संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
बाणोंद्वारा उनके स्थूल मस्तकको विदीर्ण करके उन्हें भूतपर गिराना ही चाहता है। देखो न, बडी कठिनाईसे होशमें आनेपर जब मेरे पतिदेव सारथिद्वारा लाये गये दूसरे रथपर चढ रहे थे, उसी समय इसने उनके कधेको काट दिया, जिससे वे रक्तके फौवारे छोड़ रहे हैं । हाय ! हाय ! अब तो और भी कष्टकी बात हुई,इस राजा सिन्धुने अपने खङ्गकी तीखी धारसे मेरे पतिदेवकी दोनों पिंडलियोको उसी प्रकार फाड़ डाला, जैसे आरेसे वृक्ष चीरा जाता है । हाय ! अब तो मैं बुरी तरह मारी गयी; क्योंकि मेरे पतिके दोनों घुटने भी मृणालकी तरह काट डाले गये ।' यों कहकर और पतिकी उस अवस्थापर दृष्टिपात करके पति-प्रेम और भयसे आतुर हुई वह लीला फरसेसे कटी हुई लताकी भाँति मूर्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी । विदूरथ यद्यपि जानुरहित हो गये थे, तथापि वे शत्रुपर प्रहार कर ही रहे थे । उसी अवस्थामें वे जड़से कटे हुए वृक्षकी तरह रथसे नीचे गिरना ही चाहते थे, तबतक सारथि उन्हे रथद्वारा संग्रामभूमिसे दूर हटा ले गया ।
जब ये भागे जा रहे थे, उस समय क्रूर-हृदय राजा सिन्धुने इनके गलेपर अस्त्र प्रहार किया, जिससे इनका आधा गला कट गया । फिर भी राजा सिन्धु इनका पीछा कर ही रहा था । तबतक राजा विदूरथ जैसे सूर्यकी किरणें कमलकोशमें घुस जाती है, उसी तरह रथद्वारा भागकर अपने महलमें जा पहुँचे; किंतु राजा सिन्धु उस राज-भवनमें प्रविष्ट न हो सका, क्योंकि वह महल सरस्वती देवीके प्रभावसे सुरक्षित था । वहाँ पहुँचकर सारथिने राजा विदूरथको, जिसके वस्त्र, कवच और शरीर खङ्गसे काटे गये गलेके छिद्रसे बुद्बुद ध्वनिके साथ निकलती हुई रक्तधाराओंसे सन गये थे, महलके भीतर ले जाकर भगवती सरस्वतीके समक्ष मरणशय्यापर लिटा दिया । इधर विपक्षी राजा सिन्धु महलमें प्रवेश न कर सकनेके कारण लौट गया ।
रघुनन्दन ! राजा विदूरथके मृत-तुल्य हो जानेपर जब 'रणभूमिमें प्रतिद्वन्द्वी राजाके हाथसे राजा विदूरथ मार डाले गये, राजा मारे गये' ऐसी खबर फैल गयी, तब सारा राष्ट्र भयभीत हो गया । उस समय विदूरथके राष्ट्रकी ऐसी दशा हो गयी थी कि वह शत्रु-राष्ट्रकी साधारण एवं सैनिक जनताके विजयोल्लासके शब्दसे मुखरित हो रहा था । उसमे स्वामियोसे रहित हो जानेके कारण हाथी, घोडे और वीर सैनिक टकराकर साधारण जनताको धराशायी कर रहे थे। कोषगृहके किंवाडोके तोडे जानेके कारण उठा हुआ घर्घर शब्द चारों ओर गूँज रहा था। शत्रुपक्षका मन्त्रिमण्डल राजा सिन्धुके पुत्रका अभिषेक-कार्य सम्पन्न करनेके लिये आदेश देनेमें तत्पर था। राजा सिन्धुकी रानियाँ नगरकी शोभा देखनेके लिये झरोखों एवं अन्य बनाये गये छिद्रोंपर बैठ रही थीं । अभिषिक्त हुए राजा सिन्धुके पुत्रका जय-जयकारके सैकडों उच्च घोषोके साथ-साथ प्रबल प्रभाव फैला हुआ था। स्वपक्षीय असंख्य नरेशोने राजा सिन्धुद्वारा बनायी गयी राष्ट्रमर्यादाको नतमस्तक होकर स्वीकार कर लिया था ।