भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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१७६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

जैसे वायु अपनेमें ही स्पन्दकी कल्पना करती है, उसी प्रकार परमार्थ-चिन्मय ब्रह्म अपनी ज्ञानवृत्तिसे अपने ही गूढ़ स्वरूपको प्रपञ्चके रूपमें अभिव्यक्त कर देता है। वास्तवमें वह उसका अपना चिन्मय स्वरूप ही होता है। शब्द-तन्मात्रा, जो पहले अपने कारणमें लीन थी, सर्वशक्तिमयी मायाके चमत्कारसे युक्त रूपको धारण-कर चित्तसे अन्तःकरणमें उठनेवाले संकल्पकी भाँति जब चिन्मय आकाशके समान स्फुरित होती है, तब उसीको आकाशका आविर्भाव कहते हैं। वही (आकाश-भावको प्राप्त हुआ ब्रह्म ही) स्वयं अपनेमें अपनी ही सत्तारूप वायुभावका अनुभव करता है, जिसके भीतर स्पर्श-तन्मात्राका संस्कार उद्बुद्ध होता है। उसकी अनुभूति वैसी ही है, जैसे पवन अपनेमें स्पन्दनका अनुभव करता है। वायुभावको प्राप्त हुआ ब्रह्म ही स्वयं अपनेमें अपनी ही सत्तारूप प्रकाशभावका अनुभव करता है, जिसके भीतर रूपतन्मात्राका संस्कार उद्बुद्ध होता है। उसकी यह अनुभूति वैसी ही है, जैसे तेज प्राकट्य-का अनुभव करता है। वह तेजोमय ब्रह्म ही स्वयं अपनेमें अपनी ही सत्तारूप-जलभावका अनुभव करता है, जिसके भीतर रसतन्मात्राका संस्कार उद्बुद्ध होता है। उसकी यह अनुभूति वैसी ही है, जैसे जल अपनी द्रवताका अनुभव करता है। वह जल-रूपताको प्राप्त हुआ ब्रह्म ही अपने चित्तसे अभिन्नरूप पृथ्वीभावका अनुभव करता है, जिसके भीतर गन्धतन्मात्रा स्थित होती है। उसकी यह अनुभूति भी वैसी ही है, जैसे पृथ्वी अपनेमें स्थैर्य-कलाका अनुभव करती है।

जो नित्य एकरस प्रकाशसे युक्त है, सृष्टि और प्रलय जिसके भीतर हैं, जो जन्म और विनाशसे रहित, रोग-शोकसे शून्य तथा शुद्ध है, वह ब्रह्म बिना किसी आधारके अपने आपमें ही स्थित है। उस परमार्थ सत्य वस्तु (परब्रह्म परमात्मा) का यथार्थ ज्ञान होनेपर परम गतिरूप मोक्ष प्राप्त हो जाता है। उक्त परमार्थ-वस्तु सृष्टियुक्त होनेपर भी सर्वथा सम (विषमतासे रहित) ही है।

जैसे अग्निमें जो प्रकाश है, वह उससे भिन्न न होनेपर भी भिन्न-सा प्रतीत होता है, उसी प्रकार सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें जो यह जगद्रूपी प्रकाश है, वह उनसे भिन्न न होकर भी भिन्न-सा जान पड़ता है। भिन्नरूपसे दिखायी देना ही उसका असत्य रूप है और अभिन्नरूपसे दीखना ही उसके सत्य रूपका दर्शन है।

जैसे गीली मिट्टीमें अव्यक्तरूपसे खिलौने मौजूद हैं, जैसे काष्ठमें खुदाई करके प्रकट न की हुई कठपुतली मौजूद है और जैसे स्याहीके चूर्णमें अक्षर स्थित हैं, उसी तरह परब्रह्म परमात्मामें नाना प्रकारकी सृष्टियाँ विद्यमान हैं। यद्यपि ब्रह्म-तत्त्वरूपी मरुभूमिमें त्रिलोक-रूपिणी मृगतृष्णा असत्य ही है, तथापि मायावश सत्य-सी प्रतीत होती है। वह ब्रह्मसे अभिन्न होती हुई भी भिन्न-सी भासित होती है। जैसे दूधका मिठास, मिर्चका तीखापन, जलकी तरलता और पवनका स्पन्दन उससे भिन्न नहीं है, उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मामें यह सर्ग अनन्यभावसे स्थित है। उससे भिन्नरूपमें उसका कोई अस्तित्व नहीं है। परमात्मामें लीन होकर वह चिन्मात्र स्वरूपसे स्थित होता है, परमात्माका अपना ही स्वरूप धारण करता है। कोई भी वस्तु कहीं और कभी भी न तो प्रकट होती है और न लयको ही प्राप्त होती है। सब कुछ सुन्दर शिलाके घनीभूत स्वरूपकी भाँति शान्त, अनादि, निराकार, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही है। जैसे जलके भीतर गुप्त और प्रकटरूपसे तरंग आदि रहते हैं, उसी तरह जीवमें जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि शक्तियाँ गुप्त और प्रकट रूपसे विद्यमान रहती हैं। 'पुरुष जिस-जिस वस्तुकी ओरसे विरक्त होता है, उस-उससे मुक्त होता जाता है। (जो सब ओरसे निवृत्त हो जाता है, उसे अणुमात्र दुःखका भी अनुभव नहीं होता है।)' इस