संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ ]
समक्ष ज्यों ही मूर्छित हुई त्यों ही तुम्हारे पति राजा पद्मके शवके निकट जा पहुँची है।
लीलाने पूछा—देवि ! यह पहले ही वहाँ पहुँचकर देहधारिणी कैसे हो गयी ? इसके मेरे सपत्नी-भावको प्राप्त होनेमें क्या कारण है ? तथा राजा पद्मके उस उत्तम राजमहलके जो निवासी हैं, वे इसे किस रूपमें देखते हैं और इसे क्या कहते हैं ?—यह सब मुझे संक्षेपसे बतलाइये।
श्रीदेवीजीने कहा—लीले ! तुमने मुझसे जैसा प्रश्न किया है, तदनुसार मैं सारी घटना तुमसे संक्षेपमें वर्णन करती हूँ; सुनो। यह दूसरी लीलाके रूपमें वर्तमान तुम्हारा ही वृत्तान्त है, जो तुम्हारी शङ्काओंका निर्णायक है। इससे मरण-परलोकगमन आदि भी, जिनका प्रत्यक्षीकरण होना कठिन है, तुम्हारे दृष्टिगोचर हो जायँगे। यह जो नगरादिरूपसे दृष्टिगोचर होनेवाला जगन्मय भ्रम है, उस अत्यन्त विस्तृत भ्रमको तुम्हारा पति यह राजा पद्म उसी शवयुक्त गृहमें देखता है। यहाँतक कि यह सामने घटित हुआ युद्ध भ्रमयुद्ध है। यह लीला भी भ्रान्तिस्वरूप ही है। यह जन-समुदाय जन्मादिरहित आत्मा है। यहाँकी मृत्यु भी भ्रान्तिसे ही दीख पड़ती है। इस प्रकार यह संसार भ्रमात्मक है। इसी भ्रमक्रमसे लीला इस राजा पद्मकी प्रेयसी भार्या हुई है। वरारोहे ! तुम और यह दोनों सुन्दरियाँ भी स्वप्नमात्र ही हो। जिस प्रकार इस राजाकी तुम दोनों सुन्दरी प्रियतमाएँ स्वप्नमात्र हो, उसी तरह तुम दोनोंका पति यह राजा और स्वयं मैं भी स्वप्नमात्र ही हूँ। इसी तरह जगत्की यह सारी शोभा भी भ्रमपूर्ण ही है और यहाँका दृश्यवर्ग भ्रममात्र कहा जाता है। इसी तरह यह लीला, तुम, यह संसारस्थिति, यह राजा पद्म और मैं—ये सबके सब परमात्माके सर्वव्यापक होनेके कारण उसी परमात्मामें सत्यरूपसे स्थित हैं। अतः महाचिद्घनकी स्थितिके सर्वात्मक होनेके कारण ये राजा आदि और हमलोग यथा-परस्पर एक-दूसरेके द्वारा प्रेरित होनेके कारण इस रूपमें परिणत हो गये हैं। जब इस लीलाके लिये पद्मकी मनोवासना जाग्रत् हुई, उसी समय यह तुम्हारे-सरीखे आकार-प्रकार धारण करके चैतन्यरूप चमत्कारमें प्रवृत्त हो गयी तथा तुम्हारे पतिदेवने अपनी मृत्युके अनन्तर शीघ्र ही इसे अपने सामने उपस्थित देखा; क्योंकि जिस समय चित्त वासनाभ्यासवश आधिभौतिक पदार्थोंका स्वप्नमें अनुभव करता है, उस समय उस अनुभवके कारण तब यह दृश्यवर्ग सत्य-सा प्रतीत होता है; वस्तुतः यह मिथ्या कल्पनामात्र ही; परंतु जब चित्त इस भौतिक जगत्के पदार्थोंका सत्यरूपसे अनुभव नहीं करता अथवा असत् समझता है, उस समय तदनुरूप दृढ़ वासनासे उसके मिथ्यात्वका निर्णय हो जाता है।
ये दोनों स्त्री-पुरुष जब स्मरणानुकूल मूर्च्छावस्थाको प्राप्त हुए, उसी समय इन्होंने पूर्ववासनाके जाग्रत् हो जानेके कारण अपने हृदयमें ऐसा अनुभव किया कि 'ये हमारे पिता हैं, ये हमारी माताएँ हैं। यह हमारा देश है। यह हमारी सम्पत्ति है। यह हमारा कर्म है। पूर्वजन्ममें हमने ऐसा ही कर्म किया था। इस प्रकार हम दोनोंका विवाह हुआ और इस रूपमें हम दोनो एकताको प्राप्त हुए।' इनका वह कल्पित जनसमूह भी उसी अवस्थामें सत्यताको प्राप्त हुआ। जैसे स्वप्नावस्थामें देखा हुआ पदार्थ सत्य-सा प्रतीत होता है, उसी तरह यहाँ भी यह दृष्टान्त है। लीले ! इस लीलाने 'मै विधवा न होऊँ' ऐसी भावनासे भावित होकर मेरी आराधना की थी तथा मैंने भी उसे मनोऽनुकूल वर प्रदान किया था। इसी कारण निश्चयही यह बालिका यहाँ पहले ही मृत्युको प्राप्त हुई है। तुम लोग व्यष्टिचेतन हो और मैं तुमलोगोंकी समष्टिचेतन-स्वरूपा कुलदेवी हूँ, अतः सदा पूजनीय हूँ। मैं अपने आप ही सब कुछ करती हूँ। जब इस लीलाके जीवने इसके शरीरसे उत्क्रमण करना चाहा, उसी क्षण उसने