भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 194

उत्पत्ति-प्रकरण] राजा विदूरथकी मृत्यु, संसारकी असत्यता और द्वितीय लीलाकी वासनारूपताका वर्णन * १५९

तदनन्तर 'भूमण्डलके एकच्छत्र सम्राट् राजा सिन्धुकी जय हो!' यों घोषणा करते हुए लोग प्रत्येक नगरमें भेरियाँ बजाने लगे। पुत्रके राज्याभिषेकके पश्चात् राजा सिन्धुने, जो विजयी होनेके कारण उन्नत-मस्तक था, युगान्तके समय जगत्‌की सृष्टि करनेके लिये प्रकट हुए दूसरे मनुकी भाँति प्रजाकी नयी व्यवस्थाके हेतु राजधानीमें प्रवेश किया। तत्पश्चात् राजा सिन्धुके नगरमें दसों दिशाओंसे हाथी-घोड़ोंके रूपमें भेंट आने लगी। मन्त्रियोंने तत्काल ही प्रत्येक दिशाओंके सामन्त राजाओंके पास राजकीय नियम, चिह्न और आदेश भेज दिये। फिर तो जैसे मन्थन-कालमें आवर्तोंके कारण क्षुब्ध हुआ क्षीरसागर मन्दराचलके निकाल लिये जानेपर तुरंत ही प्रकृतिस्थ हो गया था, उसी तरह अराजकताके कारण विक्षुब्ध हुआ सारा राष्ट्र दसों दिशाओंसहित शीघ्र ही शान्त हो गया।

(सर्ग ४६-५१)


राजा विदूरथकी मृत्यु, संसारकी असत्यता और द्वितीय लीलाकी वासनारूपताका वर्णन, लीलाके गमनमार्ग और स्वामी पद्मकी प्राप्तिका कथन, पदार्थोंकी नियति, मरणक्रम, भोग और कर्म, गुण एवं आचारके अनुसार आयुके मानका वर्णन, आदि-सृष्टिसे लेकर जीवकी विचित्र गतियों तथा ईश्वरकी स्थितिका निरूपण

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! इसी बीचमें मूर्च्छित होकर सामने पड़े हुए अपने स्वामीको, जिनका श्वासमात्र ही अवशेष रह गया था, देखकर लीलाने सरस्वतीसे कहा—'अम्बिके ! ये मेरे पतिदेव अब यहाँ अपनी देह-का उत्सर्ग करनेके लिये उद्यत हैं।'

श्रीसरस्वतीजीने कहा—लीले ! इस प्रकार महान् उद्योग-से परिपूर्ण, राष्ट्र-विप्लवकारी और परम विचित्र व्यवसायोंसे युक्त इस संग्रामके आरम्भ होने, चलने और समाप्त होनेपर यह राष्ट्र अथवा भूतल न तो कहीं कुछ भी उत्पन्न हुआ है और न नष्ट ही हुआ है; क्योंकि यह जगत् तो स्वप्नात्मक है। अनघे ! पूर्वोक्त गिरिग्राम-निवासी ब्राह्मणके घरके भीतर स्थित राजा पद्मके शवके निकटवर्ती आकाशमें वर्तमान अन्तःपुरके भीतर तुम्हारे पतिका यह भूतलरूप राष्ट्र प्रतीत हो रहा है। पुनः विन्ध्याद्रि-के ग्राममें वसिष्ठनामक ब्राह्मणके घरके अंदर यह राष्ट्रसहित ब्रह्माण्ड स्थित है। उसी ब्राह्मणके घरमें शवयुक्त गेह-जगत् वर्तमान है। उस शवयुक्त गेह-जगत्‌के मध्यमें इस गेह-जगत्-का अस्तित्व है। यो यह त्रिजगत्, जो महान् व्यवसायोंसे युक्त है, भ्रमरूप ही है तथा गिरिग्रामरूपी देहके मध्यभागमें स्थित आकाशकोशमें यह सागरसहित पृथ्वी दृष्टिगोचर हो रही है और तुमसे, मुझसे, इस लीलासे एवं इस विदूरथसे संयुक्त यह चेतन परमात्मा ही विकसित हो रहा है। इसलिये तुम उत्पत्ति-विनाशरहित उस परमपदरूप परमात्माको जानो। वह स्वयंप्रकाश, परम शान्त और निर्विकार है तथा मण्डपगृहके भीतर अपने चिन्मात्र स्वभावके कारण उदित हुए अपने आत्मा-में जगत्-रूपसे आभासित हो रहा है। यदि भ्रमका द्रष्टा ही न रहे तो भ्रममें भ्रमता कैसे होगी। अतः भ्रमकी सत्ता है ही नहीं। जो कुछ है, वह अविनाशी परमपदरूप परमात्मा ही है। उस परमात्माको तुम ऐसे समझो कि वह उत्पत्ति-विनाशरहित, स्वयंप्रकाश, शान्त, आदिरूप और निर्विकार होते हुए भी जगत्रूपसे प्रतीत हो रहा है। स्वप्नावस्थामें देहके अंदर देखे गये महापुरकी भाँति मेरु आदि पर्वत-समुदायद्वारा उपलक्षित यह सारा दृश्यवर्ग शून्यात्मकरूप ज्ञानमात्र ही है, इसमें स्थूलरूपता कुछ भी नहीं है। शुभे ! यह राजा पद्म जिस लोकमें शवरूपसे वर्तमान है, तुम्हारी यह सपत्नी लीला वहाँ पहले ही पहुँच गयी है। यह लीला तुम्हारे