संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 206, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति-प्रकरण ] * राजा विदूरथका यमपुरीमें गमन तथा लीला एवं सरस्वतीद्वारा उसका अनुगमन * १७१
असत् जगत्का भान होता है; अतः जैसे स्वप्न असत् हैं, वैसे ही जाग्रत् भी असत् है; इसमें संशय नहीं है। जैसे जाग जानेपर स्वप्नदृष्ट पर्वतका तत्काल ही अभाव हो जाता है, उसी प्रकार तत्त्वज्ञान होनेपर इस पाञ्चभौतिक संसारका श्रवण-मनन-निदिध्यासनादि क्रमसे अथवा ईश्वरानुकम्पासे अभाव हो जाता है। ये सृष्टियाँ मिथ्यादृष्टियाँ ही हैं; क्योंकि ये मोहदृष्टियाँ हैं अर्थात् अज्ञानसे इनका दर्शन होता है। जो मायारूपसे प्रतीत होनेवाले केवल संसारकी भ्रान्ति है और जो स्वप्नकी अनुभूतियाँ हैं, वे सभी अर्थशून्य हैं। भ्रमसे जड संसारका दर्शन करनेवाले पुरुषके मरणान्तकालमें स्वप्नानुभूति-सदृश जो ये सृष्टिकी प्रत्यक्ष प्रतीतियाँ हैं, वे सब-की-सब यद्यपि आतिवाहिक शरीरमें प्रविष्ट हो चुकी हैं, तथापि भ्रमवश मृगतृष्णाकी नदीके प्रवाहकी भाँति मिथ्या प्रकट हुई-सी प्रतीत होती हैं। वास्तवमें तो वे मनके अंदर ही हैं।
इसी बीचमें सरस्वती देवीने मनकी चेष्टाके समान विदूरथके जीवात्माको अपने सत्यसंकल्पसे पुनः शीघ्र ही अवरुद्ध कर दिया।
तब श्रीसरस्वती देवी लीलासे बोलीं—वत्से ! तुम अपने सत्यसंकल्पवश अत्यन्त निर्मल सूक्ष्मशरीरसे युक्त दिखायी देती हो, इसलिये तुम्हारे ऊपर लोगोंको आश्चर्य हो रहा है। बाले ! अपने शरीरके प्रति तुम्हारी जैसी वासना थी, तदनुरूप ही तुम्हें शरीर मिला है। इसी कारण पूर्वजन्मके रूपके समान ही तुम्हारा रूप प्रकट हुआ है; क्योंकि सब लोग अपनी वासनाके अनुसार ही सब पदार्थोंको देखते हैं। सिद्धसुन्दरि ! तुम सूक्ष्म-शरीरसे सम्पन्न हो, अतः तुम्हारा वह पूर्वजन्मका शरीर तुम्हें भूल गया है, इसी कारण उसपर तुम्हारी वासना नहीं रह गयी है। जिस ज्ञानी पुरुषकी सूक्ष्मदृष्टि दृढ़मूल हो जाती है, उसका पाञ्चभौतिक शरीर दूसरों-द्वारा देखा जाता हुआ भी सूक्ष्म ही है। आज हमलोग इस मण्डपाकाशमें प्राप्त हुई हैं। इस समय प्रभातकाल होनेपर मैंने इन दोनों दासियोंको निद्रासे मोहित कर दिया है; अतः लीले ! आओ, तबतक हम दोनों अपने सत्यसंकल्पके विलासद्वारा इस लीलाको अपना स्वरूप दिखलायें। अब हमलोगोंका कार्य आरम्भ होना चाहिये।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! देवी सरस्वतीके ज्यों ही ऐसा विचार किया कि 'यह लीला तबतक हम दोनोंको देखे', त्यों ही वे दोनों दीप्तिमती देवियाँ ( सरस्वती और प्रबुद्ध लीला ) वहाँ प्रकट हो गयीं। उनके प्रत्यक्ष होते ही विदूरथपत्नी लीलाकी आँखें चौंधिया गयीं। उसने देखा कि वह घर उन देवियोंके तेजःपुञ्जसे देदीप्यमान हो गया है। इस प्रकार उस प्रदीप्त गृह और अपने समक्ष लीला और सरस्वती—उन दोनों देवियोंको उपस्थित देखकर वह बड़ी उतावलीके साथ उठ खड़ी हुई और फिर उनके चरणोंमें पड़कर यों कहने लगी—'देवियो ! आप जीवन प्रदान करनेवाली हैं, आपकी जय हो। आपलोगोंकी सेविका मैं यहाँ पहले ही आ पहुँची हूँ। अब मेरे कल्याणोत्कर्षके लिये आप दोनोंका शुभागमन हुआ है।' उसके यों कहनेपर यौवनके मदसे मतवाली वे तीनों मानिनियाँ वहाँ आसनोंपर विराजमान हुईं।
तब श्रीसरस्वती देवी बोलीं—वत्से ! तुम इस देशमें कैसे आयीं ? तथा मार्गमें अथवा कहाँपर तुमने कौन-सी आश्चर्यजनक घटना देखी ? तुम आदिसे लेकर यह सारा वृत्तान्त वर्णन करो।
विदूरथ-पत्नी लीलाने कहा—देवि ! उस समय विदूरथके गृहप्रदेशमें जब मैं मूर्च्छित हो गयी, तब परमेश्वरि ! उस मरण-मूर्च्छाके पश्चात् मैं क्या देखती हूँ कि मैं