संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति-प्रकरण] राजा विदूरथकी मृत्यु, संसारकी असत्यता और द्वितीय लीलाकी वासनारूपताका वर्णन १६३
जैसे स्वप्नमें पुरुष अपनेमें ही जलताका दर्शन करता है, उसी तरह जीवात्मा जलका संकल्प करनेके कारण जलवत् स्थित होता है। स्वप्नकी भाँति जीवात्मा उस-उस रूपको प्राप्त होता है और जैसा होता है, वैसा ही वह ज्यों-का-त्यों स्थित रहता है; क्योंकि चेतनके चमत्कार अर्थात् मायाकी चतुरतासे यह प्रपञ्च असत् होते हुए भी सत्-सा दीख पड़ता है। जैसे स्वप्न, कल्पना और ध्यानमें आयी हुई वस्तुएँ असत् होती हैं, उसी तरह आकाशत्व, जलत्व, पृथिवीत्व, अग्नित्व और वायुत्व—ये सभी असत् हैं—ऐसा चेतन स्वयं अपने अंदर अनुभव करता है। अब मृत्युके पश्चात् कर्मफलके अनुभव करनेका जो क्रम है, उसे सम्पूर्ण संशयोंकी शान्तिके लिये सुनो। वह मरनेपर कल्याणकारी होता है। जगत्में अपने कर्मोंकी देश, काल, क्रिया और द्रव्यजनित शुद्धि और अशुद्धि ही मनुष्योंकी आयुके अधिक और न्यून होनेमें कारण होती हैं। अपने कर्मरूप धर्मका ह्रास होनेपर मनुष्योंकी आयु क्षीण हो जाती है और उस धर्मके बढ़नेपर आयुकी वृद्धि होती है। बाल्यावस्थामें मृत्यु प्रदान करनेवाले कर्मोंको करनेसे बालक, युवावस्थामें मृत्युदायक कर्मोंसे नौजवान और बुढ़ापेमें मृत्युप्रद कर्मोंके करनेसे वृद्ध मृत्युको प्राप्त होता है। जो अपने धर्मका शास्त्रानुकूल आरम्भ करके पीछे उसका अनुष्ठान करता रहता है, वह श्रीमान् पुरुष शास्त्रवर्णित आयुका भागी होता है। यों अपने कर्मोंके अनुसार ही जीवको अन्तिम दशा प्राप्त होती है और उस मरणासन्न अवस्थाको प्राप्त हुआ जीव मर्मघातिनी वेदनाओंका प्रत्यक्ष अनुभव करता है।
प्रबुद्ध लीलाने पूछा—चन्द्रवदनी देवि ! मरण सुखरूप है अथवा दुःखरूप ? और मरनेके बाद फिर क्या होता है ? इस प्रकार मरणका वृत्तान्त मुझसे संक्षेपमें कहिये।
श्रीदेवीजीने कहा—लीले ! शरीरान्तके समय मुमूर्षु पुरुष तीन प्रकारके होते हैं—मूर्ख, धारणाभ्यासी और युक्तिमान् । इनमें धारणाभ्यासी दृढतापूर्वक धारणाका अभ्यास करके शरीरको छोड़कर सुखपूर्वक प्रयाण करता है। उसी प्रकार युक्तिमान् भी सुखपूर्वक ही गमन करता है; परंतु जिसने न तो धारणाका अभ्यास किया है और न युक्ति ही प्राप्त की है, वह मूर्ख पुरुष अपने मृत्युसमयमें विवश होकर दुःखको प्राप्त होता है। वह विषयी पुरुष वासनाके आवेशसे विवशताका अनुभव करता हुआ जड़से कटे हुए कमलकी तरह अत्यन्त दीनताको प्राप्त हो जाता है। जिसकी बुद्धि शास्त्राभ्यासद्वारा संस्कृत नहीं है एवं जो दुष्टोंकी संगतिको सेवन करता है, वह मरनेपर अग्निमें गिरे हुए जीवकी भाँति अन्तर्दाहका अनुभव करता है। जब उस अज्ञानी पुरुषके कण्ठसे घुरघुराहटकी आवाज निकलने लगती है, आँखोंकी पुतलियाँ उलट जाती हैं, शरीरका रंग विकृत हो जाता है, उस समय उसकी बड़ी दयनीय दशा हो जाती है। उसकी आँखोंके सामने घना अन्धकार छा जाता है, जिससे उसे कुछ सूझ नहीं पड़ता। बोलनेमें असमर्थ होनेके कारण वह स्वयं जड़वत् हो जाता है। जैसे सूर्यके अस्ताचलका आश्रय लेनेपर क्रमशः प्रकाशकी मन्दताके कारण दिशाएँ धुँधली हो जाती हैं, उसी तरह उसकी सारी इन्द्रियोंकी शक्तियाँ क्षीण हो जानेके कारण वे अपने-अपने विषयोंको ग्रहण करनेमें असमर्थ हो जाती हैं। विशेषरूपसे मोहके वशीभूत हो जानेसे उसके मनकी कल्पनाशक्ति नष्ट हो जाती है, जिससे वह अविवेकवश मोहके अगाध सागरमें डूबता-उतराता रहता है। ज्यों ही उसे थोड़ी सी मूर्च्छा हुई, त्यों ही प्राणवायुकी गति बंद हो जाती है और जब सभी प्राणोंकी क्रिया रुक जाती है, तब उसे घोर मूर्च्छा आ घेरती है। इस प्रकार परस्पर एक-दूसरेके सहयोगसे पुष्टताको प्राप्त हुए मोह, संवेदन और भ्रमसे जीव पाषाणवत् जड़ताको प्राप्त हो जाता है। सृष्टिके प्रारम्भसे ही यह नियम चला आ रहा है।
प्रबुद्ध लीलाने पूछा—देवि ! यद्यपि यह शरीर आठ