भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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१६८ * अविच्छिन्नसच्चिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


गन्धका अनुभव करती है, उसी प्रकार उन दोनों देवियोंने, जिन्हें दिव्यदृष्टि प्राप्त थी, आकाशमार्गसे जाते हुए उस जीवको देखा। फिर तो वे दोनों नारियाँ उसी जीवात्माका अनुसरण करने लगीं—ठीक उसी तरह, जैसे दो भ्रमरियाँ वायुमें मिली हुई गन्धकलाका अनुगमन करती हैं। तदनन्तर दो घड़ीके पश्चात् जब मरण-मूर्च्छा शान्त हुई, तब जीवात्मा आकाशमें सुगन्धयुक्त वायुके स्पर्शसे प्रबुद्ध हो गया। उस समय उसने यमदूतोंको, उनके द्वारा ले जाये जाते हुए अपने वासनामय शरीरको तथा बन्धुओंद्वारा किये गये पिण्डदान आदिसे उत्पन्न हुए अपने स्थूलशरीरको भी देखा। फिर उसी मार्गसे बहुत दूरतक आगे जानेपर वह यमराजकी नगरीमें जा पहुँचा, जो प्राणिसमुदायसे घिरी हुई थी और जहाँ उनके कर्मफलोंपर विचार किया जा रहा था। वहाँ पहुँचनेपर यमराजने इसके कर्मोंपर विचार करके यह आदेश दिया कि 'यह सदा निर्मल पुण्यकर्मोंका ही अनुष्ठान करता रहा है। इसने कभी भी पापकर्म नहीं किया है। साथ ही सरस्वती देवीके वरदानसे इसके पुण्योंकी विशेषरूपसे वृद्धि हुई है। इस उपर्युक्त बातको समझकर तुमलोग इसे छोड़ दो और यह अपने पूर्वजन्मके शरीरमें, जो शवरूपमें पुष्पोंसे आच्छादित मण्डपाकाशमें वर्तमान है, वहाँजाकर प्रवेश करे।' यों आदेश पानेपर यमदूतोंने उसे आकाशमार्गमें लाकर छोड़ दिया। तदनन्तर वह जीवात्मा, लीला और सरस्वती—ये तीनों एक साथ आकाशमार्गसे उड़ते हुए आगे बढ़े। उस समय यद्यपि सरस्वती और लीला मूर्तिमती थीं, तथापि वह जीवात्मा उन्हें देख नहीं रहा था, जबकि वे उसे देख रही थीं। इस प्रकार वे दोनों उस जीवात्माका अनुसरण करती हुई आकाश-मण्डलको लाँघकर लोकान्तरोंको पार करती हुई दूसरे ब्रह्माण्डमें जा पहुँचीं। पुनः शीघ्र ही वहाँसे निकलकर दूसरे ब्रह्माण्डमें गयीं। फिर उस भूमण्डलसे

चलकर वे दोनों संकल्परूपिणी देवियाँ उस जीवात्माके साथ राजा पद्मके नगरमें आयीं और वहाँ तुरंत ही स्वच्छन्दतापूर्वक लीलाके अन्तःपुरके मण्डपमें प्रविष्ट हुईं।

श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जिसका शरीर मर चुका था, उस जीवात्माको मार्गका परिज्ञान कैसे हुआ ? और वह उस शवके निकटवर्ती मण्डपमें कैसे पहुँचा ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघव ! उस जीवकी अपनी वासनाके अन्तर्गत शवकी भावना विद्यमान थी, जिससे उसके हृदयमें वह मार्ग आदि सब कुछ स्फुरित हो गया; फिर उसे उस गृहकी प्राप्ति कैसे न हो। क्योंकि जैसे किसी अन्य स्थानमें स्थित पुरुष दूर देशान्तरमें रखे हुए अपने खजानेको अनवरत उसकी मानसिक भावनाके कारण सदा सम्यक् रूपसे देखता रहता है, उसी प्रकार सैकड़ों जन्मोंके चक्करमें पड़ा हुआ भी जीव अपनी वासनाके अंदर स्थित अपने अभीष्टको देखता है।

श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! जिसके लिये पिण्डदान