भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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१६६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

है, शीतल और हरी घास उगी हुई है । यह घनी छायासे आच्छादित है और स्थान-स्थानपर बावलियोंसे युक्त है।' मध्यम पापी यों अनुभव करता है कि 'यह मैं यमपुरीमें पहुँच गया । ये प्राणियोंके राजा यमराज हैं और यहाँ मेरे कर्मोंके विषयमें यह विचार किया गया ।' इस प्रकार संसारका विशाल अंश, जो सत्य-से प्रतीत होनेवाले सम्पूर्ण पदार्थों और उनकी क्रियाओंसे प्रकाशमान है, प्रत्येकको प्राप्त होता है । आकाशकी तरह स्वरूप-रहित वह प्रपञ्च देश, काल और क्रियाके विस्तारसे देदीप्यमान होते हुए भी कुछ नहीं है, किंतु सर्वारोपशून्य एवं विशिष्ट ज्ञानसम्पन्न आत्मा ही सब कुछ है ।

(यमपुरीमें पहुँचनेपर जीव कहता है—) अब मुझे यमराजका आदेश प्राप्त हो गया है, अतः मैं अपने कर्मोंका फल भोगनेके लिये शीघ्र ही यहाँसे उत्तम स्वर्गलोक अथवा नरकमें जाता हूँ । यमराजने मेरे लिये जिस स्वर्ग अथवा नरकका निर्देश किया था, मैंने उसका भोग कर लिया तथा यमनिर्दिष्ट उन-उन योनियोंमें भी भटक चुका । अब मैं पुनः संसारमें जन्म ग्रहण करूँगा । यह मैं धानका अङ्कुर होकर उत्पन्न हुआ । फिर क्रमशः बढ़कर फलरूपमें स्थित हुआ ।' इस प्रकार शरीराभावके कारण जब उसकी सारी इन्द्रियाँ भलीभाँति सोयी रहती हैं, उसी अवस्थामें वह भुक्तान्नादिद्वारा पुरुषके शरीरमें प्रवेश करके वीर्यरूपमें परिणत हो जाता है । वही वीर्य जब माताकी योनिमें पड़ता है, तब वह गर्भका रूप धारण करता है । वही गर्भ अपने पूर्वजन्मके कर्मानुसार उत्तम अथवा निकृष्ट प्रारब्धसे युक्त हो संसारमें मनोहर आकृतिवाले बालकके रूपमें जन्म लेता है । कुछ कालके बाद वह चन्द्रमाके समान मनोहर तथा कामोन्मुख जवानीका अनुभव करता है । तत्पश्चात् विकसित कमलपर गिरे हुए तुषाररूपी वज्रकी तरह उसे वृद्धावस्था आ घेरती है। उस बुढ़ापेमें भी किसी-न-किसी व्याधिके निमित्तसे ही उसका मरण होता है। पुनः उसे मृत्युजनित मूर्च्छा प्राप्त होती है। पुनः स्वप्नकी भाँति बन्धुओंद्वारा दिये गये पिण्डादिद्वारा सूक्ष्मशरीरकी प्राप्ति होती है और फिर वह यमलोकको जाता है । वहाँसे पुनः नाना योनियोंकी प्राप्ति होनेपर उनमें वह भ्रमण-क्रमका ही बारंबार अनुभव करता है । इस प्रकार इस वेगशाली परिवर्तनका वह तबतक पुनः-पुनः अनुभव करता रहता है, जबतक उसे मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो जाती।

प्राणियोंके शरीरोंमें जो छिद्रस्थान हैं, उनमें प्रविष्ट हुई वायु जब अङ्गोंमें चेष्टा उत्पन्न करती है, तब लोग कहते हैं कि यह जीवित है । परंतु ऐसी स्थिति सृष्टिके आदिमें केवल जङ्गम प्राणियोंमें ही उत्पन्न हुई थी, इसी कारण ये वृक्ष आदि स्थावर प्राणी सचेतन होते हुए भी चेष्टाहीन हैं । जब जीवात्मा मनुष्यादिशरीररूप दूसरे नगरमें पहुँचता है, तब वहाँ बुद्धिको चक्षु आदि इन्द्रिय-गोलकोंमें ले जाकर उनके द्वारा बाह्यपदार्थोंका अनुभव करता है—जैसे आकाश शून्यतासे, पृथ्वी धारणशक्तिसे और जल आप्यायनशक्तिसे युक्त है । तात्पर्य यह कि जीवात्मा स्वेच्छासे जिसके लिये जैसी कल्पना करता है, वह वैसा ही अपने शरीरको जानता है । इस प्रकार सर्वव्यापी परमात्मा जंगमरूपसे जंगमकी और स्थावररूपसे स्थावरकी कल्पना करता हुआ सबके शरीररूपसे स्थित है । इसलिये जो जंगम जगत् है, उसे उसने अपनी कल्पनाके अनुसार जैसा समझा था, वह आज भी उसी रूपमें वर्तमान है । जैसे जिन वृक्ष, शिला, पेड़-पौधों और तृण आदिको स्थावर होनेके कारण जड समझा गया था, वे आज भी वैसे ही स्थित हैं; क्योंकि न तो जडता ही कोई पृथक् वस्तु है और न चेतन ही । इन पदार्थोंकी सृष्टि, स्थिति और विनाशमें कोई भेद नहीं है और न सत्तासामान्यमें ही कोई अन्तर है अर्थात् सबमें सत्ता समान है । यथार्थ बात तो यह है कि वृक्षों और पर्वतोंके अंदर जो उनकी जडता एवं नाम-रूप आदि भेद परिलक्षित होते हैं, वे जीवात्माकी बुद्धिद्वारा विहित