत्युसमयमें विवश होकर दुःखको प्राप्त होता है। वह विषयी पुरुष वासनाके आवेशसे विवशताका अनुभव करता हुआ जड़से कटे हुए कमलकी तरह अत्यन्त दीनताको प्राप्त हो जाता है। जिसकी बुद्धि शास्त्राभ्यासद्वारा संस्कृत नहीं है एवं जो दुष्टोंकी संगतिको सेवन करता है, वह मरनेपर अग्निमें गिरे हुए जीवकी भाँति अन्तर्दाहका अनुभव करता है। जब उस अज्ञानी पुरुषके कण्ठसे घुरघुराहटकी आवाज निकलने लगती है, आँखोंकी पुतलियाँ उलट जाती हैं, शरीरका रंग विकृत हो जाता है, उस समय उसकी बड़ी दयनीय दशा हो जाती है। उसकी आँखोंके सामने घना अन्धकार छा जाता है, जिससे उसे कुछ सूझ नहीं पड़ता। बोलनेमें असमर्थ होनेके कारण वह स्वयं जड़वत् हो जाता है। जैसे सूर्यके अस्ताचलका आश्रय लेनेपर क्रमशः प्रकाशकी मन्दताके कारण दिशाएँ धुँधली हो जाती हैं, उसी तरह उसकी सारी इन्द्रियोंकी शक्तियाँ क्षीण हो जानेके कारण वे अपने-अपने विषयोंको ग्रहण करनेमें असमर्थ हो जाती हैं। विशेषरूपसे मोहके वशीभूत हो जानेसे उसके मनकी कल्पनाशक्ति नष्ट हो जाती है, जिससे वह अविवेकवश मोहके अगाध सागरमें डूबता-उतराता रहता है। ज्यों ही उसे थोड़ी सी मूर्च्छा हुई, त्यों ही प्राणवायुकी गति बंद हो जाती है और जब सभी प्राणोंकी क्रिया रुक जाती है, तब उसे घोर मूर्च्छा आ घेरती है। इस प्रकार परस्पर एक-दूसरेके सहयोगसे पुष्टताको प्राप्त हुए मोह, संवेदन और भ्रमसे जीव पाषाणवत् जड़ताको प्राप्त हो जाता है। सृष्टिके प्रारम्भसे ही यह नियम चला आ रहा है।

प्रबुद्ध लीलाने पूछा—देवि ! यद्यपि यह शरीर आठ

१६४* अविच्छिन्नसंविदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

अङ्गों (सिर, दो हाथ, दो चरण, गुह्यस्थान, नाभि और हृदय) से सम्पन्न है तो भी इसे व्यथा, विमोह, मूर्च्छा, भ्रम, व्याधि और अचेतनता—ये सब कष्ट प्राप्त होते हैं। इसका क्या कारण है ?

श्रीदेवीजीने कहा—भद्रे ! स्पन्दनशक्ति-सम्पन्न ईश्वरने सृष्टिके आदिमें ही सुख-दुःखादि-प्रारब्धभोगरूप कर्मका इस रूपमें विधान कर दिया है कि मदंशभूत जीवको उसकी आयुके इस-इस समयमें उसके कर्मानुसार इतने कालतक भोगने योग्य इस प्रकारका सुख-दुःख प्राप्त होगा। जिस समय नाड़ियोंमें प्रविष्ट हुई वायु बाहर नहीं निकलती और निकली हुई उनमें प्रवेश नहीं करती, उस समय उनका स्पन्दन रुक जाता है। तब नाडीशून्य हो जानेके कारण प्राणीकी मृत्यु हो जाती है। जब वायु न प्रवेश करती है और न बाहर ही निकलती, तब शरीरसे नाड़ियोंके वियुक्त हो जानेके कारण लोग यों कहने लगते हैं कि 'यह मर गया।'

ज्ञानवृत्तिका वेदनरूप स्वभाव बाधारहित है, इसलिये जन्म-मरण उस स्वाभाविक ज्ञानवृत्तिसे पृथक् नहीं हैं। (अर्थात् जबतक मनुष्यमें अविद्या रहेगी, तबतक उसे जन्म-मरणसे छुटकारा नहीं मिल सकता; क्योंकि ये उसके लिये स्वाभाविक ही हैं। केवल मुक्ति होनेपर ही उनसे छुटकारा मिलता है।) जैसे लंबी लताके बीच-बीचमें गाँठें होती हैं, उसी तरह चेतन सत्ताके भी मध्य-मध्यमें जन्म-मरण होते हैं। वस्तुतः तो चेतन पुरुष न कभी जन्मता है और न कभी मरता है। पुरुष स्वप्नकालके सम्भ्रमकी भाँति केवल भ्रमसे ही इन जन्म-मरणादिको देखता है; क्योंकि चेतनामात्र ही तो पुरुष है; फिर वह कब और कहाँ नष्ट हो सकता है। यदि पुरुष (जीवात्मा) को चेतनसे अतिरिक्त मानें तो बताओ, दूसरा कौन पुरुष हो सकता है ? अतः चेतनामात्र ही पुरुष है—यही बात ठीक है। भला, बताओ तो सही—क्या आजतक इस संसारमें किसीने किसीके चेतनको किसी प्रकार मरा हुआ देखा है ?

अरे ! यह तो सरासर असम्भव है; क्योंकि लाखों शरीर मरते देखे जाते हैं और चेतन अविनाशी ही बना रहता है। यों वास्तवमें न तो कोई मरता है और न कोई जन्म ही लेता है। केवल जीव वासनारूपी आवर्तके गड्डोंमें गोते लगाता रहता है। जगद्भयसे भीत होकर जीव जब अभ्यासद्वारा भ्रमवश प्रतीत होते हुए जगत्-प्रपञ्चको 'यह वास्तवमें हुआ ही नहीं है'—यों सम्यक् रूपसे समझ लेता है, तब वह पूर्णतया वासनाओंसे रहित होकर विमुक्त हो जाता है। इस प्रकार विमुक्त आत्मस्वरूप ही यहाँ सत्य वस्तु है। इसके अतिरिक्त सब असत् है।

प्रबुद्ध लीलाने पूछा—देवेशि ! प्राणी जिस प्रकार मरता है और फिर वह जैसे पैदा होता है, उस प्रसङ्गको ज्ञानकी वृद्धिके लिये आप पुनः मुझसे विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।

श्रीदेवीजीने कहा—लीले ! नाड़ियोंकी गति रुक जानेपर जब प्राणी प्राणवायुओंकी विपरीत स्थितिको प्राप्त होता है, तब उसकी चेतना शान्त-सी हो जाती है। इसीको मरण कहते हैं। वास्तवमें चेतन सर्वथा शुद्ध और नित्य है। उसकी न तो उत्पत्ति होती है और न उसका विनाश ही होता है। वह स्थावर, जंगम, आकाश, पर्वत, अग्नि और वायु—सभीमें स्थित है। केवल प्राणवायुकी गति अवरुद्ध हो जानेसे जब शरीरकी चेष्टा पूर्णरूपसे शान्त हो जाती है, तब यह शरीर, जिसका दूसरा नाम 'जड' है, 'मृत' कहा जाता है। जब यह शरीर शवरूपमें परिवर्तित हो जाता है और प्राणवायु अपने कारणरूप महावायुमें विलीन हो जाती है, तब वासनारहित चेतन अपने आत्मतत्त्वमें स्थित हो जाता है। फिर पुनर्जन्मको बीजभूत वासनासे युक्त एवं सूक्ष्म शरीरवाला वह व्यष्टिचेतन 'जीव' नामसे पुकारा जाता है। शरीरके मरनेके बाद लौकिक व्यवहार करनेवाले लोग उस जीवको 'प्रेत' शब्दसे पुकारते हैं और चेतन गन्ध मिली हुई वायुके समान

उत्पत्ति-प्रकरण] * राजा विदूरथकी मृत्यु, संसारकी असत्यता और द्वितीय लीलाकी वासनारूपताका वर्णन * १६५

वासनाओंसे संयुक्त हो जाता है। जब वह जीव इस शरीरादि दृश्यका परित्याग करके देहान्तरका दर्शन करनेके लिये उत्सुक होता है, उस समय उसकी स्वप्न एवं मनोराज्यकी भाँति नाना आकृतियाँ हो जाती हैं। फिर उसी प्रदेशके अंदर वह पूर्वजन्मकी तरह स्मरणशक्तिसे युक्त हो जाता है और तभी मरणकालकी मूर्च्छाके पश्चात् वह अन्य शरीरको देखने लगता है।

लीले ! मरनेके बाद जीवको जो प्रेत कहा जाता है, वे प्रेत छः प्रकारके होते हैं। उनके इस भेदको सुनो— साधारण पापी, मध्यम पापी, स्थूल पापी, सामान्य धर्मवाले, मध्यम धर्मवाले और उत्तम धर्मात्मा। इनमेंसे किसीके दो भेद और किसीके तीन भेद भी होते हैं। कोई पाषाणतुल्य हृदयवाला एवं अत्यन्त मूढ़ महापातकी अपने अन्तःकरणमें एक वर्षतक स्मृति-मूर्च्छाका अनुभव करता है। तत्पश्चात् समयानुसार चेतनाको प्राप्त होकर वासनारूपी स्त्रीके उदरसे उत्पन्न हुए अक्षय नारकीय दुःखोंका चिरकालतक अनुभव करके एक महान् दुःखसे दूसरे दुःखको प्राप्त होता हुआ सैकड़ों योनियोंका भोग करता है। तब कभी स्वप्न-सम्भ्रमरूपी संसारमें शान्तिको प्राप्त होता है अर्थात् उसके कर्मफल-भोगोंकी निवृत्ति होती है। अथवा मरण-मूर्च्छाके अन्तमें उसी क्षण वे हृदयस्थित वृक्षादि स्थावर योनियोंका ही जो सैकड़ो जड़ दुःखोंसे व्याप्त हैं, अनुभव करते हैं और फिर चिरकालतक नरकमें अपनी-अपनी वासनाओंके अनुरूप दुःखोंका भोग करके भूतलपर नाना योनियोंमें जन्म धारण करते हैं। (यह महापातकीकी गतिका वर्णन है।) अब जो मध्यम पापी है, उसकी गतिका वर्णन करते हैं। वह मृत्युकालिक मूर्च्छाके अनन्तर कुछ कालतक पाषाण-तुल्य जड़ताका अनुभव करता है। तत्पश्चात् जब उसे चेतना प्राप्त होती है, तब वह कुछ कालके बाद अथवा उसी समय तिर्यगादि क्रमसे नाना योनियोंका भोग करके संसारको प्राप्त होता है। जो कोई साधारण पापी होता है, वह मरते ही अपनी वासनाओंके अनुसार प्राप्त हुए अविकल मानव-देहका अनुभव करता है। उसी क्षण पूर्वसंस्कारके अनुसार उसकी स्मृतिका उदय होता है और स्वप्न एवं मनोराज्यकी भाँति उसके अनुभवमें वैसी ही वस्तुएँ आने लगती हैं। जो सर्वश्रेष्ठ महान् पुण्यात्मा है, वे मृत्युजनित मूर्च्छाके पश्चात् पूर्व-वासनाकी स्मृतिसे स्वर्गलोक तथा विद्याधरोंके सुखका भलीभाँति उपभोग करते हैं। फिर पुण्यफलभोगके अनन्तर अपने कर्मान्तर अर्थात् पापकर्मके अनुसार प्राप्त हुए फलको अन्यत्र भोगकर मनुष्यलोकमें धनी सत्पुरुषोंके घरमें जन्म धारण करते हैं। जो मध्यम धर्मात्मा होते हैं, वे मरणमूर्च्छाके बाद आकाशवायुसे आन्दोलित होकर उत्तम वृक्षों और पल्लवोंसे सुशोभित उपवनमें जाते हैं और वहाँ अपने पुण्यकर्मोंका फल भोग लेनेके बाद मनुष्योंके हृदयमें प्रविष्ट होते हैं। फिर रेतःसिञ्चनके समय जन्म-क्रमानुकूल स्त्रियोंके गर्भमें स्थित होते हैं।

इस प्रकार प्रेत मृत्युजनित मूर्च्छाके अनन्तर अपनी वासनाके अनुसार अपने हृदयमें इस व्यवस्थाका क्रमशः अथवा क्रमरहित ही अनुभव करते हैं। वे यह जानते हैं कि 'हमलोग पहले मृत्युको प्राप्त हुए। तदनन्तर बन्धुओंद्वारा क्रमशः पिण्डादि दान करनेसे हम पुनः आतिवाहिक-शरीरधारी होकर उत्पन्न हुए। तत्पश्चात् हाथोंमें कालपाश लिये हुए ये यमदूत आ पहुँचे। अब इन यमदूतोंद्वारा ले जाया जाता हुआ मैं क्रमशः यमपुरीको जाऊँगा।' उन प्रेतोंमें जो उत्तम पुण्यात्मा होता है, वह यों समझता है कि 'ये दिव्य एवं मनोहर विमान और उपवन मुझे बारंबार अपने शुभ कर्मोंसे ही प्राप्त हुए हैं। इसके विपरीत पापी पुरुष यों अनुभव करता है कि 'ये जो बरफकी चट्टानें, काँटे, गड्ढे और तलवारकी धारके समान तीखे पत्तोंसे पूर्ण वन मुझे प्राप्त हुए हैं, ये मेरे अपने ही दुष्कर्मोंके फलरूपसे उत्पन्न हुए हैं।' मध्यम पुण्यात्मा जानता है कि, यह मार्ग, जो मेरे सामने उपस्थित है, इसमें आनन्दपूर्वक पैदल चला जाता

१६६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

है, शीतल और हरी घास उगी हुई है । यह घनी छायासे आच्छादित है और स्थान-स्थानपर बावलियोंसे युक्त है।' मध्यम पापी यों अनुभव करता है कि 'यह मैं यमपुरीमें पहुँच गया । ये प्राणियोंके राजा यमराज हैं और यहाँ मेरे कर्मोंके विषयमें यह विचार किया गया ।' इस प्रकार संसारका विशाल अंश, जो सत्य-से प्रतीत होनेवाले सम्पूर्ण पदार्थों और उनकी क्रियाओंसे प्रकाशमान है, प्रत्येकको प्राप्त होता है । आकाशकी तरह स्वरूप-रहित वह प्रपञ्च देश, काल और क्रियाके विस्तारसे देदीप्यमान होते हुए भी कुछ नहीं है, किंतु सर्वारोपशून्य एवं विशिष्ट ज्ञानसम्पन्न आत्मा ही सब कुछ है ।

(यमपुरीमें पहुँचनेपर जीव कहता है—) अब मुझे यमराजका आदेश प्राप्त हो गया है, अतः मैं अपने कर्मोंका फल भोगनेके लिये शीघ्र ही यहाँसे उत्तम स्वर्गलोक अथवा नरकमें जाता हूँ । यमराजने मेरे लिये जिस स्वर्ग अथवा नरकका निर्देश किया था, मैंने उसका भोग कर लिया तथा यमनिर्दिष्ट उन-उन योनियोंमें भी भटक चुका । अब मैं पुनः संसारमें जन्म ग्रहण करूँगा । यह मैं धानका अङ्कुर होकर उत्पन्न हुआ । फिर क्रमशः बढ़कर फलरूपमें स्थित हुआ ।' इस प्रकार शरीराभावके कारण जब उसकी सारी इन्द्रियाँ भलीभाँति सोयी रहती हैं, उसी अवस्थामें वह भुक्तान्नादिद्वारा पुरुषके शरीरमें प्रवेश करके वीर्यरूपमें परिणत हो जाता है । वही वीर्य जब माताकी योनिमें पड़ता है, तब वह गर्भका रूप धारण करता है । वही गर्भ अपने पूर्वजन्मके कर्मानुसार उत्तम अथवा निकृष्ट प्रारब्धसे युक्त हो संसारमें मनोहर आकृतिवाले बालकके रूपमें जन्म लेता है । कुछ कालके बाद वह चन्द्रमाके समान मनोहर तथा कामोन्मुख जवानीका अनुभव करता है । तत्पश्चात् विकसित कमलपर गिरे हुए तुषाररूपी वज्रकी तरह उसे वृद्धावस्था आ घेरती है। उस बुढ़ापेमें भी किसी-न-किसी व्याधिके निमित्तसे ही उसका मरण होता है। पुनः उसे मृत्युजनित मूर्च्छा प्राप्त होती है। पुनः स्वप्नकी भाँति बन्धुओंद्वारा दिये गये पिण्डादिद्वारा सूक्ष्मशरीरकी प्राप्ति होती है और फिर वह यमलोकको जाता है । वहाँसे पुनः नाना योनियोंकी प्राप्ति होनेपर उनमें वह भ्रमण-क्रमका ही बारंबार अनुभव करता है । इस प्रकार इस वेगशाली परिवर्तनका वह तबतक पुनः-पुनः अनुभव करता रहता है, जबतक उसे मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो जाती।

प्राणियोंके शरीरोंमें जो छिद्रस्थान हैं, उनमें प्रविष्ट हुई वायु जब अङ्गोंमें चेष्टा उत्पन्न करती है, तब लोग कहते हैं कि यह जीवित है । परंतु ऐसी स्थिति सृष्टिके आदिमें केवल जङ्गम प्राणियोंमें ही उत्पन्न हुई थी, इसी कारण ये वृक्ष आदि स्थावर प्राणी सचेतन होते हुए भी चेष्टाहीन हैं । जब जीवात्मा मनुष्यादिशरीररूप दूसरे नगरमें पहुँचता है, तब वहाँ बुद्धिको चक्षु आदि इन्द्रिय-गोलकोंमें ले जाकर उनके द्वारा बाह्यपदार्थोंका अनुभव करता है—जैसे आकाश शून्यतासे, पृथ्वी धारणशक्तिसे और जल आप्यायनशक्तिसे युक्त है । तात्पर्य यह कि जीवात्मा स्वेच्छासे जिसके लिये जैसी कल्पना करता है, वह वैसा ही अपने शरीरको जानता है । इस प्रकार सर्वव्यापी परमात्मा जंगमरूपसे जंगमकी और स्थावररूपसे स्थावरकी कल्पना करता हुआ सबके शरीररूपसे स्थित है । इसलिये जो जंगम जगत् है, उसे उसने अपनी कल्पनाके अनुसार जैसा समझा था, वह आज भी उसी रूपमें वर्तमान है । जैसे जिन वृक्ष, शिला, पेड़-पौधों और तृण आदिको स्थावर होनेके कारण जड समझा गया था, वे आज भी वैसे ही स्थित हैं; क्योंकि न तो जडता ही कोई पृथक् वस्तु है और न चेतन ही । इन पदार्थोंकी सृष्टि, स्थिति और विनाशमें कोई भेद नहीं है और न सत्तासामान्यमें ही कोई अन्तर है अर्थात् सबमें सत्ता समान है । यथार्थ बात तो यह है कि वृक्षों और पर्वतोंके अंदर जो उनकी जडता एवं नाम-रूप आदि भेद परिलक्षित होते हैं, वे जीवात्माकी बुद्धिद्वारा विहित

उत्पत्ति-प्रकरण] * राजाविदूरथकावासनामययमपुरीमेंगमन,लीलाऔरसरस्वतीद्वारा उसका अनुगमन * १६७


हैं, वस्तुतः नहीं हैं। वही जीवात्मा स्थावरादिके भीतर 'मैं स्थावर हूँ' ऐसी बुद्धिसे स्थित होनेके कारण जंगमसे भिन्न नाम और अभिमानका विषयभूत होकर वृक्षादि अन्य स्वरूपोंसे स्थित है। कृमि, कीट और पतङ्गोंके अंदर संवित्-रूपसे वर्तमान जीवात्मा ही उनकी बुद्धिका रूप धारण करता है और वही अनेकविध नाम-रूपोंसे व्यवहृत होता है। सभी स्थावर-जंगम अपने-अपने अनुभवमें ही लीन हैं, परन्तु जब वे एक-दूसरेसे सम्बन्धित होते हैं, तब उनमें 'यह स्थावर है और यह जंगम है' यों संकेतकी आवश्यकता पड़ती है। चेतन तो परमार्थरूपसे स्थावर-जंगम सभीमें वर्तमान है, परंतु जंगम प्राणियोंमें वायुके प्रवेश करनेसे चेष्टाएँ होती हैं और स्थावरोंमें नहीं होतीं। जिस प्रकार विश्वके समग्र पदार्थोंके स्वभावका विकास होता है और जैसे वे असत्य होते हुए भी सत्य-से प्रतीत होते हैं, वह सब वृत्तान्त मैंने तुम्हें बतला दिया। अब उधर देखो, ज्ञात होता है, यह राजा विदूरथ मृत्युको प्राप्त होकर तुम्हारे पति राजा पद्मके, जो पुष्पमालाओंसे आच्छादित शवके रूपमें स्थित हैं, हृदयान्तर्गत पद्मकोशमें प्रवेश करनेकी इच्छासे जाना चाहता है।

प्रबुद्ध लीलाने पूछा—देवेश्वरि ! बताइये, यह राजा विदूरथ किस मार्गसे उस शवमण्डपमें जानेका इच्छुक है ? जिससे हम दोनों भी उसे देखती हुई ही उस उत्तम मण्डपमें शीघ्र ही जायें।

श्रीदेवीजीने कहा—लीले ! 'मैं दूरवर्ती दूसरे लोकको जाता हूँ' इस भावनासे यह चिन्मय जीवात्मा मनुष्य वासनाके अंदर स्थित मार्गका अवलम्बन करके जाता है। यों तुम्हें जिस मार्गसे जाना अभीष्ट हो, उसी मार्गसे हम दोनों जाती हैं; क्योंकि एक-दूसरेकी इच्छाका विघातन प्रेम-बन्धनका हेतु नहीं होता।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! इस प्रकार श्रेष्ठ राजाकी कन्या लीलाके विशुद्ध मनमें जब परमार्थ दृष्टि-रूप पूर्वोक्त कथाके श्रवणसे सारे संताप मिट गये तथा ज्ञानरूपी सूर्यका प्रसार हो गया, तब राजा विदूरथ चित्तके विलीन हो जानेके कारण जड अर्थात् मृत्युकालिक मूर्च्छाके वशीभूत हो गया। (सर्ग ५२–५५)


राजा विदूरथका वासनामय यमपुरीमें गमन, लीला और सरस्वतीद्वारा उसका अनुगमन और पूर्वशरीरकी प्राप्तिका वर्णन, लीलाके शरीरकी असत्यताका कथन, समाधिमें स्थित लीलाके शरीरका विनाश, लीलाके साथ वार्तालाप और राजा पद्मके पुनरुज्जीवनका कथन, राजाके जी उठनेसे नगर और अन्तःपुरमें उत्सव, लीलोपाख्यानके प्रयोजनका विस्तारसे कथन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इसी बीच राजा विदूरथकी आँखोंकी पुतलियाँ उलट गयीं। होंठ सूखकर श्वेत हो गये। उसके शरीरकी सभी इन्द्रियोंके मूर्च्छित हो जानेपर केवल सूक्ष्मप्राण ही शेष रह गया। मुखकी छवि पुराने पीले पत्तेकी कान्तिके समान क्षीण एवं पीली हो गयी। भौंरेके गुंजारके सदृश श्वासवायुकी ध्वनि होने लगी। उसका मन महाप्रयाणकालिक मूर्च्छाके अन्धकूपमें डूब गया। नेत्र आदि सारी इन्द्रियोंकी वृत्तियाँ अन्तर्लीन हो गयीं। इस प्रकार वह चेतनाशून्य हो गया। चित्रलिखित पुरुष-सरीखे उसका आकारमात्र ही दीख पड़ता था। शिलापर खुदे हुएकी भाँति उसके शरीरके सम्पूर्ण अवयव निश्चेष्ट हो गये थे। इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ ? जैसे आकाशचारी पक्षी गिरनेके संनिकट पहुँचे हुए अपने निवासभूत वृक्षको छोड़ देता है, उसी प्रकार प्राणने स्वाधिष्ठित थोड़े-से शरीरांशसे चलकर राजाके शरीरका परित्याग कर दिया।

उस समय जैसे प्राणमयी ज्ञानवृत्ति वायुमें स्थित सूक्ष्म

१६८ * अविच्छिन्नसच्चिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


गन्धका अनुभव करती है, उसी प्रकार उन दोनों देवियोंने, जिन्हें दिव्यदृष्टि प्राप्त थी, आकाशमार्गसे जाते हुए उस जीवको देखा। फिर तो वे दोनों नारियाँ उसी जीवात्माका अनुसरण करने लगीं—ठीक उसी तरह, जैसे दो भ्रमरियाँ वायुमें मिली हुई गन्धकलाका अनुगमन करती हैं। तदनन्तर दो घड़ीके पश्चात् जब मरण-मूर्च्छा शान्त हुई, तब जीवात्मा आकाशमें सुगन्धयुक्त वायुके स्पर्शसे प्रबुद्ध हो गया। उस समय उसने यमदूतोंको, उनके द्वारा ले जाये जाते हुए अपने वासनामय शरीरको तथा बन्धुओंद्वारा किये गये पिण्डदान आदिसे उत्पन्न हुए अपने स्थूलशरीरको भी देखा। फिर उसी मार्गसे बहुत दूरतक आगे जानेपर वह यमराजकी नगरीमें जा पहुँचा, जो प्राणिसमुदायसे घिरी हुई थी और जहाँ उनके कर्मफलोंपर विचार किया जा रहा था। वहाँ पहुँचनेपर यमराजने इसके कर्मोंपर विचार करके यह आदेश दिया कि 'यह सदा निर्मल पुण्यकर्मोंका ही अनुष्ठान करता रहा है। इसने कभी भी पापकर्म नहीं किया है। साथ ही सरस्वती देवीके वरदानसे इसके पुण्योंकी विशेषरूपसे वृद्धि हुई है। इस उपर्युक्त बातको समझकर तुमलोग इसे छोड़ दो और यह अपने पूर्वजन्मके शरीरमें, जो शवरूपमें पुष्पोंसे आच्छादित मण्डपाकाशमें वर्तमान है, वहाँजाकर प्रवेश करे।' यों आदेश पानेपर यमदूतोंने उसे आकाशमार्गमें लाकर छोड़ दिया। तदनन्तर वह जीवात्मा, लीला और सरस्वती—ये तीनों एक साथ आकाशमार्गसे उड़ते हुए आगे बढ़े। उस समय यद्यपि सरस्वती और लीला मूर्तिमती थीं, तथापि वह जीवात्मा उन्हें देख नहीं रहा था, जबकि वे उसे देख रही थीं। इस प्रकार वे दोनों उस जीवात्माका अनुसरण करती हुई आकाश-मण्डलको लाँघकर लोकान्तरोंको पार करती हुई दूसरे ब्रह्माण्डमें जा पहुँचीं। पुनः शीघ्र ही वहाँसे निकलकर दूसरे ब्रह्माण्डमें गयीं। फिर उस भूमण्डलसे

चलकर वे दोनों संकल्परूपिणी देवियाँ उस जीवात्माके साथ राजा पद्मके नगरमें आयीं और वहाँ तुरंत ही स्वच्छन्दतापूर्वक लीलाके अन्तःपुरके मण्डपमें प्रविष्ट हुईं।

श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जिसका शरीर मर चुका था, उस जीवात्माको मार्गका परिज्ञान कैसे हुआ ? और वह उस शवके निकटवर्ती मण्डपमें कैसे पहुँचा ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघव ! उस जीवकी अपनी वासनाके अन्तर्गत शवकी भावना विद्यमान थी, जिससे उसके हृदयमें वह मार्ग आदि सब कुछ स्फुरित हो गया; फिर उसे उस गृहकी प्राप्ति कैसे न हो। क्योंकि जैसे किसी अन्य स्थानमें स्थित पुरुष दूर देशान्तरमें रखे हुए अपने खजानेको अनवरत उसकी मानसिक भावनाके कारण सदा सम्यक् रूपसे देखता रहता है, उसी प्रकार सैकड़ों जन्मोंके चक्करमें पड़ा हुआ भी जीव अपनी वासनाके अंदर स्थित अपने अभीष्टको देखता है।

श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! जिसके लिये पिण्डदान

उत्पत्ति-प्रकरण ] * राजा विदूरथका यमपुरीमें गमन तथा लीला एवं सरस्वतीद्वारा उसका अनुगमन * १६९


दिया ही नहीं जाता, उसमें पिण्डदानादि वासनाका कारण तो है नहीं; फिर उस वासनासे रहित स्वरूपवाला जीव किस प्रकार शरीरको प्राप्त होता है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! बन्धुओं द्वारा पिण्ड दिया गया हो अथवा न दिया गया हो; परंतु यदि 'मैंने पिण्डदान किया है' ऐसी वासना हृदयमें भलीभाँति उत्पन्न हो जाय तो वह पुरुष पिण्डफलका भागी हो जाता है; क्योंकि अनुभूतियाँ बतलाती हैं कि जैसा चित्त होता है, वैसा ही वह प्राणी होता है। यह नियम जीवित अथवा मृत—किसी भी प्राणीमें कहीं भी अन्यथा नहीं होता। पदार्थोंकी सत्यता उनकी भावना—वासनाके अनुसार ही होती है और वह भावना कारणभूत पदार्थोंसे उत्पन्न होती है; क्योंकि जो स्वयं नित्य प्रकाशस्वरूप है, एकमात्र उस ब्रह्मके अतिरिक्त दूसरे किसी कार्यकी उत्पत्ति कारणके बिना हुई हो, ऐसा तो महाप्रलयपर्यन्त न तो कहीं देखा गया और न इस विषयमें कुछ सुना ही गया। जैसे स्वप्नमें जीव विविध पदार्थोंके रूपमें कल्पित हुआ दीख पड़ता है, उसी तरह चेतन जीवात्मा ही उस वासनाका रूप धारण करता है। वही कार्य-कारणभावको प्राप्त होता है और वही निश्चल-सा होकर स्थित होता है। देश, काल, क्रिया और द्रव्यके संयोगसे भावना अर्थात् वासनाका उदय होता है। वह वासना जिस ( सत्य एवं असत्य ) फलरूप विषयमें उत्पन्न होती है, वही विषय दोनोंमें अधिक जयशील होता है। यदि धर्मदानाकी वासना प्रवृत्त हुई हो तो उससे क्रमशः प्रेतकी बुद्धि पूर्ण हो जाती है अर्थात् दाताकी वासनाके अनुसार प्रेतको अवश्य फल मिलता है। यों परस्परकी विजयके कारण इस विषयमें जो अत्यन्त वीर्यशाली होता है, वही विजयी होता है; इसलिये उत्तम यत्नद्वारा शुभ कर्मोंका अभ्यास करना चाहिये।

पूर्ववर्णनके अनुसार लीला और सरस्वती देवी राजा पद्मके उस राजमहलमें जा पहुँचीं, जिसका भीतरी

सं० यो० व० अं० ७—

भाग अत्यन्त मनोरम था। चारों ओर पुष्पोपहारसे व्याप्त होनेके कारण वह वसन्त-सा शीतल लगता था। वह उन नगर-निवासियोंसे युक्त था, जिनकी राजकार्य करनेकी तत्परता पूर्णरूपसे शान्त हो गयी थी। वहाँ उन दोनोंने एक कमरेमें रखे हुए शवको देखा, जो मन्दार और कुन्दपुष्पकी मालाओंसे आच्छादित था। उस शवके सिरहाने जलसे पूर्ण उत्तम कलश आदि माङ्गलिक पदार्थ रखे थे। उस कमरेके दरवाजे और खिड़कियोंकी साँकलें बंद थीं और उसकी निर्मल दीवारें दीपकके प्रकाशके प्रशान्त हो जानेके कारण मलिन दीख पड़ती थीं। वह एक ओर सोये हुए लोगोंके मुखसे निकली हुई श्वासवायुसे व्याप्त था।

तदनन्तर उन दोनोंने उस शवमण्डपमें विदूरथकी शवशय्याके पार्श्वभागमें स्थित लीलाको देखा, जो पहले मृत्युको प्राप्त हो चुकी थी और पहले ही वहाँ आ गयी थी। उसके वेष, आचरण, शरीर और वासनाएँ—सभी पहलेके ही सदृश थे। उसकी आकृति पूर्वजन्मकी-

१७० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

सी थी । नखसे शिखातक उसके सारे अङ्ग सुन्दर थे। उसका रूप और अङ्गोंकी चेष्टाएँ पूर्ववत् थीं। जैसे वस्त्र वह पूर्वजन्ममें पहनती थी, वैसे ही वस्त्रोंसे उसका शरीर आच्छादित था और पहलेके-से आभूषणोंसे भी वह विभूषित थी। केवल इतना ही अन्तर था कि वह राजा पद्मके महलमें स्थित थी। उस समय उसके हाथमें चँवर सुशोभित था, जिसे वह सुन्दर ढंगसे राजाके ऊपर डुला रही थी। इस प्रकार उन दोनों (सरस्वती और प्रबुद्ध लीला) ने तो उस लीलाको देखा, परंतु वह उन दोनोंको न देख सकी। इसका कारण यह था कि वे दोनों सत्यसंकल्पस्वरूपा थीं और वह उनकी भाँति सत्यसंकल्पसे आविर्भूत नहीं हुई थी।

वत्स राम ! यह सारा जगत् आत्मा ही है। ऐसी दशामें देहादिकी कल्पना कहाँसे हो सकती है। तुम जो कुछ देख रहे हो, वह आनन्दरूप सद्ब्रह्म ही है और वही चेतन है। जिस पुरुषको स्वप्नकालमें 'मैं हरिन हूँ' ऐसी बुद्धि उत्पन्न हुई हो, वह क्या जागनेपर अपने मृगस्वरूपका अभाव हो जानेपर स्वप्नकालिक मृगको खोजता है ! नहीं । जो अज्ञानी होता है, उसकी दृष्टिमें सत्यका तिरोधान और असत्यका आविर्भाव शीघ्र होता है, परंतु रस्सीमें उत्पन्न हुई सर्पभ्रान्तिके मिट जानेपर क्या पुनः उसमें सर्पभ्रम हो सकता है ! कदापि नहीं। इस प्रकार जो जन्म-मरणशील शरीरको ही आत्मा माननेवाले हैं, वे सभी अज्ञानी स्वप्न-तुल्य इस मिथ्या सृष्टिका चिरकालतक सत्यकी तरह अनुभव करते रहते हैं। किंतु आत्मतत्त्वका यथार्थ ज्ञान होनेसे 'देहमें आत्मबुद्धि करना भ्रममात्र ही है' यों उनकी उस भ्रान्तिका उपशम हो जाता है—ठीक उसी तरह, जैसे रस्सीका ज्ञान होनेसे उसमें उत्पन्न हुई सर्पबुद्धि नष्ट हो जाती है। वस्तुतः तो शरीर क्या था ? किसकी सत्ता थी ? कहाँ और किस तरह किसका विनाश हुआ ? परमार्थतः जो वस्तु थी, वही रह गयी, केवल अज्ञान मिट गया। जब रस्सीमें उत्पन्न हुई सर्पबुद्धिकी भाँति यह सारी प्रतीति भ्रान्तिमात्र ही है, तब उसके उत्पन्न होनेपर क्या बढ़ गया और नष्ट होनेपर क्या नष्ट हुआ ? अर्थात् उसके आने-जानेमें कोई हर्ष-विषाद नहीं है।

श्रीरामजीने पूछा—प्रभावशाली गुरुदेव ! पद्मके राज-महलमें पूर्वलीला और नूतन लीलाका समागम होनेके पश्चात् जो उस भवनके निवासी थे, वे लीलाकी सत्यसंकल्पताके कारण यदि उसे देखते हैं तो उसके बाद उसे क्या समझते हैं ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघव ! उस समय वे लोग ऐसा जानते हैं कि यहाँ ये दुखिया महारानी खड़ी हैं और उनकी यह कोई दूसरी सखी भी कहींसे आ गयी है। जैसे जाग जानेपर ज्ञान हो जानेसे स्वप्नदृष्ट शरीर न जाने कहाँ विलीन-सा हो जाता है, इसलिये वह असत्य ही है, वही दशा यहाँ इस पाञ्चभौतिक स्थूल-शरीरकी भी है। (अर्थात् ज्ञान होनेपर इसका भी विनाश होता है, अतः यह भी असत्य ही है।) स्वप्नभ्रान्ति अथवा मनकी कल्पनामें जो पर्वत आदि पदार्थ उत्पन्न होते हैं, वे सभी बुद्धिवृत्तिके अंदर उसी प्रकार विलीन हो जाते हैं, जैसे सारी चेष्टाएँ वायुमें अन्तर्भूत हो जाती हैं। बुद्धिवृत्ति ही स्वप्न आदि पदार्थोंकी प्रतीतिद्वारा पर्याप्तरूपसे स्फुरित होती है, परंतु वही स्फुरित न होनेपर उस स्वप्नके साथ एकताको प्राप्त होकर तद्रूप हो जाती है। जैसे जल और उसका द्रवत्व अथवा वायु और उसकी गति दो नहीं हैं, उसी प्रकार बुद्धिवृत्ति और स्वाप्निक पदार्थोंमें कभी भेद नहीं पाया जाता। उनमें जो भेद-सा प्रतीत होता है, वही सबसे बढ़कर अज्ञान है। वही 'संसार' कहा गया है और वह संसार मिथ्याज्ञानरूप ही है। सहकारी कारणों-का अभाव होनेपर भी स्वप्नकालमें बुद्धिवृत्ति और स्वप्न-दृष्ट पदार्थोंका भेद निरर्थक ही है। स्वप्नमें जैसे असत् नगरकी प्रतीति होती है, उसी तरह सृष्टिके आदिमें

उत्पत्ति-प्रकरण ] * राजा विदूरथका यमपुरीमें गमन तथा लीला एवं सरस्वतीद्वारा उसका अनुगमन * १७१


असत् जगत्का भान होता है; अतः जैसे स्वप्न असत् हैं, वैसे ही जाग्रत् भी असत् है; इसमें संशय नहीं है। जैसे जाग जानेपर स्वप्नदृष्ट पर्वतका तत्काल ही अभाव हो जाता है, उसी प्रकार तत्त्वज्ञान होनेपर इस पाञ्चभौतिक संसारका श्रवण-मनन-निदिध्यासनादि क्रमसे अथवा ईश्वरानुकम्पासे अभाव हो जाता है। ये सृष्टियाँ मिथ्यादृष्टियाँ ही हैं; क्योंकि ये मोहदृष्टियाँ हैं अर्थात् अज्ञानसे इनका दर्शन होता है। जो मायारूपसे प्रतीत होनेवाले केवल संसारकी भ्रान्ति है और जो स्वप्नकी अनुभूतियाँ हैं, वे सभी अर्थशून्य हैं। भ्रमसे जड संसारका दर्शन करनेवाले पुरुषके मरणान्तकालमें स्वप्नानुभूति-सदृश जो ये सृष्टिकी प्रत्यक्ष प्रतीतियाँ हैं, वे सब-की-सब यद्यपि आतिवाहिक शरीरमें प्रविष्ट हो चुकी हैं, तथापि भ्रमवश मृगतृष्णाकी नदीके प्रवाहकी भाँति मिथ्या प्रकट हुई-सी प्रतीत होती हैं। वास्तवमें तो वे मनके अंदर ही हैं।

इसी बीचमें सरस्वती देवीने मनकी चेष्टाके समान विदूरथके जीवात्माको अपने सत्यसंकल्पसे पुनः शीघ्र ही अवरुद्ध कर दिया।

तब श्रीसरस्वती देवी लीलासे बोलीं—वत्से ! तुम अपने सत्यसंकल्पवश अत्यन्त निर्मल सूक्ष्मशरीरसे युक्त दिखायी देती हो, इसलिये तुम्हारे ऊपर लोगोंको आश्चर्य हो रहा है। बाले ! अपने शरीरके प्रति तुम्हारी जैसी वासना थी, तदनुरूप ही तुम्हें शरीर मिला है। इसी कारण पूर्वजन्मके रूपके समान ही तुम्हारा रूप प्रकट हुआ है; क्योंकि सब लोग अपनी वासनाके अनुसार ही सब पदार्थोंको देखते हैं। सिद्धसुन्दरि ! तुम सूक्ष्म-शरीरसे सम्पन्न हो, अतः तुम्हारा वह पूर्वजन्मका शरीर तुम्हें भूल गया है, इसी कारण उसपर तुम्हारी वासना नहीं रह गयी है। जिस ज्ञानी पुरुषकी सूक्ष्मदृष्टि दृढ़मूल हो जाती है, उसका पाञ्चभौतिक शरीर दूसरों-द्वारा देखा जाता हुआ भी सूक्ष्म ही है। आज हमलोग इस मण्डपाकाशमें प्राप्त हुई हैं। इस समय प्रभातकाल होनेपर मैंने इन दोनों दासियोंको निद्रासे मोहित कर दिया है; अतः लीले ! आओ, तबतक हम दोनों अपने सत्यसंकल्पके विलासद्वारा इस लीलाको अपना स्वरूप दिखलायें। अब हमलोगोंका कार्य आरम्भ होना चाहिये।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! देवी सरस्वतीके ज्यों ही ऐसा विचार किया कि 'यह लीला तबतक हम दोनोंको देखे', त्यों ही वे दोनों दीप्तिमती देवियाँ ( सरस्वती और प्रबुद्ध लीला ) वहाँ प्रकट हो गयीं। उनके प्रत्यक्ष होते ही विदूरथपत्नी लीलाकी आँखें चौंधिया गयीं। उसने देखा कि वह घर उन देवियोंके तेजःपुञ्जसे देदीप्यमान हो गया है। इस प्रकार उस प्रदीप्त गृह और अपने समक्ष लीला और सरस्वती—उन दोनों देवियोंको उपस्थित देखकर वह बड़ी उतावलीके साथ उठ खड़ी हुई और फिर उनके चरणोंमें पड़कर यों कहने लगी—'देवियो ! आप जीवन प्रदान करनेवाली हैं, आपकी जय हो। आपलोगोंकी सेविका मैं यहाँ पहले ही आ पहुँची हूँ। अब मेरे कल्याणोत्कर्षके लिये आप दोनोंका शुभागमन हुआ है।' उसके यों कहनेपर यौवनके मदसे मतवाली वे तीनों मानिनियाँ वहाँ आसनोंपर विराजमान हुईं।

तब श्रीसरस्वती देवी बोलीं—वत्से ! तुम इस देशमें कैसे आयीं ? तथा मार्गमें अथवा कहाँपर तुमने कौन-सी आश्चर्यजनक घटना देखी ? तुम आदिसे लेकर यह सारा वृत्तान्त वर्णन करो।

विदूरथ-पत्नी लीलाने कहा—देवि ! उस समय विदूरथके गृहप्रदेशमें जब मैं मूर्च्छित हो गयी, तब परमेश्वरि ! उस मरण-मूर्च्छाके पश्चात् मैं क्या देखती हूँ कि मैं

१७२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

होशमें आकर उठ बैठी हूँ और फिर शीघ्र ही आकाश-मण्डलमें उड़ चली हूँ। तत्पश्चात् उस भूताकाशमें मैं वायुरूपी रथपर सवार हो गयी हूँ। वही रथ मुझे इस घरतक ले आया है। देवि! तब मैंने इस भवनको देखा, जो शवरूप राजा पद्मसे सुशोभित था। उसके भीतर दीपकका प्रकाश फैल रहा था। यह अत्यन्त स्वच्छ और बहुमूल्य शय्यासे युक्त था। तदनन्तर जब मैं अपने इन पतिदेवका अवलोकन करने चली, तब क्या देखती हूँ कि जिनका सारा अङ्ग पुष्पोंसे आच्छादित है, वे राजा विदूरथ यहाँ उसी प्रकार सो रहे हैं। मानो पुष्पवनमें वसन्त शयन कर रहा हो। देवेश्वरि! तब मैंने यह सोचा कि 'ये संग्रामरूपी कार्यके अधिक परिश्रमसे थक गये हैं, इसीलिये गाढ़ निद्रामें सो रहे हैं।' अतः मैंने इनकी यह निद्राभङ्ग नहीं की। इसके बाद ही आप दोनों देवियों इस स्थानपर पधारी हैं। मुझपर अनुग्रह करनेवाली देवि! इस प्रकार मुझे जैसा अनुभव हुआ था, वह सब आपसे कह सुनाया।

तब श्रीसरस्वती देवी बोलीं—लीले! तुम दोनोंके नेत्र बड़े सुन्दर हैं और चलनेका ढंग हंसकी चालके समान मनोहर है। अच्छा, अब हम इस राजाको शवशय्यासे उठाती हैं। यों कहकर सरस्वती देवीने कमलिनीद्वारा बिखेरी गयी सुगन्धकी भाँति राजाके जीवात्माको छोड़ दिया। तब वायुरूपधारी वह जीव राजाकी नासिकाके निकट गया और उसके नासारन्ध्रमें प्रविष्ट हो गया—ठीक उसी तरह, जैसे वायु बाँसके छिद्रमें प्रवेश करती है। उस समय वह अनन्त वासनाओंसे युक्त था। फिर तो जैसे अनावृष्टिके कारण मुरझाया हुआ कमल अच्छी जलवृष्टि होनेसे पुनः विकसित हो जाता है, उसी तरह जीवके अंदर प्रवेश करनेपर राजा पद्मका विवर्ण हुआ मुख पुनः पूर्ववत् कान्तिमान् हो गया। तदनन्तर उसके सारे अङ्ग क्रमशः चेष्टाशील होकर सुशोभित होने लगे, जैसे पर्वतकी लताएँ वसन्तको पाकर प्रफुल्लित हो जाती हैं। तब उसने अपने उन नेत्रोंको, जिनकी पुतलियाँ निर्मल और चञ्चल थीं, खोल दिया। तत्पश्चात् वह बढ़ते हुए विन्ध्य पर्वतके समान अपने शरीरको शय्यासे ऊपर उठाते हुए उठ बैठा और मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोला—'यहाँ कौन है?' तबतक दोनों लीलाएँ उसके आगे उपस्थित होकर बोलीं—'महाराज! आज्ञा दीजिये!' जब उसने दो लीलाओंको, जिनके आचार, आकार, रूप, मर्यादा, वचन, उद्योग, आनन्द और अभ्युदय सभी एक-से थे, नम्रतापूर्वक अपने सामने खड़ी देखा, तब उनकी ओर ध्यानपूर्वक देखते हुए पूछा—'तुम कौन हो? और यह कौन है तथा यह कहाँसे आयी है?' यह सुनकर पूर्वलीलाने उससे कहा—'देव! मैं जो कुछ कहती हूँ, उसे सुनिये। मैं आपकी पूर्वजन्मकी सहधर्मिणी रानी हूँ। मेरा नाम लीला है। अर्थसंयुक्त वाणीकी तरह मैं सदा आपके सम्बन्धसे सुशोभित हूँ। यह दूसरी लीला भी आपकी रानी है। इसे मैं क्रीडावश आपके उपभोगके लिये ले आयी हूँ। आप इसकी रक्षा करें। स्वामिन्! सिरहानेकी ओर स्वर्णसिंहासनपर बैठी हुई ये कल्याणकारिणी सरस्वती देवी हैं। ये तीनों लोकोंकी जननी हैं। भूपाल! हमलोगोंके पुण्यबाहुल्यसे ये साक्षात् यहाँ पधारी हैं। ये ही हम दोनोंको परलोकसे यहाँ लायी हैं।'

लीलाकी यह बात सुनकर राजा, जिसके नेत्र कमलके समान सुन्दर थे और शरीरपर लटकती हुई माला और वस्त्र सुशोभित थे, शय्यासे उठ गया और सरस्वतीके चरणोंमें पड़कर कहने लगा—'देवी सरस्वति! आप सबको कल्याण प्रदान करनेवाली हैं, आपको नमस्कार है। वरदायिनि! मुझे मेधा, दीर्घायु और धन