संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति-प्रकरण ] * राजा विदूरथका यमपुरीमें गमन तथा लीला एवं सरस्वतीद्वारा उसका अनुगमन * १७३
प्रदान कीजिये।' यों कहते हुए राजाके सिरपर सरस्वती देवीने हाथ फेरते हुए कहा—'पुत्र! तुम अपने अभीष्ट पदार्थों तथा राजमहलसे पूर्णतया सम्पन्न हो जाओ एवं तुम्हारी सारी आपत्तियाँ और समस्त पापबुद्धियाँ विनष्ट हो जायें और तुम्हें प्रचुरमात्रामें अनन्त सुखकी प्राप्ति हो। तुम्हारे राज्यमें प्रजा सदा आनन्दित रहे तथा सम्पत्तियाँ स्थिर होकर सदा विकसित होती' रहें।'
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलभूषण राम! सरस्वती देवी यों कहकर उस राजमहलमें ही अन्तर्धान हो गयीं। प्रातःकाल होनेपर कमलोंके विकसित होनेके साथ ही सभी लोग निद्रा त्यागकर जाग पड़े। तदनन्तर क्रमशः राजाने लीलाका और लीलाने मृत्युको प्राप्त होकर पुनरुज्जीवित हुए अपने प्रियतम राजाका महान् आनन्दके साथ बारंबार आलिङ्गन किया। उस समय उस राजसदनकी विचित्र ही शोभा थी। उसके सभी निवासी आनन्दमें निमग्न थे। वह जय-ध्वनि और माङ्गलिक पुण्याहवाचनके उच्च स्वरसे निनादित हो रहा था। उसका आँगन राजपुरुषोंसे ठसाठस भरा था। प्रजाजनोंद्वारा लाये जाते हुए उपहार परस्पर टकरा जानेसे गिर जाते थे, जिससे उसकी समतल भूमि ऊँची-नीची हो गयी थी। उस उत्सवके अवसरपर मस्तकपर पुष्पमाला धारण किये हुए लोगोंके आने-जानेसे उसकी विशेष शोभा हो रही थी। वह मन्त्रियों, सामन्त राजाओं और नगरवासियोंद्वारा बिखरे गये माङ्गलिक पदार्थोंसे आच्छन्न था। उस समय 'पूर्वलीला दूसरी लीला रानीको एवं अपने पति महाराज पद्मको परलोकसे ले आयी है' यों अनेकविध गाथाओंके रूपमें लोग देश-देशान्तरमें इसका गान करते थे। राजा पद्मने अपने मरण आदिके वृत्तान्तको, जो संक्षेपमें वर्णन किया गया था, सुनकर भृत्योंद्वारा लाये गये चारों सागरोंके जलसे स्नान किया। तत्पश्चात् ब्राह्मणों, मन्त्रियों और भूपालोंने उसका अभिषेक किया। उस समय पूर्वलीला, द्वितीय लीला और राजा पद्म—ये तीनों जीवन्मुक्त और महान् ज्ञानसम्पन्न हो गये थे। इस प्रकार पृथ्वीपति पद्मको अपने पुरुषार्थके बलसे तथा भगवती सरस्वतीके प्रसादसे त्रिलोकीका वह श्रेय प्राप्त हुआ। तदनन्तर सराहनीय गुणोंसे युक्त राजा पद्म, जिसे सरस्वतीद्वारा उपदिष्ट ज्ञानके प्रभावसे भलीभाँति आत्मतत्त्वका बोध हो चुका था, दोनों लीलाओंके साथ वहाँ राज्यशासन करने लगा। अपने उस उत्तम राज्यका, जो प्रजाओंके नित्य अभ्युदयसे निर्दोष, शास्त्रानुकूल होनेसे विद्वानोंको भी मुग्ध करनेवाला, समुचित, आत्महितकारी और सारी जनताके लिये संतोषप्रद था, चिरकालतक पालन करके अन्तमें वे श्रेष्ठ दम्पति (लीला और राजा पद्म) विमुक्त हो गये।
वत्स राम! मैंने इस पवित्र लीलोपाख्यानका दृश्यरूप दोषकी निवृत्तिके लिये तुमसे वर्णन किया। वस्तुतस्तु दृश्यसत्ता शान्त ही है। जब वह है ही नहीं, तब उसके लिये 'शमन' का प्रयोग करना उपयुक्त नहीं