भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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१७२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

होशमें आकर उठ बैठी हूँ और फिर शीघ्र ही आकाश-मण्डलमें उड़ चली हूँ। तत्पश्चात् उस भूताकाशमें मैं वायुरूपी रथपर सवार हो गयी हूँ। वही रथ मुझे इस घरतक ले आया है। देवि! तब मैंने इस भवनको देखा, जो शवरूप राजा पद्मसे सुशोभित था। उसके भीतर दीपकका प्रकाश फैल रहा था। यह अत्यन्त स्वच्छ और बहुमूल्य शय्यासे युक्त था। तदनन्तर जब मैं अपने इन पतिदेवका अवलोकन करने चली, तब क्या देखती हूँ कि जिनका सारा अङ्ग पुष्पोंसे आच्छादित है, वे राजा विदूरथ यहाँ उसी प्रकार सो रहे हैं। मानो पुष्पवनमें वसन्त शयन कर रहा हो। देवेश्वरि! तब मैंने यह सोचा कि 'ये संग्रामरूपी कार्यके अधिक परिश्रमसे थक गये हैं, इसीलिये गाढ़ निद्रामें सो रहे हैं।' अतः मैंने इनकी यह निद्राभङ्ग नहीं की। इसके बाद ही आप दोनों देवियों इस स्थानपर पधारी हैं। मुझपर अनुग्रह करनेवाली देवि! इस प्रकार मुझे जैसा अनुभव हुआ था, वह सब आपसे कह सुनाया।

तब श्रीसरस्वती देवी बोलीं—लीले! तुम दोनोंके नेत्र बड़े सुन्दर हैं और चलनेका ढंग हंसकी चालके समान मनोहर है। अच्छा, अब हम इस राजाको शवशय्यासे उठाती हैं। यों कहकर सरस्वती देवीने कमलिनीद्वारा बिखेरी गयी सुगन्धकी भाँति राजाके जीवात्माको छोड़ दिया। तब वायुरूपधारी वह जीव राजाकी नासिकाके निकट गया और उसके नासारन्ध्रमें प्रविष्ट हो गया—ठीक उसी तरह, जैसे वायु बाँसके छिद्रमें प्रवेश करती है। उस समय वह अनन्त वासनाओंसे युक्त था। फिर तो जैसे अनावृष्टिके कारण मुरझाया हुआ कमल अच्छी जलवृष्टि होनेसे पुनः विकसित हो जाता है, उसी तरह जीवके अंदर प्रवेश करनेपर राजा पद्मका विवर्ण हुआ मुख पुनः पूर्ववत् कान्तिमान् हो गया। तदनन्तर उसके सारे अङ्ग क्रमशः चेष्टाशील होकर सुशोभित होने लगे, जैसे पर्वतकी लताएँ वसन्तको पाकर प्रफुल्लित हो जाती हैं। तब उसने अपने उन नेत्रोंको, जिनकी पुतलियाँ निर्मल और चञ्चल थीं, खोल दिया। तत्पश्चात् वह बढ़ते हुए विन्ध्य पर्वतके समान अपने शरीरको शय्यासे ऊपर उठाते हुए उठ बैठा और मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोला—'यहाँ कौन है?' तबतक दोनों लीलाएँ उसके आगे उपस्थित होकर बोलीं—'महाराज! आज्ञा दीजिये!' जब उसने दो लीलाओंको, जिनके आचार, आकार, रूप, मर्यादा, वचन, उद्योग, आनन्द और अभ्युदय सभी एक-से थे, नम्रतापूर्वक अपने सामने खड़ी देखा, तब उनकी ओर ध्यानपूर्वक देखते हुए पूछा—'तुम कौन हो? और यह कौन है तथा यह कहाँसे आयी है?' यह सुनकर पूर्वलीलाने उससे कहा—'देव! मैं जो कुछ कहती हूँ, उसे सुनिये। मैं आपकी पूर्वजन्मकी सहधर्मिणी रानी हूँ। मेरा नाम लीला है। अर्थसंयुक्त वाणीकी तरह मैं सदा आपके सम्बन्धसे सुशोभित हूँ। यह दूसरी लीला भी आपकी रानी है। इसे मैं क्रीडावश आपके उपभोगके लिये ले आयी हूँ। आप इसकी रक्षा करें। स्वामिन्! सिरहानेकी ओर स्वर्णसिंहासनपर बैठी हुई ये कल्याणकारिणी सरस्वती देवी हैं। ये तीनों लोकोंकी जननी हैं। भूपाल! हमलोगोंके पुण्यबाहुल्यसे ये साक्षात् यहाँ पधारी हैं। ये ही हम दोनोंको परलोकसे यहाँ लायी हैं।'

लीलाकी यह बात सुनकर राजा, जिसके नेत्र कमलके समान सुन्दर थे और शरीरपर लटकती हुई माला और वस्त्र सुशोभित थे, शय्यासे उठ गया और सरस्वतीके चरणोंमें पड़कर कहने लगा—'देवी सरस्वति! आप सबको कल्याण प्रदान करनेवाली हैं, आपको नमस्कार है। वरदायिनि! मुझे मेधा, दीर्घायु और धन