भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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१७४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

है; क्योंकि सत् अर्थात् विद्यमानके मार्जनके लिये ही प्रयास किया जाता है, असत्‌के लिये कभी नहीं। तत्त्वज्ञ पुरुष आकाश-सरीखे निर्मल ज्ञानसे ज्ञेयरूप दृश्यको ब्रह्ममें विलीन समझकर आकाशके समान निर्मल बना रहता है। यदि कहो कि पृथ्वी आदिसे रहित स्वतःसिद्ध स्वयम्भू सच्चिदानन्द ब्रह्मने ही इस दृश्यकी कल्पना की है तो उसने उसे अपनेमें ही सिद्ध किया है। चेतनाकाशरूप परमात्माका अवभास ही 'जगत्' नामसे समझा जाता है। यह उस विशुद्ध सच्चिदानन्दघन परमात्माके किसी एक अंशमें स्थित है। यह सब कुछ जिस रूपमें देखा गया था, वह ज्यों-का-त्यों अखण्ड-रूपसे स्थित है। यह अनन्त सृष्टि मायासे उत्पन्न होनेके कारण माया ही है और माया कोई सत्य वस्तु नहीं।

निष्पाप राम ! जिस-जिस पुरुषको जिस समय जिस रूपसे जिस-जिस पदार्थकी प्रतीति होती है, वह-वह पुरुष उसी समय उसी प्रकार उस-उस पदार्थका पूर्णरूप-से अनुभव करता है। जैसे विषको सदा अमृत ही समझते रहनेसे वह अमृतत्वको प्राप्त हो जाता है, उसी तरह शत्रुके प्रति सदा मित्रभाव रखनेसे वह मित्र बन जाता है। इन पदार्थोंके निजी स्वरूपकी जैसी भावना की गयी, वह भावित स्वरूप ही चिरकालके अभ्याससे स्वभाव बन गया। चेतन परमात्माका स्वभाव ही विकासशील है। वह जैसे और जिस रूपमें विकसित होता है, शीघ्र ही वैसा हो जाता है। इसमें उसका स्वभाव ही एकमात्र कारण है। इसी कारण दुखी पुरुषके लिये जो रात्रि कल्पके समान लंबी प्रतीत होती है, वही सुखीके लिये एक क्षण-सदृश लगती है—जैसे स्वप्नमें एक क्षण कल्प-सा हो जाता है। उस क्षणभरके स्वप्नमें मनुष्य यों देखता है कि अभी-अभी मेरी मृत्यु हो गयी, पुनः मैं पैदा हुआ और तरुण होकर युवावस्थामें स्थित हूँ। फिर सौ योजन दूर चला गया हूँ। परंतु ध्यानद्वारा जिसका चित्त प्रक्षीण हो गया है अर्थात् जो निर्विकल्प समाधिमें स्थित है, उसके लिये न दिन है न रात्रि। परमात्माके ध्यानमें मग्न योगीकी दृष्टिमें न जगत् सत्य है न जगत्‌के पदार्थ ही। महाबाहो ! यह जगत्, जैसी उसके सम्बन्धमें भावना होती है, तदनुकूल ही प्रतीत होने लगता है—जैसे मधुरमें निरन्तर कटुताकी भावना करनेसे वह कटु-सा लगने लगता है और कटुमें मधुरकी भावना करनेसे वह माधुर्यसे युक्त-सा अनुभूत होता है तथा शत्रुमें मित्रबुद्धि रखनेसे वह मित्र एवं मित्रमें शत्रुबुद्धि करनेसे वह शत्रु हो जाता है। जो शास्त्राध्ययन और जप आदि पदार्थ हैं, जिनका पहले अभ्यास नहीं किया गया है, उनकी भावनाका अभ्यास करनेसे निश्चय ही समता प्राप्त होती है। नौकारोही अतएव भ्रमपीडित लोगोंकी भावनासे पृथ्वी चलती हुई-सी प्रतीत होती है; परंतु जो उस प्रकारके भावनाभ्रमसे रहित हैं अर्थात् तटपर ही स्थित हैं, उन्हें वैसा अनुभव नहीं होता। जैसे स्वप्नद्रष्टाकी भावनासे स्वप्नमें शून्य स्थान भी जनाकीर्ण प्रतीत होने लगता है, उसी तरह अज्ञानवश भावनासे ही सर्वथा नीला आकाश कभी पीत और कभी शुक्ल-सा अनुभूत होने लगता है तथा उत्सव आपत्ति-सरीखा विषादजनक हो जाता है।

जैसे सुवर्णके भीतर द्रवत्व वर्तमान है, परंतु वह दृष्टिगोचर नहीं होता, उसी तरह परब्रह्मके अंदर यह सृष्टि स्थित है। जैसे स्वप्नमें एक मनुष्यका दूसरेके साथ युद्ध हुआ, वह स्वप्नकालमें सत्य होते हुए भी जागनेपर असत्य ही है, उसी तरह मायाकाशमें स्थित यह स्वात्मारूप जगत् भी मायिक दृष्टिसे सत् होते हुए भी तात्त्विक दृष्टिसे असत् ही है; महाकल्पके अन्त और सृष्टिके आदिमें यह जगत् सच्चिदानन्दस्वरूप ही है। पीछे यह असत् जगत् कारणत्व अर्थात् परमात्माको प्राप्त हो जाता है, परंतु वास्तविक परमात्मा किसीमें लीन नहीं होता। इस ब्रह्माके मुक्त हो जानेपर यदि उस परमात्माकी स्मृतिसे उत्पन्न