भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उत्पत्ति-प्रकरण ] * सृष्टिकी असत्यता तथा सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन * १७५


दूसरे ब्रह्मा हों तो उनकी स्मृतिरूप ज्ञानसे प्रकट हुई सृष्टिमें ज्ञानमात्र ही स्थित है। जो जीवात्मा अभ्यास-वैराग्य आदि तीव्र साधनोंसे युक्त है, अतएव विषयभोगोंसे विचलित न होता हुआ मोक्षपर्यन्त एकाकारवृत्तिसे रहता है, वही परम स्थिरता—मोक्षको प्राप्त होता है। इस प्रकार सहस्रों सृष्टियोंके बारंबार उत्पन्न होने, स्थित होने और नष्ट होनेपर जीवसमूहोंमेंसे किसीको न तो कोई वस्तु प्राप्त है और न अप्राप्त ही; क्योंकि जब पदार्थोंकी सत्ता है ही नहीं, तब फिर उन्हें प्राप्त-अप्राप्त कैसे कहा जा सकता है। अतः यह सब कुछ आवरण-रहित शान्तस्वरूप सच्चिदानन्द परमात्मा ही है।

जैसे पत्र, पुष्प, फल और शाखा आदि अंशोंसे युक्त वृक्ष एकरूपसे भलीभाँति स्थित है, उसी तरह अनन्त एवं सर्वशक्तिमान् परमात्मा एकरूपसे ही लोकोंमें व्याप्त है। जब अनादि परमपद-स्वरूप परमात्माका ज्ञान हो जाता है, तब प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण आदि मायिक रूपवाले जगत्‌का विस्मरण हो जाता है। फिर किसीको कभी उसकी स्मृति नहीं होती। जैसे स्वच्छ जल चाहे निश्चल हो अथवा लहरियोंके थपेड़े खा रहा हो—दोनों अवस्थाओंमें जलके स्वरूपमें भेद न होनेसे वह एकरूप ही है, उसी प्रकार दिशा और कालरूपमें व्यक्त होनेपर भी परमात्मा सदा एकरस, अनादि और विशुद्ध है। वह सम्पूर्ण विकारोंके उदय और नाशसे रहित होनेके कारण अज्ञानका प्रकाशक, आदि, मध्य और अन्तसे परे तथा एकरूपसे स्थित है। केवल विशुद्धज्ञानरूप ब्रह्मकी स्वरूपभूता विभा द्वैत और ऐक्यविषमक संकल्प-विकल्प करनेके कारण 'अहम्, त्वम्' इत्यादि जगत्‌के रूपसे प्रतीत होती है—ठीक उसी तरह, जैसे आकाश-मण्डलमें उसकी अपनी शून्यता परिलक्षित होती है।

( सर्ग ५६–६० )


सृष्टिकी असत्यता तथा सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ज्ञानवान् पुरुष सब प्रकारकी सारी भ्रान्तियोंको सच्चिदानन्दघन परमात्माके ही अंदर सदा स्थित जानता है, इसलिये वास्तवमें सब सर्वस्वरूप अजन्मा परमात्मा ही है। इस तरह परब्रह्म परमात्माकी सर्वरूपता ही उसकी समता है। शब्दों और अर्थोंका सारा ज्ञान ब्रह्म ही है, ब्रह्मसे भिन्न नहीं। जैसे कंगनका रूप सुवर्णसे और तरङ्गकी सत्ता जलसे कभी पृथक् नहीं हो सकती, उसी प्रकार जगत् परमेश्वरसे भिन्न नहीं है। यह ईश्वर ही जगत्-रूप है। ईश्वरमें उससे पृथक् जगत्‌का रूप नहीं है। सोना ही कंगन आदिके रूपमें उपलब्ध होता है। सोनेमें कंगनकी पृथक् सत्ता नहीं है। जैसे स्फटिक-शिलाके भीतर भेद न होनेपर भी उसमें प्रतिबिम्बित वन-पंक्तियोंका भेदपूर्वक समावेश प्रतीत होता है (प्रति-बिम्बित वस्तुएँ अपनी आधारभूत शिलासे भिन्न न होनेपर भी जैसे भिन्न-सी प्रतीत होती हैं), उसी प्रकार सच्चिदानन्दघन परब्रह्ममें अभिन्न रूपसे स्थित जगत् और अहंकी अज्ञानके कारण भेदयुक्त प्रतीति होती है। अथवा जैसे शिल्पी शिला-को खोदकर उसमें विभिन्न मूर्तियोंका निर्माण करता है, वे मूर्तियाँ उस शिलासे भिन्न न होनेपर भी भ्रमवश भिन्न-सी जान पड़ती हैं, उसी प्रकार मनरूपी शिल्पीने चिद्घन परमात्मामें जिस जगत् और अहंकी कल्पना की है, वह उससे भिन्न नहीं है, तथापि अज्ञानवश भेदकी प्रतीति होती है। वास्तवमें वह चिद्घनरूप ही है। जैसे तरङ्गशून्य जलके भीतर तरङ्गें स्थित हैं, उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मामें सृष्टि-शब्दार्थसे शून्य सृष्टियाँ स्थित हैं। वास्तवमें न तो सृष्टिमें परब्रह्म है और न परब्रह्ममें सृष्टि ही है।