भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उत्पत्ति-प्रकरण] * राजाविदूरथकावासनामययमपुरीमेंगमन,लीलाऔरसरस्वतीद्वारा उसका अनुगमन * १६७


हैं, वस्तुतः नहीं हैं। वही जीवात्मा स्थावरादिके भीतर 'मैं स्थावर हूँ' ऐसी बुद्धिसे स्थित होनेके कारण जंगमसे भिन्न नाम और अभिमानका विषयभूत होकर वृक्षादि अन्य स्वरूपोंसे स्थित है। कृमि, कीट और पतङ्गोंके अंदर संवित्-रूपसे वर्तमान जीवात्मा ही उनकी बुद्धिका रूप धारण करता है और वही अनेकविध नाम-रूपोंसे व्यवहृत होता है। सभी स्थावर-जंगम अपने-अपने अनुभवमें ही लीन हैं, परन्तु जब वे एक-दूसरेसे सम्बन्धित होते हैं, तब उनमें 'यह स्थावर है और यह जंगम है' यों संकेतकी आवश्यकता पड़ती है। चेतन तो परमार्थरूपसे स्थावर-जंगम सभीमें वर्तमान है, परंतु जंगम प्राणियोंमें वायुके प्रवेश करनेसे चेष्टाएँ होती हैं और स्थावरोंमें नहीं होतीं। जिस प्रकार विश्वके समग्र पदार्थोंके स्वभावका विकास होता है और जैसे वे असत्य होते हुए भी सत्य-से प्रतीत होते हैं, वह सब वृत्तान्त मैंने तुम्हें बतला दिया। अब उधर देखो, ज्ञात होता है, यह राजा विदूरथ मृत्युको प्राप्त होकर तुम्हारे पति राजा पद्मके, जो पुष्पमालाओंसे आच्छादित शवके रूपमें स्थित हैं, हृदयान्तर्गत पद्मकोशमें प्रवेश करनेकी इच्छासे जाना चाहता है।

प्रबुद्ध लीलाने पूछा—देवेश्वरि ! बताइये, यह राजा विदूरथ किस मार्गसे उस शवमण्डपमें जानेका इच्छुक है ? जिससे हम दोनों भी उसे देखती हुई ही उस उत्तम मण्डपमें शीघ्र ही जायें।

श्रीदेवीजीने कहा—लीले ! 'मैं दूरवर्ती दूसरे लोकको जाता हूँ' इस भावनासे यह चिन्मय जीवात्मा मनुष्य वासनाके अंदर स्थित मार्गका अवलम्बन करके जाता है। यों तुम्हें जिस मार्गसे जाना अभीष्ट हो, उसी मार्गसे हम दोनों जाती हैं; क्योंकि एक-दूसरेकी इच्छाका विघातन प्रेम-बन्धनका हेतु नहीं होता।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! इस प्रकार श्रेष्ठ राजाकी कन्या लीलाके विशुद्ध मनमें जब परमार्थ दृष्टि-रूप पूर्वोक्त कथाके श्रवणसे सारे संताप मिट गये तथा ज्ञानरूपी सूर्यका प्रसार हो गया, तब राजा विदूरथ चित्तके विलीन हो जानेके कारण जड अर्थात् मृत्युकालिक मूर्च्छाके वशीभूत हो गया। (सर्ग ५२–५५)


राजा विदूरथका वासनामय यमपुरीमें गमन, लीला और सरस्वतीद्वारा उसका अनुगमन और पूर्वशरीरकी प्राप्तिका वर्णन, लीलाके शरीरकी असत्यताका कथन, समाधिमें स्थित लीलाके शरीरका विनाश, लीलाके साथ वार्तालाप और राजा पद्मके पुनरुज्जीवनका कथन, राजाके जी उठनेसे नगर और अन्तःपुरमें उत्सव, लीलोपाख्यानके प्रयोजनका विस्तारसे कथन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इसी बीच राजा विदूरथकी आँखोंकी पुतलियाँ उलट गयीं। होंठ सूखकर श्वेत हो गये। उसके शरीरकी सभी इन्द्रियोंके मूर्च्छित हो जानेपर केवल सूक्ष्मप्राण ही शेष रह गया। मुखकी छवि पुराने पीले पत्तेकी कान्तिके समान क्षीण एवं पीली हो गयी। भौंरेके गुंजारके सदृश श्वासवायुकी ध्वनि होने लगी। उसका मन महाप्रयाणकालिक मूर्च्छाके अन्धकूपमें डूब गया। नेत्र आदि सारी इन्द्रियोंकी वृत्तियाँ अन्तर्लीन हो गयीं। इस प्रकार वह चेतनाशून्य हो गया। चित्रलिखित पुरुष-सरीखे उसका आकारमात्र ही दीख पड़ता था। शिलापर खुदे हुएकी भाँति उसके शरीरके सम्पूर्ण अवयव निश्चेष्ट हो गये थे। इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ ? जैसे आकाशचारी पक्षी गिरनेके संनिकट पहुँचे हुए अपने निवासभूत वृक्षको छोड़ देता है, उसी प्रकार प्राणने स्वाधिष्ठित थोड़े-से शरीरांशसे चलकर राजाके शरीरका परित्याग कर दिया।

उस समय जैसे प्राणमयी ज्ञानवृत्ति वायुमें स्थित सूक्ष्म