संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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अङ्गों (सिर, दो हाथ, दो चरण, गुह्यस्थान, नाभि और हृदय) से सम्पन्न है तो भी इसे व्यथा, विमोह, मूर्च्छा, भ्रम, व्याधि और अचेतनता—ये सब कष्ट प्राप्त होते हैं। इसका क्या कारण है ?
श्रीदेवीजीने कहा—भद्रे ! स्पन्दनशक्ति-सम्पन्न ईश्वरने सृष्टिके आदिमें ही सुख-दुःखादि-प्रारब्धभोगरूप कर्मका इस रूपमें विधान कर दिया है कि मदंशभूत जीवको उसकी आयुके इस-इस समयमें उसके कर्मानुसार इतने कालतक भोगने योग्य इस प्रकारका सुख-दुःख प्राप्त होगा। जिस समय नाड़ियोंमें प्रविष्ट हुई वायु बाहर नहीं निकलती और निकली हुई उनमें प्रवेश नहीं करती, उस समय उनका स्पन्दन रुक जाता है। तब नाडीशून्य हो जानेके कारण प्राणीकी मृत्यु हो जाती है। जब वायु न प्रवेश करती है और न बाहर ही निकलती, तब शरीरसे नाड़ियोंके वियुक्त हो जानेके कारण लोग यों कहने लगते हैं कि 'यह मर गया।'
ज्ञानवृत्तिका वेदनरूप स्वभाव बाधारहित है, इसलिये जन्म-मरण उस स्वाभाविक ज्ञानवृत्तिसे पृथक् नहीं हैं। (अर्थात् जबतक मनुष्यमें अविद्या रहेगी, तबतक उसे जन्म-मरणसे छुटकारा नहीं मिल सकता; क्योंकि ये उसके लिये स्वाभाविक ही हैं। केवल मुक्ति होनेपर ही उनसे छुटकारा मिलता है।) जैसे लंबी लताके बीच-बीचमें गाँठें होती हैं, उसी तरह चेतन सत्ताके भी मध्य-मध्यमें जन्म-मरण होते हैं। वस्तुतः तो चेतन पुरुष न कभी जन्मता है और न कभी मरता है। पुरुष स्वप्नकालके सम्भ्रमकी भाँति केवल भ्रमसे ही इन जन्म-मरणादिको देखता है; क्योंकि चेतनामात्र ही तो पुरुष है; फिर वह कब और कहाँ नष्ट हो सकता है। यदि पुरुष (जीवात्मा) को चेतनसे अतिरिक्त मानें तो बताओ, दूसरा कौन पुरुष हो सकता है ? अतः चेतनामात्र ही पुरुष है—यही बात ठीक है। भला, बताओ तो सही—क्या आजतक इस संसारमें किसीने किसीके चेतनको किसी प्रकार मरा हुआ देखा है ?
अरे ! यह तो सरासर असम्भव है; क्योंकि लाखों शरीर मरते देखे जाते हैं और चेतन अविनाशी ही बना रहता है। यों वास्तवमें न तो कोई मरता है और न कोई जन्म ही लेता है। केवल जीव वासनारूपी आवर्तके गड्डोंमें गोते लगाता रहता है। जगद्भयसे भीत होकर जीव जब अभ्यासद्वारा भ्रमवश प्रतीत होते हुए जगत्-प्रपञ्चको 'यह वास्तवमें हुआ ही नहीं है'—यों सम्यक् रूपसे समझ लेता है, तब वह पूर्णतया वासनाओंसे रहित होकर विमुक्त हो जाता है। इस प्रकार विमुक्त आत्मस्वरूप ही यहाँ सत्य वस्तु है। इसके अतिरिक्त सब असत् है।
प्रबुद्ध लीलाने पूछा—देवेशि ! प्राणी जिस प्रकार मरता है और फिर वह जैसे पैदा होता है, उस प्रसङ्गको ज्ञानकी वृद्धिके लिये आप पुनः मुझसे विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।
श्रीदेवीजीने कहा—लीले ! नाड़ियोंकी गति रुक जानेपर जब प्राणी प्राणवायुओंकी विपरीत स्थितिको प्राप्त होता है, तब उसकी चेतना शान्त-सी हो जाती है। इसीको मरण कहते हैं। वास्तवमें चेतन सर्वथा शुद्ध और नित्य है। उसकी न तो उत्पत्ति होती है और न उसका विनाश ही होता है। वह स्थावर, जंगम, आकाश, पर्वत, अग्नि और वायु—सभीमें स्थित है। केवल प्राणवायुकी गति अवरुद्ध हो जानेसे जब शरीरकी चेष्टा पूर्णरूपसे शान्त हो जाती है, तब यह शरीर, जिसका दूसरा नाम 'जड' है, 'मृत' कहा जाता है। जब यह शरीर शवरूपमें परिवर्तित हो जाता है और प्राणवायु अपने कारणरूप महावायुमें विलीन हो जाती है, तब वासनारहित चेतन अपने आत्मतत्त्वमें स्थित हो जाता है। फिर पुनर्जन्मको बीजभूत वासनासे युक्त एवं सूक्ष्म शरीरवाला वह व्यष्टिचेतन 'जीव' नामसे पुकारा जाता है। शरीरके मरनेके बाद लौकिक व्यवहार करनेवाले लोग उस जीवको 'प्रेत' शब्दसे पुकारते हैं और चेतन गन्ध मिली हुई वायुके समान