भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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१७० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

सी थी । नखसे शिखातक उसके सारे अङ्ग सुन्दर थे। उसका रूप और अङ्गोंकी चेष्टाएँ पूर्ववत् थीं। जैसे वस्त्र वह पूर्वजन्ममें पहनती थी, वैसे ही वस्त्रोंसे उसका शरीर आच्छादित था और पहलेके-से आभूषणोंसे भी वह विभूषित थी। केवल इतना ही अन्तर था कि वह राजा पद्मके महलमें स्थित थी। उस समय उसके हाथमें चँवर सुशोभित था, जिसे वह सुन्दर ढंगसे राजाके ऊपर डुला रही थी। इस प्रकार उन दोनों (सरस्वती और प्रबुद्ध लीला) ने तो उस लीलाको देखा, परंतु वह उन दोनोंको न देख सकी। इसका कारण यह था कि वे दोनों सत्यसंकल्पस्वरूपा थीं और वह उनकी भाँति सत्यसंकल्पसे आविर्भूत नहीं हुई थी।

वत्स राम ! यह सारा जगत् आत्मा ही है। ऐसी दशामें देहादिकी कल्पना कहाँसे हो सकती है। तुम जो कुछ देख रहे हो, वह आनन्दरूप सद्ब्रह्म ही है और वही चेतन है। जिस पुरुषको स्वप्नकालमें 'मैं हरिन हूँ' ऐसी बुद्धि उत्पन्न हुई हो, वह क्या जागनेपर अपने मृगस्वरूपका अभाव हो जानेपर स्वप्नकालिक मृगको खोजता है ! नहीं । जो अज्ञानी होता है, उसकी दृष्टिमें सत्यका तिरोधान और असत्यका आविर्भाव शीघ्र होता है, परंतु रस्सीमें उत्पन्न हुई सर्पभ्रान्तिके मिट जानेपर क्या पुनः उसमें सर्पभ्रम हो सकता है ! कदापि नहीं। इस प्रकार जो जन्म-मरणशील शरीरको ही आत्मा माननेवाले हैं, वे सभी अज्ञानी स्वप्न-तुल्य इस मिथ्या सृष्टिका चिरकालतक सत्यकी तरह अनुभव करते रहते हैं। किंतु आत्मतत्त्वका यथार्थ ज्ञान होनेसे 'देहमें आत्मबुद्धि करना भ्रममात्र ही है' यों उनकी उस भ्रान्तिका उपशम हो जाता है—ठीक उसी तरह, जैसे रस्सीका ज्ञान होनेसे उसमें उत्पन्न हुई सर्पबुद्धि नष्ट हो जाती है। वस्तुतः तो शरीर क्या था ? किसकी सत्ता थी ? कहाँ और किस तरह किसका विनाश हुआ ? परमार्थतः जो वस्तु थी, वही रह गयी, केवल अज्ञान मिट गया। जब रस्सीमें उत्पन्न हुई सर्पबुद्धिकी भाँति यह सारी प्रतीति भ्रान्तिमात्र ही है, तब उसके उत्पन्न होनेपर क्या बढ़ गया और नष्ट होनेपर क्या नष्ट हुआ ? अर्थात् उसके आने-जानेमें कोई हर्ष-विषाद नहीं है।

श्रीरामजीने पूछा—प्रभावशाली गुरुदेव ! पद्मके राज-महलमें पूर्वलीला और नूतन लीलाका समागम होनेके पश्चात् जो उस भवनके निवासी थे, वे लीलाकी सत्यसंकल्पताके कारण यदि उसे देखते हैं तो उसके बाद उसे क्या समझते हैं ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघव ! उस समय वे लोग ऐसा जानते हैं कि यहाँ ये दुखिया महारानी खड़ी हैं और उनकी यह कोई दूसरी सखी भी कहींसे आ गयी है। जैसे जाग जानेपर ज्ञान हो जानेसे स्वप्नदृष्ट शरीर न जाने कहाँ विलीन-सा हो जाता है, इसलिये वह असत्य ही है, वही दशा यहाँ इस पाञ्चभौतिक स्थूल-शरीरकी भी है। (अर्थात् ज्ञान होनेपर इसका भी विनाश होता है, अतः यह भी असत्य ही है।) स्वप्नभ्रान्ति अथवा मनकी कल्पनामें जो पर्वत आदि पदार्थ उत्पन्न होते हैं, वे सभी बुद्धिवृत्तिके अंदर उसी प्रकार विलीन हो जाते हैं, जैसे सारी चेष्टाएँ वायुमें अन्तर्भूत हो जाती हैं। बुद्धिवृत्ति ही स्वप्न आदि पदार्थोंकी प्रतीतिद्वारा पर्याप्तरूपसे स्फुरित होती है, परंतु वही स्फुरित न होनेपर उस स्वप्नके साथ एकताको प्राप्त होकर तद्रूप हो जाती है। जैसे जल और उसका द्रवत्व अथवा वायु और उसकी गति दो नहीं हैं, उसी प्रकार बुद्धिवृत्ति और स्वाप्निक पदार्थोंमें कभी भेद नहीं पाया जाता। उनमें जो भेद-सा प्रतीत होता है, वही सबसे बढ़कर अज्ञान है। वही 'संसार' कहा गया है और वह संसार मिथ्याज्ञानरूप ही है। सहकारी कारणों-का अभाव होनेपर भी स्वप्नकालमें बुद्धिवृत्ति और स्वप्न-दृष्ट पदार्थोंका भेद निरर्थक ही है। स्वप्नमें जैसे असत् नगरकी प्रतीति होती है, उसी तरह सृष्टिके आदिमें