संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 200, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति-प्रकरण] * राजा विदूरथकी मृत्यु, संसारकी असत्यता और द्वितीय लीलाकी वासनारूपताका वर्णन * १६५
वासनाओंसे संयुक्त हो जाता है। जब वह जीव इस शरीरादि दृश्यका परित्याग करके देहान्तरका दर्शन करनेके लिये उत्सुक होता है, उस समय उसकी स्वप्न एवं मनोराज्यकी भाँति नाना आकृतियाँ हो जाती हैं। फिर उसी प्रदेशके अंदर वह पूर्वजन्मकी तरह स्मरणशक्तिसे युक्त हो जाता है और तभी मरणकालकी मूर्च्छाके पश्चात् वह अन्य शरीरको देखने लगता है।
लीले ! मरनेके बाद जीवको जो प्रेत कहा जाता है, वे प्रेत छः प्रकारके होते हैं। उनके इस भेदको सुनो— साधारण पापी, मध्यम पापी, स्थूल पापी, सामान्य धर्मवाले, मध्यम धर्मवाले और उत्तम धर्मात्मा। इनमेंसे किसीके दो भेद और किसीके तीन भेद भी होते हैं। कोई पाषाणतुल्य हृदयवाला एवं अत्यन्त मूढ़ महापातकी अपने अन्तःकरणमें एक वर्षतक स्मृति-मूर्च्छाका अनुभव करता है। तत्पश्चात् समयानुसार चेतनाको प्राप्त होकर वासनारूपी स्त्रीके उदरसे उत्पन्न हुए अक्षय नारकीय दुःखोंका चिरकालतक अनुभव करके एक महान् दुःखसे दूसरे दुःखको प्राप्त होता हुआ सैकड़ों योनियोंका भोग करता है। तब कभी स्वप्न-सम्भ्रमरूपी संसारमें शान्तिको प्राप्त होता है अर्थात् उसके कर्मफल-भोगोंकी निवृत्ति होती है। अथवा मरण-मूर्च्छाके अन्तमें उसी क्षण वे हृदयस्थित वृक्षादि स्थावर योनियोंका ही जो सैकड़ो जड़ दुःखोंसे व्याप्त हैं, अनुभव करते हैं और फिर चिरकालतक नरकमें अपनी-अपनी वासनाओंके अनुरूप दुःखोंका भोग करके भूतलपर नाना योनियोंमें जन्म धारण करते हैं। (यह महापातकीकी गतिका वर्णन है।) अब जो मध्यम पापी है, उसकी गतिका वर्णन करते हैं। वह मृत्युकालिक मूर्च्छाके अनन्तर कुछ कालतक पाषाण-तुल्य जड़ताका अनुभव करता है। तत्पश्चात् जब उसे चेतना प्राप्त होती है, तब वह कुछ कालके बाद अथवा उसी समय तिर्यगादि क्रमसे नाना योनियोंका भोग करके संसारको प्राप्त होता है। जो कोई साधारण पापी होता है, वह मरते ही अपनी वासनाओंके अनुसार प्राप्त हुए अविकल मानव-देहका अनुभव करता है। उसी क्षण पूर्वसंस्कारके अनुसार उसकी स्मृतिका उदय होता है और स्वप्न एवं मनोराज्यकी भाँति उसके अनुभवमें वैसी ही वस्तुएँ आने लगती हैं। जो सर्वश्रेष्ठ महान् पुण्यात्मा है, वे मृत्युजनित मूर्च्छाके पश्चात् पूर्व-वासनाकी स्मृतिसे स्वर्गलोक तथा विद्याधरोंके सुखका भलीभाँति उपभोग करते हैं। फिर पुण्यफलभोगके अनन्तर अपने कर्मान्तर अर्थात् पापकर्मके अनुसार प्राप्त हुए फलको अन्यत्र भोगकर मनुष्यलोकमें धनी सत्पुरुषोंके घरमें जन्म धारण करते हैं। जो मध्यम धर्मात्मा होते हैं, वे मरणमूर्च्छाके बाद आकाशवायुसे आन्दोलित होकर उत्तम वृक्षों और पल्लवोंसे सुशोभित उपवनमें जाते हैं और वहाँ अपने पुण्यकर्मोंका फल भोग लेनेके बाद मनुष्योंके हृदयमें प्रविष्ट होते हैं। फिर रेतःसिञ्चनके समय जन्म-क्रमानुकूल स्त्रियोंके गर्भमें स्थित होते हैं।
इस प्रकार प्रेत मृत्युजनित मूर्च्छाके अनन्तर अपनी वासनाके अनुसार अपने हृदयमें इस व्यवस्थाका क्रमशः अथवा क्रमरहित ही अनुभव करते हैं। वे यह जानते हैं कि 'हमलोग पहले मृत्युको प्राप्त हुए। तदनन्तर बन्धुओंद्वारा क्रमशः पिण्डादि दान करनेसे हम पुनः आतिवाहिक-शरीरधारी होकर उत्पन्न हुए। तत्पश्चात् हाथोंमें कालपाश लिये हुए ये यमदूत आ पहुँचे। अब इन यमदूतोंद्वारा ले जाया जाता हुआ मैं क्रमशः यमपुरीको जाऊँगा।' उन प्रेतोंमें जो उत्तम पुण्यात्मा होता है, वह यों समझता है कि 'ये दिव्य एवं मनोहर विमान और उपवन मुझे बारंबार अपने शुभ कर्मोंसे ही प्राप्त हुए हैं। इसके विपरीत पापी पुरुष यों अनुभव करता है कि 'ये जो बरफकी चट्टानें, काँटे, गड्ढे और तलवारकी धारके समान तीखे पत्तोंसे पूर्ण वन मुझे प्राप्त हुए हैं, ये मेरे अपने ही दुष्कर्मोंके फलरूपसे उत्पन्न हुए हैं।' मध्यम पुण्यात्मा जानता है कि, यह मार्ग, जो मेरे सामने उपस्थित है, इसमें आनन्दपूर्वक पैदल चला जाता