भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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६२* अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

यी। तदुपरान्त लीला शत्रुरूपी अपने पतिके मुखको देखकर अपनी प्रतिभाके प्रभावसे इस सत्यको समझ गयी कि 'ये मेरे पतिदेव संग्राममें राजा सिन्धुके हाथों मारे गये और अब इन वीर-लोकोंको प्राप्त होकर सुखपूर्वक सो रहे हैं। मैं भी इस प्रकार श्रीदेवीकी कृपासे सशरीर यहाँ आ पहुँची हूँ, अतः मेरे समान धन्य दूसरी कोई स्त्री नहीं है।' यों भलीभाँति विचारकर लीला अपने हाथमें एक सुन्दर चँवर लेकर डुलाने लगी।

श्रीदेवीजीने कहा—लीले! वह राजा, वह वासनामयी लीला और उसके वे सभी भृत्य परस्पर पति-पत्नी एवं स्वामी-सेवकके भावके अनुकूल ही एक-दूसरेको देखते हैं—जैसे 'यह मेरी स्वाभाविक भार्या है। यह मेरी स्वाभाविक सखी है। यह मेरी स्वाभाविक रानी है और यह मेरा स्वाभाविक नौकर है।' परंतु इस आश्चर्यमय वृत्तान्तको पूर्णरूपसे केवल तुम, मैं और यह लीला—ये तीन ही जान सकेंगी। अन्य किसीके लिये भी इसका जानना असम्भव है। इसलिये जो ज्ञातव्य वस्तुका ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं अथवा जिन्होंने परम धर्मका आश्रय ग्रहण कर लिया है, वे ही आतिवाहिक अर्थात् ब्रह्मादि लोकोंको प्राप्त होते हैं। दूसरोंके लिये वह दुर्लभ है। महाप्रलयके अवसरपर जब सभी पदार्थोंका विनाश हो जाता है, उस समय केवल अनन्त चेतनाकाशस्वरूप शान्त सद्ब्रह्म ही शेष रहता है और जीवात्मा चेतनरूप होनेके कारण 'मैं तेजःस्वरूप सद्ब्रह्मका अंश हूँ' यों अनुभव करता है, जैसे तुम स्वप्नावस्थामें आकाशगमन आदिका अनुभव करती हो। तदनन्तर तेजोंऽशरूप वह जीवात्मा स्वयं ही अपनेमें स्थूलत्व लाभ करता है। फिर वह स्थूलत्व ही यह ब्रह्माण्ड कहा जाता है, जो असत्य होते हुए भी सत्य-सा प्रतीत होता है। उस ब्रह्माण्डके अन्तर्गत स्थित वह ब्रह्म यों समझता है कि 'यह ब्रह्मा मैं ही हूँ।' तब फिर वह अपने-आप मनोराज्यकी सृष्टि करता है। वही मनोराज्य यह जगत् है। उस प्रथम सृष्टिमें जो संकल्प-वृत्तियाँ जहाँ जिस रूपमें विकसित हुईं, वे वहाँ उसी रूपमें आज भी निश्चल भावसे स्थित हैं। प्रलयकालमें भी विश्वरूप परमात्माको सम्पूर्ण वस्तुओंसे शून्य कहना युक्त नहीं। भला, सुवर्ण कटक-कुण्डल आदि स्थानोंको छोड़कर कैसे रह सकता है। अर्थात् जैसे सुवर्ण कटकादिमें ओतप्रोत है, उसी तरह परमात्मा समस्त पदार्थोंमें व्याप्त है।

यद्यपि पृथ्वी आदि दृश्य-प्रपञ्च आकाशरूप है, तथापि सृष्टिके प्रारम्भमें जो जहाँ जिस रूपमें विकसित हुआ, वह आजतक भी वहाँ उसी रूपमें वर्तमान है। अपनी स्थितिसे विचलित होनेमें समर्थ न हो सका। वस्तुतः तो सृष्टिके आदिमें यह जगत् उत्पन्न ही नहीं हुआ था। यह जो कुछ अनुभव हो रहा है वह तो चिदाकाशरूप जीवात्माके संकल्पका विकास है। इसे स्वप्नकालमें घटित हुए स्त्रीप्रसङ्गकी भाँति कल्पित ही समझना चाहिये। सृष्टिके आदिमें चिदाकाशस्वरूप जीवात्मा आकाशका संकल्प करनेके कारण आकाशरूपताको और कालका संकल्प करनेके कारण कालरूपताको प्राप्त होता है।