भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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उत्पत्ति-प्रकरण ] * राजा विदूरथका यमपुरीमें गमन तथा लीला एवं सरस्वतीद्वारा उसका अनुगमन * १६९


दिया ही नहीं जाता, उसमें पिण्डदानादि वासनाका कारण तो है नहीं; फिर उस वासनासे रहित स्वरूपवाला जीव किस प्रकार शरीरको प्राप्त होता है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! बन्धुओं द्वारा पिण्ड दिया गया हो अथवा न दिया गया हो; परंतु यदि 'मैंने पिण्डदान किया है' ऐसी वासना हृदयमें भलीभाँति उत्पन्न हो जाय तो वह पुरुष पिण्डफलका भागी हो जाता है; क्योंकि अनुभूतियाँ बतलाती हैं कि जैसा चित्त होता है, वैसा ही वह प्राणी होता है। यह नियम जीवित अथवा मृत—किसी भी प्राणीमें कहीं भी अन्यथा नहीं होता। पदार्थोंकी सत्यता उनकी भावना—वासनाके अनुसार ही होती है और वह भावना कारणभूत पदार्थोंसे उत्पन्न होती है; क्योंकि जो स्वयं नित्य प्रकाशस्वरूप है, एकमात्र उस ब्रह्मके अतिरिक्त दूसरे किसी कार्यकी उत्पत्ति कारणके बिना हुई हो, ऐसा तो महाप्रलयपर्यन्त न तो कहीं देखा गया और न इस विषयमें कुछ सुना ही गया। जैसे स्वप्नमें जीव विविध पदार्थोंके रूपमें कल्पित हुआ दीख पड़ता है, उसी तरह चेतन जीवात्मा ही उस वासनाका रूप धारण करता है। वही कार्य-कारणभावको प्राप्त होता है और वही निश्चल-सा होकर स्थित होता है। देश, काल, क्रिया और द्रव्यके संयोगसे भावना अर्थात् वासनाका उदय होता है। वह वासना जिस ( सत्य एवं असत्य ) फलरूप विषयमें उत्पन्न होती है, वही विषय दोनोंमें अधिक जयशील होता है। यदि धर्मदानाकी वासना प्रवृत्त हुई हो तो उससे क्रमशः प्रेतकी बुद्धि पूर्ण हो जाती है अर्थात् दाताकी वासनाके अनुसार प्रेतको अवश्य फल मिलता है। यों परस्परकी विजयके कारण इस विषयमें जो अत्यन्त वीर्यशाली होता है, वही विजयी होता है; इसलिये उत्तम यत्नद्वारा शुभ कर्मोंका अभ्यास करना चाहिये।

पूर्ववर्णनके अनुसार लीला और सरस्वती देवी राजा पद्मके उस राजमहलमें जा पहुँचीं, जिसका भीतरी

सं० यो० व० अं० ७—

भाग अत्यन्त मनोरम था। चारों ओर पुष्पोपहारसे व्याप्त होनेके कारण वह वसन्त-सा शीतल लगता था। वह उन नगर-निवासियोंसे युक्त था, जिनकी राजकार्य करनेकी तत्परता पूर्णरूपसे शान्त हो गयी थी। वहाँ उन दोनोंने एक कमरेमें रखे हुए शवको देखा, जो मन्दार और कुन्दपुष्पकी मालाओंसे आच्छादित था। उस शवके सिरहाने जलसे पूर्ण उत्तम कलश आदि माङ्गलिक पदार्थ रखे थे। उस कमरेके दरवाजे और खिड़कियोंकी साँकलें बंद थीं और उसकी निर्मल दीवारें दीपकके प्रकाशके प्रशान्त हो जानेके कारण मलिन दीख पड़ती थीं। वह एक ओर सोये हुए लोगोंके मुखसे निकली हुई श्वासवायुसे व्याप्त था।

तदनन्तर उन दोनोंने उस शवमण्डपमें विदूरथकी शवशय्याके पार्श्वभागमें स्थित लीलाको देखा, जो पहले मृत्युको प्राप्त हो चुकी थी और पहले ही वहाँ आ गयी थी। उसके वेष, आचरण, शरीर और वासनाएँ—सभी पहलेके ही सदृश थे। उसकी आकृति पूर्वजन्मकी-