संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति-प्रकरण] * राजा विदूरथकी मृत्यु, संसारकी असत्यता और द्वितीय लीलाकी वासणारूपताका वर्णन * १६१
प्राणवायुके रूपमें सूक्ष्मशरीर धारण कर लिया और मन- द्वारा चलायमान हो मुखछिद्रसे निकलकर इस देहका परित्याग कर दिया । तदनन्तर मरणानुकूल मूर्च्छाके उपरान्त जीवात्मारूपसे स्थित इस लीलाने इसी घरके आकाशमें बुद्धिमें संकल्पित पदार्थोंको देखा । फिर यह भावनावश पूर्वदेहकी स्मृति हो जानेसे स्वप्नकी तरह ब्रह्माण्डमण्डलके भीतर जाकर अपने पतिसे संयुक्त हो गयी ।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! तदनन्तर यह लीला, जिसे सरस्वतीद्वारा वर उपलब्ध हो चुका था, इसी वासनामय शरीरसे अपने पति राजा पद्मसे मिलनेके लिये आकाशमार्गसे ऊपरके लोकोंमें जानेको उद्यत हुई; उस समय पतिमिलनके सुखका विचार करके यह प्रबल प्रेमभाव- से संयुक्त हो आनन्दपूर्वक उड़ चली । वहाँ पहुँचकर इसे इसकी प्यारी कुमारी कन्या, जिसे सरस्वती देवीने ही वहाँ भेजा था, प्राप्त हुई, मानो वह लीलाके संकल्परूपी महान् दर्पणसे निकलकर आगे खड़ी हो गयी हो ।
कुमारीने कहा—सरस्वती देवीकी सहेली ! तुम्हारा स्वागत है। मैं तुम्हारी कन्या हूँ । सुन्दरि ! तुम्हारी ही प्रतीक्षा करती हुई मैं यहाँ आकाशमार्गमें खड़ी हूँ ।
तब लीलाने कहा—कमलनयनी देवि ! तुम मुझे स्वामीके समीप ले चलो ।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तब वह कुमारी 'मातः ! आओ, हम दोनों वहीं चल रही हैं'—यों कहकर लीलाके आगे होकर आकाशमें मार्गप्रदर्शन करने लगी । तत्पश्चात् वह लीला उसके पीछे-पीछे प्रस्थित हुई । आगे बढ़नेपर वह मेघमार्गको लाँघकर वायुमार्गमें प्रविष्ट हुई । फिर वहाँसे चलकर सूर्यमार्गसे निकलती हुई नक्षत्रमार्गमें गयी । उसे भी पार करके ब्रह्माण्ड-कपालमें जा पहुँची । वहाँ जानेपर, अपना चित्तमात्र ही जिसका शरीर है, वह लीला अपने हृदयमें यों अनुभव करने लगी कि निश्चय ही यह सारा दृश्य अपनी कल्पनाके स्वभावसे उत्पन्न हुआ भ्रम ही है । तदनन्तर ब्रह्माण्डके उस पार पहुँचकर वह जलादि आवरणोंको लाँघती हुई आगे बढ़नेपर महान् चेतनाकाशके मध्यमें प्रविष्ट हुई । वह चेतनाकाश इतना विस्तृत है कि यदि अत्यन्त वेगशाली गरुड़ भी उसके चारों ओर चक्कर लगायें तो सैकड़ों करोड़ कल्पोंमें भी उसके ओर-छोरका पता नहीं लगा सकते । जैसे महान् वनमें फलोंकी गणना नहीं हो सकती, उसी तरह उस चेतनाकाशमें लाखों क्या, असंख्य ब्रह्माण्ड हैं, जो परस्पर एक-दूसरेसे अलक्षित हैं। उन्हीं- मेंसे एक ब्रह्माण्डको, जो सामने उपस्थित एवं विस्तृत आवरणसे आवेष्टित था, वेधकर वह लीला उसके भीतर प्रविष्ट हुई—ठीक उसी तरह, जैसे कीड़ा बेरके फलमें छेद करके उसके भीतर घुस जाता है । तदनन्तर भूमण्डलमें राजा पद्मके राज्यान्तर्गत उसके नगरमें पहुँचकर उस मण्डपमें प्रवेश करके वह राजाके शवके निकट स्थित हुई । इतनेमें ही वह कुमारी सुन्दरी लीलाकी आँखोंसे ओझल हो गयी । जैसे पूर्ण ज्ञान हो जानेपर माया विनष्ट हो जाती है, उसी तरह वह भी कहीं चली