संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
उत्पत्ति-प्रकरण] * राजाविदूरथकावासनामययमपुरीमेंगमन,लीलाऔरसरस्वतीद्वारा उसका अनुगमन * १६७
हैं, वस्तुतः नहीं हैं। वही जीवात्मा स्थावरादिके भीतर 'मैं स्थावर हूँ' ऐसी बुद्धिसे स्थित होनेके कारण जंगमसे भिन्न नाम और अभिमानका विषयभूत होकर वृक्षादि अन्य स्वरूपोंसे स्थित है। कृमि, कीट और पतङ्गोंके अंदर संवित्-रूपसे वर्तमान जीवात्मा ही उनकी बुद्धिका रूप धारण करता है और वही अनेकविध नाम-रूपोंसे व्यवहृत होता है। सभी स्थावर-जंगम अपने-अपने अनुभवमें ही लीन हैं, परन्तु जब वे एक-दूसरेसे सम्बन्धित होते हैं, तब उनमें 'यह स्थावर है और यह जंगम है' यों संकेतकी आवश्यकता पड़ती है। चेतन तो परमार्थरूपसे स्थावर-जंगम सभीमें वर्तमान है, परंतु जंगम प्राणियोंमें वायुके प्रवेश करनेसे चेष्टाएँ होती हैं और स्थावरोंमें नहीं होतीं। जिस प्रकार विश्वके समग्र पदार्थोंके स्वभावका विकास होता है और जैसे वे असत्य होते हुए भी सत्य-से प्रतीत होते हैं, वह सब वृत्तान्त मैंने तुम्हें बतला दिया। अब उधर देखो, ज्ञात होता है, यह राजा विदूरथ मृत्युको प्राप्त होकर तुम्हारे पति राजा पद्मके, जो पुष्पमालाओंसे आच्छादित शवके रूपमें स्थित हैं, हृदयान्तर्गत पद्मकोशमें प्रवेश करनेकी इच्छासे जाना चाहता है।
प्रबुद्ध लीलाने पूछा—देवेश्वरि ! बताइये, यह राजा विदूरथ किस मार्गसे उस शवमण्डपमें जानेका इच्छुक है ? जिससे हम दोनों भी उसे देखती हुई ही उस उत्तम मण्डपमें शीघ्र ही जायें।
श्रीदेवीजीने कहा—लीले ! 'मैं दूरवर्ती दूसरे लोकको जाता हूँ' इस भावनासे यह चिन्मय जीवात्मा मनुष्य वासनाके अंदर स्थित मार्गका अवलम्बन करके जाता है। यों तुम्हें जिस मार्गसे जाना अभीष्ट हो, उसी मार्गसे हम दोनों जाती हैं; क्योंकि एक-दूसरेकी इच्छाका विघातन प्रेम-बन्धनका हेतु नहीं होता।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! इस प्रकार श्रेष्ठ राजाकी कन्या लीलाके विशुद्ध मनमें जब परमार्थ दृष्टि-रूप पूर्वोक्त कथाके श्रवणसे सारे संताप मिट गये तथा ज्ञानरूपी सूर्यका प्रसार हो गया, तब राजा विदूरथ चित्तके विलीन हो जानेके कारण जड अर्थात् मृत्युकालिक मूर्च्छाके वशीभूत हो गया। (सर्ग ५२–५५)
राजा विदूरथका वासनामय यमपुरीमें गमन, लीला और सरस्वतीद्वारा उसका अनुगमन और पूर्वशरीरकी प्राप्तिका वर्णन, लीलाके शरीरकी असत्यताका कथन, समाधिमें स्थित लीलाके शरीरका विनाश, लीलाके साथ वार्तालाप और राजा पद्मके पुनरुज्जीवनका कथन, राजाके जी उठनेसे नगर और अन्तःपुरमें उत्सव, लीलोपाख्यानके प्रयोजनका विस्तारसे कथन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इसी बीच राजा विदूरथकी आँखोंकी पुतलियाँ उलट गयीं। होंठ सूखकर श्वेत हो गये। उसके शरीरकी सभी इन्द्रियोंके मूर्च्छित हो जानेपर केवल सूक्ष्मप्राण ही शेष रह गया। मुखकी छवि पुराने पीले पत्तेकी कान्तिके समान क्षीण एवं पीली हो गयी। भौंरेके गुंजारके सदृश श्वासवायुकी ध्वनि होने लगी। उसका मन महाप्रयाणकालिक मूर्च्छाके अन्धकूपमें डूब गया। नेत्र आदि सारी इन्द्रियोंकी वृत्तियाँ अन्तर्लीन हो गयीं। इस प्रकार वह चेतनाशून्य हो गया। चित्रलिखित पुरुष-सरीखे उसका आकारमात्र ही दीख पड़ता था। शिलापर खुदे हुएकी भाँति उसके शरीरके सम्पूर्ण अवयव निश्चेष्ट हो गये थे। इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ ? जैसे आकाशचारी पक्षी गिरनेके संनिकट पहुँचे हुए अपने निवासभूत वृक्षको छोड़ देता है, उसी प्रकार प्राणने स्वाधिष्ठित थोड़े-से शरीरांशसे चलकर राजाके शरीरका परित्याग कर दिया।
उस समय जैसे प्राणमयी ज्ञानवृत्ति वायुमें स्थित सूक्ष्म
१६८ * अविच्छिन्नसच्चिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
गन्धका अनुभव करती है, उसी प्रकार उन दोनों देवियोंने, जिन्हें दिव्यदृष्टि प्राप्त थी, आकाशमार्गसे जाते हुए उस जीवको देखा। फिर तो वे दोनों नारियाँ उसी जीवात्माका अनुसरण करने लगीं—ठीक उसी तरह, जैसे दो भ्रमरियाँ वायुमें मिली हुई गन्धकलाका अनुगमन करती हैं। तदनन्तर दो घड़ीके पश्चात् जब मरण-मूर्च्छा शान्त हुई, तब जीवात्मा आकाशमें सुगन्धयुक्त वायुके स्पर्शसे प्रबुद्ध हो गया। उस समय उसने यमदूतोंको, उनके द्वारा ले जाये जाते हुए अपने वासनामय शरीरको तथा बन्धुओंद्वारा किये गये पिण्डदान आदिसे उत्पन्न हुए अपने स्थूलशरीरको भी देखा। फिर उसी मार्गसे बहुत दूरतक आगे जानेपर वह यमराजकी नगरीमें जा पहुँचा, जो प्राणिसमुदायसे घिरी हुई थी और जहाँ उनके कर्मफलोंपर विचार किया जा रहा था। वहाँ पहुँचनेपर यमराजने इसके कर्मोंपर विचार करके यह आदेश दिया कि 'यह सदा निर्मल पुण्यकर्मोंका ही अनुष्ठान करता रहा है। इसने कभी भी पापकर्म नहीं किया है। साथ ही सरस्वती देवीके वरदानसे इसके पुण्योंकी विशेषरूपसे वृद्धि हुई है। इस उपर्युक्त बातको समझकर तुमलोग इसे छोड़ दो और यह अपने पूर्वजन्मके शरीरमें, जो शवरूपमें पुष्पोंसे आच्छादित मण्डपाकाशमें वर्तमान है, वहाँजाकर प्रवेश करे।' यों आदेश पानेपर यमदूतोंने उसे आकाशमार्गमें लाकर छोड़ दिया। तदनन्तर वह जीवात्मा, लीला और सरस्वती—ये तीनों एक साथ आकाशमार्गसे उड़ते हुए आगे बढ़े। उस समय यद्यपि सरस्वती और लीला मूर्तिमती थीं, तथापि वह जीवात्मा उन्हें देख नहीं रहा था, जबकि वे उसे देख रही थीं। इस प्रकार वे दोनों उस जीवात्माका अनुसरण करती हुई आकाश-मण्डलको लाँघकर लोकान्तरोंको पार करती हुई दूसरे ब्रह्माण्डमें जा पहुँचीं। पुनः शीघ्र ही वहाँसे निकलकर दूसरे ब्रह्माण्डमें गयीं। फिर उस भूमण्डलसे
चलकर वे दोनों संकल्परूपिणी देवियाँ उस जीवात्माके साथ राजा पद्मके नगरमें आयीं और वहाँ तुरंत ही स्वच्छन्दतापूर्वक लीलाके अन्तःपुरके मण्डपमें प्रविष्ट हुईं।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जिसका शरीर मर चुका था, उस जीवात्माको मार्गका परिज्ञान कैसे हुआ ? और वह उस शवके निकटवर्ती मण्डपमें कैसे पहुँचा ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघव ! उस जीवकी अपनी वासनाके अन्तर्गत शवकी भावना विद्यमान थी, जिससे उसके हृदयमें वह मार्ग आदि सब कुछ स्फुरित हो गया; फिर उसे उस गृहकी प्राप्ति कैसे न हो। क्योंकि जैसे किसी अन्य स्थानमें स्थित पुरुष दूर देशान्तरमें रखे हुए अपने खजानेको अनवरत उसकी मानसिक भावनाके कारण सदा सम्यक् रूपसे देखता रहता है, उसी प्रकार सैकड़ों जन्मोंके चक्करमें पड़ा हुआ भी जीव अपनी वासनाके अंदर स्थित अपने अभीष्टको देखता है।
श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! जिसके लिये पिण्डदान
उत्पत्ति-प्रकरण ] * राजा विदूरथका यमपुरीमें गमन तथा लीला एवं सरस्वतीद्वारा उसका अनुगमन * १६९
दिया ही नहीं जाता, उसमें पिण्डदानादि वासनाका कारण तो है नहीं; फिर उस वासनासे रहित स्वरूपवाला जीव किस प्रकार शरीरको प्राप्त होता है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! बन्धुओं द्वारा पिण्ड दिया गया हो अथवा न दिया गया हो; परंतु यदि 'मैंने पिण्डदान किया है' ऐसी वासना हृदयमें भलीभाँति उत्पन्न हो जाय तो वह पुरुष पिण्डफलका भागी हो जाता है; क्योंकि अनुभूतियाँ बतलाती हैं कि जैसा चित्त होता है, वैसा ही वह प्राणी होता है। यह नियम जीवित अथवा मृत—किसी भी प्राणीमें कहीं भी अन्यथा नहीं होता। पदार्थोंकी सत्यता उनकी भावना—वासनाके अनुसार ही होती है और वह भावना कारणभूत पदार्थोंसे उत्पन्न होती है; क्योंकि जो स्वयं नित्य प्रकाशस्वरूप है, एकमात्र उस ब्रह्मके अतिरिक्त दूसरे किसी कार्यकी उत्पत्ति कारणके बिना हुई हो, ऐसा तो महाप्रलयपर्यन्त न तो कहीं देखा गया और न इस विषयमें कुछ सुना ही गया। जैसे स्वप्नमें जीव विविध पदार्थोंके रूपमें कल्पित हुआ दीख पड़ता है, उसी तरह चेतन जीवात्मा ही उस वासनाका रूप धारण करता है। वही कार्य-कारणभावको प्राप्त होता है और वही निश्चल-सा होकर स्थित होता है। देश, काल, क्रिया और द्रव्यके संयोगसे भावना अर्थात् वासनाका उदय होता है। वह वासना जिस ( सत्य एवं असत्य ) फलरूप विषयमें उत्पन्न होती है, वही विषय दोनोंमें अधिक जयशील होता है। यदि धर्मदानाकी वासना प्रवृत्त हुई हो तो उससे क्रमशः प्रेतकी बुद्धि पूर्ण हो जाती है अर्थात् दाताकी वासनाके अनुसार प्रेतको अवश्य फल मिलता है। यों परस्परकी विजयके कारण इस विषयमें जो अत्यन्त वीर्यशाली होता है, वही विजयी होता है; इसलिये उत्तम यत्नद्वारा शुभ कर्मोंका अभ्यास करना चाहिये।
पूर्ववर्णनके अनुसार लीला और सरस्वती देवी राजा पद्मके उस राजमहलमें जा पहुँचीं, जिसका भीतरी
सं० यो० व० अं० ७—
भाग अत्यन्त मनोरम था। चारों ओर पुष्पोपहारसे व्याप्त होनेके कारण वह वसन्त-सा शीतल लगता था। वह उन नगर-निवासियोंसे युक्त था, जिनकी राजकार्य करनेकी तत्परता पूर्णरूपसे शान्त हो गयी थी। वहाँ उन दोनोंने एक कमरेमें रखे हुए शवको देखा, जो मन्दार और कुन्दपुष्पकी मालाओंसे आच्छादित था। उस शवके सिरहाने जलसे पूर्ण उत्तम कलश आदि माङ्गलिक पदार्थ रखे थे। उस कमरेके दरवाजे और खिड़कियोंकी साँकलें बंद थीं और उसकी निर्मल दीवारें दीपकके प्रकाशके प्रशान्त हो जानेके कारण मलिन दीख पड़ती थीं। वह एक ओर सोये हुए लोगोंके मुखसे निकली हुई श्वासवायुसे व्याप्त था।
तदनन्तर उन दोनोंने उस शवमण्डपमें विदूरथकी शवशय्याके पार्श्वभागमें स्थित लीलाको देखा, जो पहले मृत्युको प्राप्त हो चुकी थी और पहले ही वहाँ आ गयी थी। उसके वेष, आचरण, शरीर और वासनाएँ—सभी पहलेके ही सदृश थे। उसकी आकृति पूर्वजन्मकी-
१७० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
सी थी । नखसे शिखातक उसके सारे अङ्ग सुन्दर थे। उसका रूप और अङ्गोंकी चेष्टाएँ पूर्ववत् थीं। जैसे वस्त्र वह पूर्वजन्ममें पहनती थी, वैसे ही वस्त्रोंसे उसका शरीर आच्छादित था और पहलेके-से आभूषणोंसे भी वह विभूषित थी। केवल इतना ही अन्तर था कि वह राजा पद्मके महलमें स्थित थी। उस समय उसके हाथमें चँवर सुशोभित था, जिसे वह सुन्दर ढंगसे राजाके ऊपर डुला रही थी। इस प्रकार उन दोनों (सरस्वती और प्रबुद्ध लीला) ने तो उस लीलाको देखा, परंतु वह उन दोनोंको न देख सकी। इसका कारण यह था कि वे दोनों सत्यसंकल्पस्वरूपा थीं और वह उनकी भाँति सत्यसंकल्पसे आविर्भूत नहीं हुई थी।
वत्स राम ! यह सारा जगत् आत्मा ही है। ऐसी दशामें देहादिकी कल्पना कहाँसे हो सकती है। तुम जो कुछ देख रहे हो, वह आनन्दरूप सद्ब्रह्म ही है और वही चेतन है। जिस पुरुषको स्वप्नकालमें 'मैं हरिन हूँ' ऐसी बुद्धि उत्पन्न हुई हो, वह क्या जागनेपर अपने मृगस्वरूपका अभाव हो जानेपर स्वप्नकालिक मृगको खोजता है ! नहीं । जो अज्ञानी होता है, उसकी दृष्टिमें सत्यका तिरोधान और असत्यका आविर्भाव शीघ्र होता है, परंतु रस्सीमें उत्पन्न हुई सर्पभ्रान्तिके मिट जानेपर क्या पुनः उसमें सर्पभ्रम हो सकता है ! कदापि नहीं। इस प्रकार जो जन्म-मरणशील शरीरको ही आत्मा माननेवाले हैं, वे सभी अज्ञानी स्वप्न-तुल्य इस मिथ्या सृष्टिका चिरकालतक सत्यकी तरह अनुभव करते रहते हैं। किंतु आत्मतत्त्वका यथार्थ ज्ञान होनेसे 'देहमें आत्मबुद्धि करना भ्रममात्र ही है' यों उनकी उस भ्रान्तिका उपशम हो जाता है—ठीक उसी तरह, जैसे रस्सीका ज्ञान होनेसे उसमें उत्पन्न हुई सर्पबुद्धि नष्ट हो जाती है। वस्तुतः तो शरीर क्या था ? किसकी सत्ता थी ? कहाँ और किस तरह किसका विनाश हुआ ? परमार्थतः जो वस्तु थी, वही रह गयी, केवल अज्ञान मिट गया। जब रस्सीमें उत्पन्न हुई सर्पबुद्धिकी भाँति यह सारी प्रतीति भ्रान्तिमात्र ही है, तब उसके उत्पन्न होनेपर क्या बढ़ गया और नष्ट होनेपर क्या नष्ट हुआ ? अर्थात् उसके आने-जानेमें कोई हर्ष-विषाद नहीं है।
श्रीरामजीने पूछा—प्रभावशाली गुरुदेव ! पद्मके राज-महलमें पूर्वलीला और नूतन लीलाका समागम होनेके पश्चात् जो उस भवनके निवासी थे, वे लीलाकी सत्यसंकल्पताके कारण यदि उसे देखते हैं तो उसके बाद उसे क्या समझते हैं ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघव ! उस समय वे लोग ऐसा जानते हैं कि यहाँ ये दुखिया महारानी खड़ी हैं और उनकी यह कोई दूसरी सखी भी कहींसे आ गयी है। जैसे जाग जानेपर ज्ञान हो जानेसे स्वप्नदृष्ट शरीर न जाने कहाँ विलीन-सा हो जाता है, इसलिये वह असत्य ही है, वही दशा यहाँ इस पाञ्चभौतिक स्थूल-शरीरकी भी है। (अर्थात् ज्ञान होनेपर इसका भी विनाश होता है, अतः यह भी असत्य ही है।) स्वप्नभ्रान्ति अथवा मनकी कल्पनामें जो पर्वत आदि पदार्थ उत्पन्न होते हैं, वे सभी बुद्धिवृत्तिके अंदर उसी प्रकार विलीन हो जाते हैं, जैसे सारी चेष्टाएँ वायुमें अन्तर्भूत हो जाती हैं। बुद्धिवृत्ति ही स्वप्न आदि पदार्थोंकी प्रतीतिद्वारा पर्याप्तरूपसे स्फुरित होती है, परंतु वही स्फुरित न होनेपर उस स्वप्नके साथ एकताको प्राप्त होकर तद्रूप हो जाती है। जैसे जल और उसका द्रवत्व अथवा वायु और उसकी गति दो नहीं हैं, उसी प्रकार बुद्धिवृत्ति और स्वाप्निक पदार्थोंमें कभी भेद नहीं पाया जाता। उनमें जो भेद-सा प्रतीत होता है, वही सबसे बढ़कर अज्ञान है। वही 'संसार' कहा गया है और वह संसार मिथ्याज्ञानरूप ही है। सहकारी कारणों-का अभाव होनेपर भी स्वप्नकालमें बुद्धिवृत्ति और स्वप्न-दृष्ट पदार्थोंका भेद निरर्थक ही है। स्वप्नमें जैसे असत् नगरकी प्रतीति होती है, उसी तरह सृष्टिके आदिमें
उत्पत्ति-प्रकरण ] * राजा विदूरथका यमपुरीमें गमन तथा लीला एवं सरस्वतीद्वारा उसका अनुगमन * १७१
असत् जगत्का भान होता है; अतः जैसे स्वप्न असत् हैं, वैसे ही जाग्रत् भी असत् है; इसमें संशय नहीं है। जैसे जाग जानेपर स्वप्नदृष्ट पर्वतका तत्काल ही अभाव हो जाता है, उसी प्रकार तत्त्वज्ञान होनेपर इस पाञ्चभौतिक संसारका श्रवण-मनन-निदिध्यासनादि क्रमसे अथवा ईश्वरानुकम्पासे अभाव हो जाता है। ये सृष्टियाँ मिथ्यादृष्टियाँ ही हैं; क्योंकि ये मोहदृष्टियाँ हैं अर्थात् अज्ञानसे इनका दर्शन होता है। जो मायारूपसे प्रतीत होनेवाले केवल संसारकी भ्रान्ति है और जो स्वप्नकी अनुभूतियाँ हैं, वे सभी अर्थशून्य हैं। भ्रमसे जड संसारका दर्शन करनेवाले पुरुषके मरणान्तकालमें स्वप्नानुभूति-सदृश जो ये सृष्टिकी प्रत्यक्ष प्रतीतियाँ हैं, वे सब-की-सब यद्यपि आतिवाहिक शरीरमें प्रविष्ट हो चुकी हैं, तथापि भ्रमवश मृगतृष्णाकी नदीके प्रवाहकी भाँति मिथ्या प्रकट हुई-सी प्रतीत होती हैं। वास्तवमें तो वे मनके अंदर ही हैं।
इसी बीचमें सरस्वती देवीने मनकी चेष्टाके समान विदूरथके जीवात्माको अपने सत्यसंकल्पसे पुनः शीघ्र ही अवरुद्ध कर दिया।
तब श्रीसरस्वती देवी लीलासे बोलीं—वत्से ! तुम अपने सत्यसंकल्पवश अत्यन्त निर्मल सूक्ष्मशरीरसे युक्त दिखायी देती हो, इसलिये तुम्हारे ऊपर लोगोंको आश्चर्य हो रहा है। बाले ! अपने शरीरके प्रति तुम्हारी जैसी वासना थी, तदनुरूप ही तुम्हें शरीर मिला है। इसी कारण पूर्वजन्मके रूपके समान ही तुम्हारा रूप प्रकट हुआ है; क्योंकि सब लोग अपनी वासनाके अनुसार ही सब पदार्थोंको देखते हैं। सिद्धसुन्दरि ! तुम सूक्ष्म-शरीरसे सम्पन्न हो, अतः तुम्हारा वह पूर्वजन्मका शरीर तुम्हें भूल गया है, इसी कारण उसपर तुम्हारी वासना नहीं रह गयी है। जिस ज्ञानी पुरुषकी सूक्ष्मदृष्टि दृढ़मूल हो जाती है, उसका पाञ्चभौतिक शरीर दूसरों-द्वारा देखा जाता हुआ भी सूक्ष्म ही है। आज हमलोग इस मण्डपाकाशमें प्राप्त हुई हैं। इस समय प्रभातकाल होनेपर मैंने इन दोनों दासियोंको निद्रासे मोहित कर दिया है; अतः लीले ! आओ, तबतक हम दोनों अपने सत्यसंकल्पके विलासद्वारा इस लीलाको अपना स्वरूप दिखलायें। अब हमलोगोंका कार्य आरम्भ होना चाहिये।
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! देवी सरस्वतीके ज्यों ही ऐसा विचार किया कि 'यह लीला तबतक हम दोनोंको देखे', त्यों ही वे दोनों दीप्तिमती देवियाँ ( सरस्वती और प्रबुद्ध लीला ) वहाँ प्रकट हो गयीं। उनके प्रत्यक्ष होते ही विदूरथपत्नी लीलाकी आँखें चौंधिया गयीं। उसने देखा कि वह घर उन देवियोंके तेजःपुञ्जसे देदीप्यमान हो गया है। इस प्रकार उस प्रदीप्त गृह और अपने समक्ष लीला और सरस्वती—उन दोनों देवियोंको उपस्थित देखकर वह बड़ी उतावलीके साथ उठ खड़ी हुई और फिर उनके चरणोंमें पड़कर यों कहने लगी—'देवियो ! आप जीवन प्रदान करनेवाली हैं, आपकी जय हो। आपलोगोंकी सेविका मैं यहाँ पहले ही आ पहुँची हूँ। अब मेरे कल्याणोत्कर्षके लिये आप दोनोंका शुभागमन हुआ है।' उसके यों कहनेपर यौवनके मदसे मतवाली वे तीनों मानिनियाँ वहाँ आसनोंपर विराजमान हुईं।
तब श्रीसरस्वती देवी बोलीं—वत्से ! तुम इस देशमें कैसे आयीं ? तथा मार्गमें अथवा कहाँपर तुमने कौन-सी आश्चर्यजनक घटना देखी ? तुम आदिसे लेकर यह सारा वृत्तान्त वर्णन करो।
विदूरथ-पत्नी लीलाने कहा—देवि ! उस समय विदूरथके गृहप्रदेशमें जब मैं मूर्च्छित हो गयी, तब परमेश्वरि ! उस मरण-मूर्च्छाके पश्चात् मैं क्या देखती हूँ कि मैं
१७२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
होशमें आकर उठ बैठी हूँ और फिर शीघ्र ही आकाश-मण्डलमें उड़ चली हूँ। तत्पश्चात् उस भूताकाशमें मैं वायुरूपी रथपर सवार हो गयी हूँ। वही रथ मुझे इस घरतक ले आया है। देवि! तब मैंने इस भवनको देखा, जो शवरूप राजा पद्मसे सुशोभित था। उसके भीतर दीपकका प्रकाश फैल रहा था। यह अत्यन्त स्वच्छ और बहुमूल्य शय्यासे युक्त था। तदनन्तर जब मैं अपने इन पतिदेवका अवलोकन करने चली, तब क्या देखती हूँ कि जिनका सारा अङ्ग पुष्पोंसे आच्छादित है, वे राजा विदूरथ यहाँ उसी प्रकार सो रहे हैं। मानो पुष्पवनमें वसन्त शयन कर रहा हो। देवेश्वरि! तब मैंने यह सोचा कि 'ये संग्रामरूपी कार्यके अधिक परिश्रमसे थक गये हैं, इसीलिये गाढ़ निद्रामें सो रहे हैं।' अतः मैंने इनकी यह निद्राभङ्ग नहीं की। इसके बाद ही आप दोनों देवियों इस स्थानपर पधारी हैं। मुझपर अनुग्रह करनेवाली देवि! इस प्रकार मुझे जैसा अनुभव हुआ था, वह सब आपसे कह सुनाया।
तब श्रीसरस्वती देवी बोलीं—लीले! तुम दोनोंके नेत्र बड़े सुन्दर हैं और चलनेका ढंग हंसकी चालके समान मनोहर है। अच्छा, अब हम इस राजाको शवशय्यासे उठाती हैं। यों कहकर सरस्वती देवीने कमलिनीद्वारा बिखेरी गयी सुगन्धकी भाँति राजाके जीवात्माको छोड़ दिया। तब वायुरूपधारी वह जीव राजाकी नासिकाके निकट गया और उसके नासारन्ध्रमें प्रविष्ट हो गया—ठीक उसी तरह, जैसे वायु बाँसके छिद्रमें प्रवेश करती है। उस समय वह अनन्त वासनाओंसे युक्त था। फिर तो जैसे अनावृष्टिके कारण मुरझाया हुआ कमल अच्छी जलवृष्टि होनेसे पुनः विकसित हो जाता है, उसी तरह जीवके अंदर प्रवेश करनेपर राजा पद्मका विवर्ण हुआ मुख पुनः पूर्ववत् कान्तिमान् हो गया। तदनन्तर उसके सारे अङ्ग क्रमशः चेष्टाशील होकर सुशोभित होने लगे, जैसे पर्वतकी लताएँ वसन्तको पाकर प्रफुल्लित हो जाती हैं। तब उसने अपने उन नेत्रोंको, जिनकी पुतलियाँ निर्मल और चञ्चल थीं, खोल दिया। तत्पश्चात् वह बढ़ते हुए विन्ध्य पर्वतके समान अपने शरीरको शय्यासे ऊपर उठाते हुए उठ बैठा और मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोला—'यहाँ कौन है?' तबतक दोनों लीलाएँ उसके आगे उपस्थित होकर बोलीं—'महाराज! आज्ञा दीजिये!' जब उसने दो लीलाओंको, जिनके आचार, आकार, रूप, मर्यादा, वचन, उद्योग, आनन्द और अभ्युदय सभी एक-से थे, नम्रतापूर्वक अपने सामने खड़ी देखा, तब उनकी ओर ध्यानपूर्वक देखते हुए पूछा—'तुम कौन हो? और यह कौन है तथा यह कहाँसे आयी है?' यह सुनकर पूर्वलीलाने उससे कहा—'देव! मैं जो कुछ कहती हूँ, उसे सुनिये। मैं आपकी पूर्वजन्मकी सहधर्मिणी रानी हूँ। मेरा नाम लीला है। अर्थसंयुक्त वाणीकी तरह मैं सदा आपके सम्बन्धसे सुशोभित हूँ। यह दूसरी लीला भी आपकी रानी है। इसे मैं क्रीडावश आपके उपभोगके लिये ले आयी हूँ। आप इसकी रक्षा करें। स्वामिन्! सिरहानेकी ओर स्वर्णसिंहासनपर बैठी हुई ये कल्याणकारिणी सरस्वती देवी हैं। ये तीनों लोकोंकी जननी हैं। भूपाल! हमलोगोंके पुण्यबाहुल्यसे ये साक्षात् यहाँ पधारी हैं। ये ही हम दोनोंको परलोकसे यहाँ लायी हैं।'
लीलाकी यह बात सुनकर राजा, जिसके नेत्र कमलके समान सुन्दर थे और शरीरपर लटकती हुई माला और वस्त्र सुशोभित थे, शय्यासे उठ गया और सरस्वतीके चरणोंमें पड़कर कहने लगा—'देवी सरस्वति! आप सबको कल्याण प्रदान करनेवाली हैं, आपको नमस्कार है। वरदायिनि! मुझे मेधा, दीर्घायु और धन
उत्पत्ति-प्रकरण ] * राजा विदूरथका यमपुरीमें गमन तथा लीला एवं सरस्वतीद्वारा उसका अनुगमन * १७३
प्रदान कीजिये।' यों कहते हुए राजाके सिरपर सरस्वती देवीने हाथ फेरते हुए कहा—'पुत्र! तुम अपने अभीष्ट पदार्थों तथा राजमहलसे पूर्णतया सम्पन्न हो जाओ एवं तुम्हारी सारी आपत्तियाँ और समस्त पापबुद्धियाँ विनष्ट हो जायें और तुम्हें प्रचुरमात्रामें अनन्त सुखकी प्राप्ति हो। तुम्हारे राज्यमें प्रजा सदा आनन्दित रहे तथा सम्पत्तियाँ स्थिर होकर सदा विकसित होती' रहें।'
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलभूषण राम! सरस्वती देवी यों कहकर उस राजमहलमें ही अन्तर्धान हो गयीं। प्रातःकाल होनेपर कमलोंके विकसित होनेके साथ ही सभी लोग निद्रा त्यागकर जाग पड़े। तदनन्तर क्रमशः राजाने लीलाका और लीलाने मृत्युको प्राप्त होकर पुनरुज्जीवित हुए अपने प्रियतम राजाका महान् आनन्दके साथ बारंबार आलिङ्गन किया। उस समय उस राजसदनकी विचित्र ही शोभा थी। उसके सभी निवासी आनन्दमें निमग्न थे। वह जय-ध्वनि और माङ्गलिक पुण्याहवाचनके उच्च स्वरसे निनादित हो रहा था। उसका आँगन राजपुरुषोंसे ठसाठस भरा था। प्रजाजनोंद्वारा लाये जाते हुए उपहार परस्पर टकरा जानेसे गिर जाते थे, जिससे उसकी समतल भूमि ऊँची-नीची हो गयी थी। उस उत्सवके अवसरपर मस्तकपर पुष्पमाला धारण किये हुए लोगोंके आने-जानेसे उसकी विशेष शोभा हो रही थी। वह मन्त्रियों, सामन्त राजाओं और नगरवासियोंद्वारा बिखरे गये माङ्गलिक पदार्थोंसे आच्छन्न था। उस समय 'पूर्वलीला दूसरी लीला रानीको एवं अपने पति महाराज पद्मको परलोकसे ले आयी है' यों अनेकविध गाथाओंके रूपमें लोग देश-देशान्तरमें इसका गान करते थे। राजा पद्मने अपने मरण आदिके वृत्तान्तको, जो संक्षेपमें वर्णन किया गया था, सुनकर भृत्योंद्वारा लाये गये चारों सागरोंके जलसे स्नान किया। तत्पश्चात् ब्राह्मणों, मन्त्रियों और भूपालोंने उसका अभिषेक किया। उस समय पूर्वलीला, द्वितीय लीला और राजा पद्म—ये तीनों जीवन्मुक्त और महान् ज्ञानसम्पन्न हो गये थे। इस प्रकार पृथ्वीपति पद्मको अपने पुरुषार्थके बलसे तथा भगवती सरस्वतीके प्रसादसे त्रिलोकीका वह श्रेय प्राप्त हुआ। तदनन्तर सराहनीय गुणोंसे युक्त राजा पद्म, जिसे सरस्वतीद्वारा उपदिष्ट ज्ञानके प्रभावसे भलीभाँति आत्मतत्त्वका बोध हो चुका था, दोनों लीलाओंके साथ वहाँ राज्यशासन करने लगा। अपने उस उत्तम राज्यका, जो प्रजाओंके नित्य अभ्युदयसे निर्दोष, शास्त्रानुकूल होनेसे विद्वानोंको भी मुग्ध करनेवाला, समुचित, आत्महितकारी और सारी जनताके लिये संतोषप्रद था, चिरकालतक पालन करके अन्तमें वे श्रेष्ठ दम्पति (लीला और राजा पद्म) विमुक्त हो गये।
वत्स राम! मैंने इस पवित्र लीलोपाख्यानका दृश्यरूप दोषकी निवृत्तिके लिये तुमसे वर्णन किया। वस्तुतस्तु दृश्यसत्ता शान्त ही है। जब वह है ही नहीं, तब उसके लिये 'शमन' का प्रयोग करना उपयुक्त नहीं
१७४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
है; क्योंकि सत् अर्थात् विद्यमानके मार्जनके लिये ही प्रयास किया जाता है, असत्के लिये कभी नहीं। तत्त्वज्ञ पुरुष आकाश-सरीखे निर्मल ज्ञानसे ज्ञेयरूप दृश्यको ब्रह्ममें विलीन समझकर आकाशके समान निर्मल बना रहता है। यदि कहो कि पृथ्वी आदिसे रहित स्वतःसिद्ध स्वयम्भू सच्चिदानन्द ब्रह्मने ही इस दृश्यकी कल्पना की है तो उसने उसे अपनेमें ही सिद्ध किया है। चेतनाकाशरूप परमात्माका अवभास ही 'जगत्' नामसे समझा जाता है। यह उस विशुद्ध सच्चिदानन्दघन परमात्माके किसी एक अंशमें स्थित है। यह सब कुछ जिस रूपमें देखा गया था, वह ज्यों-का-त्यों अखण्ड-रूपसे स्थित है। यह अनन्त सृष्टि मायासे उत्पन्न होनेके कारण माया ही है और माया कोई सत्य वस्तु नहीं।
निष्पाप राम ! जिस-जिस पुरुषको जिस समय जिस रूपसे जिस-जिस पदार्थकी प्रतीति होती है, वह-वह पुरुष उसी समय उसी प्रकार उस-उस पदार्थका पूर्णरूप-से अनुभव करता है। जैसे विषको सदा अमृत ही समझते रहनेसे वह अमृतत्वको प्राप्त हो जाता है, उसी तरह शत्रुके प्रति सदा मित्रभाव रखनेसे वह मित्र बन जाता है। इन पदार्थोंके निजी स्वरूपकी जैसी भावना की गयी, वह भावित स्वरूप ही चिरकालके अभ्याससे स्वभाव बन गया। चेतन परमात्माका स्वभाव ही विकासशील है। वह जैसे और जिस रूपमें विकसित होता है, शीघ्र ही वैसा हो जाता है। इसमें उसका स्वभाव ही एकमात्र कारण है। इसी कारण दुखी पुरुषके लिये जो रात्रि कल्पके समान लंबी प्रतीत होती है, वही सुखीके लिये एक क्षण-सदृश लगती है—जैसे स्वप्नमें एक क्षण कल्प-सा हो जाता है। उस क्षणभरके स्वप्नमें मनुष्य यों देखता है कि अभी-अभी मेरी मृत्यु हो गयी, पुनः मैं पैदा हुआ और तरुण होकर युवावस्थामें स्थित हूँ। फिर सौ योजन दूर चला गया हूँ। परंतु ध्यानद्वारा जिसका चित्त प्रक्षीण हो गया है अर्थात् जो निर्विकल्प समाधिमें स्थित है, उसके लिये न दिन है न रात्रि। परमात्माके ध्यानमें मग्न योगीकी दृष्टिमें न जगत् सत्य है न जगत्के पदार्थ ही। महाबाहो ! यह जगत्, जैसी उसके सम्बन्धमें भावना होती है, तदनुकूल ही प्रतीत होने लगता है—जैसे मधुरमें निरन्तर कटुताकी भावना करनेसे वह कटु-सा लगने लगता है और कटुमें मधुरकी भावना करनेसे वह माधुर्यसे युक्त-सा अनुभूत होता है तथा शत्रुमें मित्रबुद्धि रखनेसे वह मित्र एवं मित्रमें शत्रुबुद्धि करनेसे वह शत्रु हो जाता है। जो शास्त्राध्ययन और जप आदि पदार्थ हैं, जिनका पहले अभ्यास नहीं किया गया है, उनकी भावनाका अभ्यास करनेसे निश्चय ही समता प्राप्त होती है। नौकारोही अतएव भ्रमपीडित लोगोंकी भावनासे पृथ्वी चलती हुई-सी प्रतीत होती है; परंतु जो उस प्रकारके भावनाभ्रमसे रहित हैं अर्थात् तटपर ही स्थित हैं, उन्हें वैसा अनुभव नहीं होता। जैसे स्वप्नद्रष्टाकी भावनासे स्वप्नमें शून्य स्थान भी जनाकीर्ण प्रतीत होने लगता है, उसी तरह अज्ञानवश भावनासे ही सर्वथा नीला आकाश कभी पीत और कभी शुक्ल-सा अनुभूत होने लगता है तथा उत्सव आपत्ति-सरीखा विषादजनक हो जाता है।
जैसे सुवर्णके भीतर द्रवत्व वर्तमान है, परंतु वह दृष्टिगोचर नहीं होता, उसी तरह परब्रह्मके अंदर यह सृष्टि स्थित है। जैसे स्वप्नमें एक मनुष्यका दूसरेके साथ युद्ध हुआ, वह स्वप्नकालमें सत्य होते हुए भी जागनेपर असत्य ही है, उसी तरह मायाकाशमें स्थित यह स्वात्मारूप जगत् भी मायिक दृष्टिसे सत् होते हुए भी तात्त्विक दृष्टिसे असत् ही है; महाकल्पके अन्त और सृष्टिके आदिमें यह जगत् सच्चिदानन्दस्वरूप ही है। पीछे यह असत् जगत् कारणत्व अर्थात् परमात्माको प्राप्त हो जाता है, परंतु वास्तविक परमात्मा किसीमें लीन नहीं होता। इस ब्रह्माके मुक्त हो जानेपर यदि उस परमात्माकी स्मृतिसे उत्पन्न
उत्पत्ति-प्रकरण ] * सृष्टिकी असत्यता तथा सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन * १७५
दूसरे ब्रह्मा हों तो उनकी स्मृतिरूप ज्ञानसे प्रकट हुई सृष्टिमें ज्ञानमात्र ही स्थित है। जो जीवात्मा अभ्यास-वैराग्य आदि तीव्र साधनोंसे युक्त है, अतएव विषयभोगोंसे विचलित न होता हुआ मोक्षपर्यन्त एकाकारवृत्तिसे रहता है, वही परम स्थिरता—मोक्षको प्राप्त होता है। इस प्रकार सहस्रों सृष्टियोंके बारंबार उत्पन्न होने, स्थित होने और नष्ट होनेपर जीवसमूहोंमेंसे किसीको न तो कोई वस्तु प्राप्त है और न अप्राप्त ही; क्योंकि जब पदार्थोंकी सत्ता है ही नहीं, तब फिर उन्हें प्राप्त-अप्राप्त कैसे कहा जा सकता है। अतः यह सब कुछ आवरण-रहित शान्तस्वरूप सच्चिदानन्द परमात्मा ही है।
जैसे पत्र, पुष्प, फल और शाखा आदि अंशोंसे युक्त वृक्ष एकरूपसे भलीभाँति स्थित है, उसी तरह अनन्त एवं सर्वशक्तिमान् परमात्मा एकरूपसे ही लोकोंमें व्याप्त है। जब अनादि परमपद-स्वरूप परमात्माका ज्ञान हो जाता है, तब प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण आदि मायिक रूपवाले जगत्का विस्मरण हो जाता है। फिर किसीको कभी उसकी स्मृति नहीं होती। जैसे स्वच्छ जल चाहे निश्चल हो अथवा लहरियोंके थपेड़े खा रहा हो—दोनों अवस्थाओंमें जलके स्वरूपमें भेद न होनेसे वह एकरूप ही है, उसी प्रकार दिशा और कालरूपमें व्यक्त होनेपर भी परमात्मा सदा एकरस, अनादि और विशुद्ध है। वह सम्पूर्ण विकारोंके उदय और नाशसे रहित होनेके कारण अज्ञानका प्रकाशक, आदि, मध्य और अन्तसे परे तथा एकरूपसे स्थित है। केवल विशुद्धज्ञानरूप ब्रह्मकी स्वरूपभूता विभा द्वैत और ऐक्यविषमक संकल्प-विकल्प करनेके कारण 'अहम्, त्वम्' इत्यादि जगत्के रूपसे प्रतीत होती है—ठीक उसी तरह, जैसे आकाश-मण्डलमें उसकी अपनी शून्यता परिलक्षित होती है।
( सर्ग ५६–६० )
सृष्टिकी असत्यता तथा सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ज्ञानवान् पुरुष सब प्रकारकी सारी भ्रान्तियोंको सच्चिदानन्दघन परमात्माके ही अंदर सदा स्थित जानता है, इसलिये वास्तवमें सब सर्वस्वरूप अजन्मा परमात्मा ही है। इस तरह परब्रह्म परमात्माकी सर्वरूपता ही उसकी समता है। शब्दों और अर्थोंका सारा ज्ञान ब्रह्म ही है, ब्रह्मसे भिन्न नहीं। जैसे कंगनका रूप सुवर्णसे और तरङ्गकी सत्ता जलसे कभी पृथक् नहीं हो सकती, उसी प्रकार जगत् परमेश्वरसे भिन्न नहीं है। यह ईश्वर ही जगत्-रूप है। ईश्वरमें उससे पृथक् जगत्का रूप नहीं है। सोना ही कंगन आदिके रूपमें उपलब्ध होता है। सोनेमें कंगनकी पृथक् सत्ता नहीं है। जैसे स्फटिक-शिलाके भीतर भेद न होनेपर भी उसमें प्रतिबिम्बित वन-पंक्तियोंका भेदपूर्वक समावेश प्रतीत होता है (प्रति-बिम्बित वस्तुएँ अपनी आधारभूत शिलासे भिन्न न होनेपर भी जैसे भिन्न-सी प्रतीत होती हैं), उसी प्रकार सच्चिदानन्दघन परब्रह्ममें अभिन्न रूपसे स्थित जगत् और अहंकी अज्ञानके कारण भेदयुक्त प्रतीति होती है। अथवा जैसे शिल्पी शिला-को खोदकर उसमें विभिन्न मूर्तियोंका निर्माण करता है, वे मूर्तियाँ उस शिलासे भिन्न न होनेपर भी भ्रमवश भिन्न-सी जान पड़ती हैं, उसी प्रकार मनरूपी शिल्पीने चिद्घन परमात्मामें जिस जगत् और अहंकी कल्पना की है, वह उससे भिन्न नहीं है, तथापि अज्ञानवश भेदकी प्रतीति होती है। वास्तवमें वह चिद्घनरूप ही है। जैसे तरङ्गशून्य जलके भीतर तरङ्गें स्थित हैं, उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मामें सृष्टि-शब्दार्थसे शून्य सृष्टियाँ स्थित हैं। वास्तवमें न तो सृष्टिमें परब्रह्म है और न परब्रह्ममें सृष्टि ही है।
१७६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
जैसे वायु अपनेमें ही स्पन्दकी कल्पना करती है, उसी प्रकार परमार्थ-चिन्मय ब्रह्म अपनी ज्ञानवृत्तिसे अपने ही गूढ़ स्वरूपको प्रपञ्चके रूपमें अभिव्यक्त कर देता है। वास्तवमें वह उसका अपना चिन्मय स्वरूप ही होता है। शब्द-तन्मात्रा, जो पहले अपने कारणमें लीन थी, सर्वशक्तिमयी मायाके चमत्कारसे युक्त रूपको धारण-कर चित्तसे अन्तःकरणमें उठनेवाले संकल्पकी भाँति जब चिन्मय आकाशके समान स्फुरित होती है, तब उसीको आकाशका आविर्भाव कहते हैं। वही (आकाश-भावको प्राप्त हुआ ब्रह्म ही) स्वयं अपनेमें अपनी ही सत्तारूप वायुभावका अनुभव करता है, जिसके भीतर स्पर्श-तन्मात्राका संस्कार उद्बुद्ध होता है। उसकी अनुभूति वैसी ही है, जैसे पवन अपनेमें स्पन्दनका अनुभव करता है। वायुभावको प्राप्त हुआ ब्रह्म ही स्वयं अपनेमें अपनी ही सत्तारूप प्रकाशभावका अनुभव करता है, जिसके भीतर रूपतन्मात्राका संस्कार उद्बुद्ध होता है। उसकी यह अनुभूति वैसी ही है, जैसे तेज प्राकट्य-का अनुभव करता है। वह तेजोमय ब्रह्म ही स्वयं अपनेमें अपनी ही सत्तारूप-जलभावका अनुभव करता है, जिसके भीतर रसतन्मात्राका संस्कार उद्बुद्ध होता है। उसकी यह अनुभूति वैसी ही है, जैसे जल अपनी द्रवताका अनुभव करता है। वह जल-रूपताको प्राप्त हुआ ब्रह्म ही अपने चित्तसे अभिन्नरूप पृथ्वीभावका अनुभव करता है, जिसके भीतर गन्धतन्मात्रा स्थित होती है। उसकी यह अनुभूति भी वैसी ही है, जैसे पृथ्वी अपनेमें स्थैर्य-कलाका अनुभव करती है।
जो नित्य एकरस प्रकाशसे युक्त है, सृष्टि और प्रलय जिसके भीतर हैं, जो जन्म और विनाशसे रहित, रोग-शोकसे शून्य तथा शुद्ध है, वह ब्रह्म बिना किसी आधारके अपने आपमें ही स्थित है। उस परमार्थ सत्य वस्तु (परब्रह्म परमात्मा) का यथार्थ ज्ञान होनेपर परम गतिरूप मोक्ष प्राप्त हो जाता है। उक्त परमार्थ-वस्तु सृष्टियुक्त होनेपर भी सर्वथा सम (विषमतासे रहित) ही है।
जैसे अग्निमें जो प्रकाश है, वह उससे भिन्न न होनेपर भी भिन्न-सा प्रतीत होता है, उसी प्रकार सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें जो यह जगद्रूपी प्रकाश है, वह उनसे भिन्न न होकर भी भिन्न-सा जान पड़ता है। भिन्नरूपसे दिखायी देना ही उसका असत्य रूप है और अभिन्नरूपसे दीखना ही उसके सत्य रूपका दर्शन है।
जैसे गीली मिट्टीमें अव्यक्तरूपसे खिलौने मौजूद हैं, जैसे काष्ठमें खुदाई करके प्रकट न की हुई कठपुतली मौजूद है और जैसे स्याहीके चूर्णमें अक्षर स्थित हैं, उसी तरह परब्रह्म परमात्मामें नाना प्रकारकी सृष्टियाँ विद्यमान हैं। यद्यपि ब्रह्म-तत्त्वरूपी मरुभूमिमें त्रिलोक-रूपिणी मृगतृष्णा असत्य ही है, तथापि मायावश सत्य-सी प्रतीत होती है। वह ब्रह्मसे अभिन्न होती हुई भी भिन्न-सी भासित होती है। जैसे दूधका मिठास, मिर्चका तीखापन, जलकी तरलता और पवनका स्पन्दन उससे भिन्न नहीं है, उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मामें यह सर्ग अनन्यभावसे स्थित है। उससे भिन्नरूपमें उसका कोई अस्तित्व नहीं है। परमात्मामें लीन होकर वह चिन्मात्र स्वरूपसे स्थित होता है, परमात्माका अपना ही स्वरूप धारण करता है। कोई भी वस्तु कहीं और कभी भी न तो प्रकट होती है और न लयको ही प्राप्त होती है। सब कुछ सुन्दर शिलाके घनीभूत स्वरूपकी भाँति शान्त, अनादि, निराकार, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही है। जैसे जलके भीतर गुप्त और प्रकटरूपसे तरंग आदि रहते हैं, उसी तरह जीवमें जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि शक्तियाँ गुप्त और प्रकट रूपसे विद्यमान रहती हैं। 'पुरुष जिस-जिस वस्तुकी ओरसे विरक्त होता है, उस-उससे मुक्त होता जाता है। (जो सब ओरसे निवृत्त हो जाता है, उसे अणुमात्र दुःखका भी अनुभव नहीं होता है।)' इस
कल्याण
(चित्र)
राजा सिन्धुका राज्याभिषेक (उत्पत्ति-प्रकरण सर्ग ५१)
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उत्पत्ति-प्रकरण ] * जगत्की असत्ता या भ्रमरूपताका प्रतिपादन * १७७
स्मृति-वाक्यके अनुसार जो देह आदिमें अहंभावका अनुभव नहीं करता, ऐसा कौन मनुष्य जन्म-मरणरूपी भ्रमको प्राप्त होगा । परब्रह्ममें व्यष्टि जीव-रूपसे प्रकट हुई जो अद्वितीय चित्-सत्ता है, वह जलकी तरलताके भीतर व्यक्त हुई आवर्त (भँवर) की रेखाके समान है। वही अहंभावसे युक्त होकर इन तीनों लोकोंको धारण करती है। वास्तवमें तो परमात्माके भीतर न सद्रूप जगत् है और न असद्रूप । (सर्ग ६१)
जगत्की असत्ता या भ्रमरूपताका प्रतिपादन तथा नियति और पौरुषका विवेचन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ये वर्तमान, भविष्य और भूतकालकी सृष्टि-परम्पराएँ अपनी सत्ताको उसी प्रकार धारण करती हैं, जैसे जलकी तरलता अपने भीतर स्पष्ट रूपसे आवर्तोंकी परम्परा धारण करती हैं। जैसे महती मरुभूमिमें तटवर्ती वृक्षों और लताओंसे झड़ती हुई पुष्प-राशिसे परिपूर्ण लहराती नदी मिथ्या ही प्रतीत होती है,उसी प्रकार सच्चिदानन्दघन परमात्मामें यह सृष्टि-सुषमा सर्वथा मिथ्या ही है । जैसे स्वप्नका संसार-इन्द्रजालका नगर और संकल्प या मनोरथद्वारा कल्पित जगत्—ये सब सत्य न होनेपर भी प्रतीतिके विषय होते हैं, उसी प्रकार सृष्टियोंके अनुभवकी भूमि असत्य होनेपर भी प्रतीतिगोचर हो रही है ।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—ज्ञानवानोंमें श्रेष्ठ गुरुदेव ! पूर्वोक्त प्रकारसे भलीभाँति विवेक-विचार करनेपर जब एकमात्र अद्वितीय परब्रह्म परमात्माके साथ अपनी एकता-का पूर्ण निश्चय हो जानेसे उत्कृष्ट एवं संशयरहित आत्म-विज्ञान प्रकाशित हो जाता है, तब तत्त्वज्ञानियोंके भी शरीर यहाँ किसलिये टिके रहते हैं ? यदि कहें वे दैवके ही अधीन होकर रहते हैं तो ठीक नहीं जान पड़ता, क्योंकि उन तत्त्वज्ञानियोंपर दैवका प्रभाव कैसे रह सकता है ।*
* श्रुति कहती है—'तस्य ह न देवाश्च नाभूत्या ईशते । आत्मा ह्येषां स भवति' अर्थात् तत्त्वज्ञानीके पराभवमें देवता भी समर्थ नहीं; क्योंकि वह उनका आत्मा ही हो जाता है । (बृहदारण्यक० १ । ४ । १० )
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! ब्रह्मा आदि तत्त्वज्ञानियोंने अज्ञानियोंके बोधके लिये यह बताया है कि जो ब्रह्म है, वही नियति है और वही यह सर्ग है। स्फटिक-शिलाके भीतर प्रतिबिम्बित चित्रसमूहकी भाँति परमात्मामें स्थित हुए ब्रह्माने नियति (जीवोंके अदृष्ट)-रूपी भावी सृष्टिको उसी तरह देखा है, जैसे सोया हुआ पुरुष अपनेमें स्वप्न-जगत्की कल्पनाके आधारभूत आकाशको देखता है। जैसे चेतन-स्वभाव होनेके कारण अङ्गी (देहधारी पुरुष) को शरीरमें अङ्ग आदि दिखायी देते हैं, उसी तरह 'कमलोद्भव' रूपसे प्रसिद्ध चिन्मय ब्रह्माको भी नियति आदि अङ्गोंके दर्शन होते हैं। यह नियति (प्रारब्ध) ही दैव नामसे कही गयी है, जो शुद्ध चेतन परमात्माकी शक्तिरूप है। यही भूत, भविष्यत् एवं वर्तमानकालमें सम्पूर्ण पदार्थोंको अपने अधीन करके जगत्की व्यवस्थारूपसे स्थित है। 'भविष्यमें अमुक पदार्थमें इस प्रकारकी स्फूर्ति होनी चाहिये, अमुकको मोक्षका पद प्राप्त होना चाहिये, इसके द्वारा इस प्रकार और उसके द्वारा इस प्रकार अवश्य होना चाहिये' ऐसा विचार दैव ही करता है। यह दैव या नियति ही सम्पूर्ण भूत आदि अथवा काल-क्रिया आदि जगत् है। इस नियति या प्रारब्धसे ही पुरुषार्थकी सत्ता लक्षित होती है और पुरुषार्थसे ही इस प्रारब्धकी सत्ता सूचित होती है। जबतक तीनों भुवन हैं, तबतक प्रारब्ध और पुरुषार्थ—ये दोनों सत्ताएँ परस्पर अभिन्न-रूपसे स्थित हैं। मनुष्यको अपने पौरुषसे ही दैव और
१७८ -* अविच्छिन्नान्मचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
पुरुषार्थ दोनोंको बनाना चाहिये। प्रारब्धके अनुसार अवश्य होनेवाला भोग होकर ही रहेगा—ऐसा निश्चय करके बुद्धिमान् पुरुष कभी पौरुषका त्याग न करे; क्योंकि प्रारब्ध पौरुषरूपसे ही नियामक होता है अर्थात् पूर्वजन्मोंमें किया गया पुरुषार्थ ही वर्तमान जन्ममें प्रारब्ध होकर यह नियम करता है कि अमुकको ऐसा ही होना चाहिये।
जो प्रारब्धके भरोसे मूक बनकर पौरुषशून्य एवं अकर्मण्य हो जाता है, वह कभी सुखी नहीं हो सकता। जो अकर्मण्य होकर बैठेगा, उसकी प्राण-वायुकी चेष्टा कहाँ चली जायगी। यदि निर्विकल्प समाधिमें चित्तको शान्ति प्रदान करनेवाला प्राणनिरोध करके पुरुष साधु होकर मुक्ति पा ही गया तो वह भी उसके पुरुषार्थका ही फल है। बिना पुरुषार्थके किस फलकी प्राप्ति बतायी जा सकती है ? एकमात्र शास्त्रीय पुरुषार्थमें तत्पर होना कल्याणकारी श्रेष्ठ साधन है और कर्तृत्वका अत्यन्त अभावरूप मोक्ष सर्वश्रेष्ठ कल्याणमय फल है।
इन साधन और फलोंकी अपेक्षा ज्ञानियोंका पक्ष सबल है; क्योंकि उन ज्ञानी महात्माओंका प्रारब्ध-भोग दुःखरहित है। जो दुःखरहित प्रारब्ध-भोग है, वह यदि ब्रह्मसत्ताके प्रकाशमें स्थिर हो जाय तो निश्चय समझना चाहिये कि वह परम शुद्ध ब्रह्म, जिसे परम गति कहते हैं, प्राप्त हो ही गया। (सर्ग ६२)
ब्रह्मकी सर्वरूपता तथा उसमें भेदका अभाव, परमात्मासे जीवकी उत्पत्ति और उसके स्वरूपका विवेचन, परमात्मासे ही मनकी उत्पत्ति, मनका भ्रम ही जगत् है—इसका प्रतिपादन तथा जीव-चित्त आदिकी एकता
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! यह जो ब्रह्म-तत्त्व है, वह सर्वथा, सर्वदा, सब ओरसे सर्वशक्तिमान्, सर्वरूप, सर्वेश्वर, सर्वव्यापी और सर्वमय ही है। वह जब, जहाँ, जिसकी, जिस प्रकारसे भावना करता है, तब वहाँ उसीको प्रत्यक्ष देखता है। सर्वशक्तिमान् परमात्मासे जो-जो शक्ति जैसे उदित होती है, वह उसी प्रकार रहती है। ऐसी स्थितिमें वह शक्ति स्वभावसे ही नाना प्रकारके रूपवाली है। परमार्थ-दृष्टिसे ये सारी शक्तियाँ यह आत्मा ही है अर्थात् शक्ति और शक्तिमान् परमात्मामें कोई भेद नहीं है। बुद्धिमानोंने लौकिक व्यवहारकी सिद्धिके लिये इस प्रकार भेदरूप संसार-जालकी कल्पना की है। वस्तुतः परमात्मामें भेद नहीं है। जैसे समुद्रमें छोटी-बड़ी लहरोंका और समुद्रका; कंगन, बाजूबंद और केयूरके साथ सोनेका तथा अवयव और अवयवीका भेद वास्तविक नहीं है, उसी प्रकार आत्मामें द्वैत अथवा भेद वास्तविक नहीं है, कल्पना करनेवाले पुरुषकी बुद्धिसे कल्पित है। परमार्थ-दृष्टिसे देखा जाय तो यह सम्पूर्ण आकारोंसे युक्त विस्तृत प्रपञ्च सर्वव्यापी ब्रह्म ही है। मिथ्या ज्ञानवाले लोगोंने ही शक्ति और शक्तिमान्के तथा अवयव और अवयवीके भेदकी कल्पना कर रक्खी है। यह भेद यथार्थ नहीं है। सत् हो या असत्, सच्चिदानन्दघन परमात्मा जिस सदसद्-वस्तुका संकल्प अथवा अभिनिवेश करता है, उसी-उसीको देखता है। वास्तवमें सब वस्तुओंके रूपमें वह सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही भासित हो रहा है।
श्रीराम ! यह जो सर्वव्यापी, स्वयम्प्रकाश, आदि-अन्तसे रहित, सबका महान् ईश्वर, स्वानुभावानन्दस्वरूप, शुद्ध, सच्चिदानन्दघन परमात्मा है, इसीसे पहले जीव उत्पन्न हुआ है। वही उपाधिकी प्रधानतासे चित्त कहलाता है और चित्तसे यह जगत् उत्पन्न हुआ है।
रघुनन्दन ! जिसमें प्रतीत होनेवाला दृश्य-प्रपञ्च असत्
उत्पत्ति-प्रकरण ] * चित्तका विलास ही द्वैत है, त्याग और ज्ञानसे ही मनका क्षय होता है * १७९
है, वह शुद्धस्वरूप ब्रह्म यहाँ सर्वत्र व्यापक है। वह बृहद् ब्रह्म अनात्मयोगी पुरुषोंके लिये भीषण है और आत्मवेत्ताओंके लिये अविनाशी सच्चिदानन्दघन है। उसका जो सर्वत्र सम, परिपूर्ण, शुद्ध, चिह्नहित सत्-स्वरूप है, वही शान्त परमपद है। ज्ञानी भी उसके स्वरूपका इदमित्थंरूपसे निर्देश नहीं कर सकते। उसीका चेतन अंश, जो स्वभावतः स्पन्दनशील (प्राण धारण करनेवाला) है, जीव कहलाता है। उत्तम दर्पणरूपी उस चेतन आकाशमें ये असंख्य जगत्-जालकी परम्पराएँ प्रतिबिम्बित होती रहती हैं। जैसे चलना या गतिशील होना वायुका स्वभाव है, उष्णता अग्निका स्वभाव है अथवा शीतलता हिमका स्वभाव है, उसी प्रकार जीवत्व आत्मा (व्यष्टि-चेतन) का स्वभाव है। व्यष्टिचेतनघन जो आत्मतत्त्व है, उसकी स्वयं अपने स्वरूपके अज्ञानके कारण जो अल्पज्ञता है, उसीको जीव कहा गया है। कोई पुण्यात्मा पुरुष दिव्य देह आदिकी भावना करनेसे शीघ्र ही देवता आदिके शरीरको प्राप्त होता है। उस देहमें रहकर वह गन्धर्वों या अन्य देवताओंसे सुरक्षित नगर (अमरावती आदि) में निवास करता है। अपने संकल्पके अनुसार कोई पुरुष वृक्ष आदि स्थावर योनिको प्राप्त होता है, कोई जङ्गम योनिमें जन्म ग्रहण करता है तथा कोई पक्षी आदि खेचर प्राणियोंका रूप धारण करता है। इस प्रकार जन्म और मृत्युके कारण बने हुए अपने कर्मोंसे जीव ऊपर या नीचे जाते हैं (ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म ग्रहण करते हैं)।
श्रीराम ! परम कारणरूप परमात्मासे ही पहले मन उत्पन्न हुआ है। मनन ही उसका स्वरूप है। भोगोंसे भरा हुआ जो यह विस्तृत जगत् है, वह मनमें ही है। वह मन भी उस परम कारणरूप परमात्मामें ही स्थित है। वह भाव और अभावके झूलेमें झूलता रहता है। जैसे पहले अनुभवमें आयी हुई सुगन्ध याद करनेपर मनोरथके द्वारा देखी जाती है, उसी प्रकार उस मनके द्वारा सत् और असत्रूपसे प्रतीत होनेवाली यह सृष्टि देखी जाती है। परमात्माका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर ब्रह्म, जीव, मन, माया, कर्त्ता, कर्म और जगत्की प्रतीतियोंका कोई भेद नहीं रह जाता। सब द्वैतोंके एकमात्र आश्रय परमात्मा ही स्थित रहते हैं। जिसके विस्तारका कहीं आर-पार नहीं है, उस संविद्रूपी जलके असीम प्रसारोंसे चिन्मय एकार्णवरूप यह आत्मा स्वयं विस्तारको प्राप्त होता है। क्षणिक होनेके कारण असत्य तथा प्रतीत होनेके कारण सत्य यह मनोमय जगत् स्वप्नके समान सदसद्रूप है। वास्तवमें यह जगत् न तो सत् है, न असत् है और न उत्पन्न ही हुआ है। यह तो केवल चित्तका भ्रम है। जैसे अच्छी तरह न देखनेके कारण ठूंठे काठमें झूठे ही पुरुषकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार अविद्यायुक्त मनके प्रभावसे यह संसार नामक दीर्घकालीन स्वप्न अज्ञानियोंको स्थिर-सा प्रतीत होता है। जैसे चेतन परमात्मा और जीवमें भेद नहीं है, उसी तरह जीव और चित्तमें भी भेद नहीं है और जैसे जीव तथा चित्तमें भेद नहीं है, उसी तरह देह और कर्ममें भी भेद नहीं है। वस्तुतः कर्म ही देह है; क्योंकि देहसे ही कर्म होते हैं। देह ही चित्त है, चित्त ही अहंकारविशिष्ट जीव है। वह जीव ही चेतन परमात्मा है तथा वह परमात्मा सर्वस्वरूप एवं कल्याणमय है। यह शास्त्रका सारा सिद्धान्त एक पद्यमें ही कह दिया गया है। (सर्ग ६३-६५)
चित्तका विलास ही द्वैत है, त्याग और ज्ञानसे ही अज्ञानसहित मनका क्षय होता है—इसका प्रतिपादन तथा भोक्ता जीवके स्वरूपका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जैसे एक दीपकसे सैकड़ों दीपक जल जाते हैं, उसी तरह एक ही परम वस्तु चेतन आत्मा अपने संकल्पसे मानो नानात्वको प्राप्त हुआ है। मनुष्य चित्तमात्र ही है। चित्तके हट जानेपर
१८० * अविच्छिन्नसच्चिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
यह जगत् शान्त हो जाता है। जिस पुरुषके पैर जूतेसे ढके होते हैं, उसके लिये मानो सारी पृथ्वीपर ही चमड़ा बिछा हुआ है; इसी प्रकार जिसका चित्त शान्त है, उसके लिये सारा जगत् ही शान्त हो गया। जैसे केलेके वृक्षमें पत्तोंको छोड़कर और कुछ भी सार नहीं रहता, उसी प्रकार जगत्में भ्रमके सिवा और कुछ भी सार तत्त्व नहीं है। जीव जन्म लेता है; फिर क्रमशः बाल्यावस्था, युवावस्था, वृद्धावस्था तथा मृत्युको प्राप्त होता है। तत्पश्चात् वह शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार स्वर्ग और नरकमें पहुँचता है। यह सब भ्रमवश चित्तका नृत्य अर्थात् संकल्पमात्र है। जैसे मलदोषसे मलिन नेत्र चन्द्रमा आदिमें दो-दो आकृतियाँ देखता है, वैसे ही भ्रमसे आक्रान्त हुआ जीवात्मा परमात्मामें द्वैत देखता है (जीव और ईश्वरमें भेदका दर्शन करता है)। जैसे मदिरा पीकर मतवाला हुआ मनुष्य नशेके कारण वृक्षोंको घूमते देखता है, उसी प्रकार जीवात्मा चित्तद्वारा कल्पित संसारोंका दर्शन करता है। जैसे बालक खेल-कूदमें वेगसे घूमनेके कारण सारे जगत्को कुम्हारके चाककी भाँति घूमता देखते हैं, उसी प्रकार जीव चित्तके भ्रमसे ही इस दृश्य-जगत्को देखते हैं—यों समझो। जिस पदार्थका चेतन अनुभव करता है, वह चेतनसे अतिरिक्त दूसरा कुछ नहीं है। इस प्रकार दृश्यकी शान्ति होनेपर विषय न रहनेसे ईंधनरहित अग्निके समान चित्त स्वयं शान्त हो जाता है। जब पुरुष सच्चिदानन्दघन परमात्मासे एकताको प्राप्त होकर निश्चल स्थितिमें स्थित हो जाता है, तब वह शान्त होकर बैठे या व्यवहारमें लगा रहे—दोनों ही अवस्थाओंमें भलीभाँति शान्त कहा जाता है। व्यष्टि-चेतन अज्ञानी जीव विषयका अनुभव करता है, परंतु सच्चिदानन्दघनमें एकीभावको प्राप्त ज्ञानी महात्मा विषयका आस्वादन नहीं करता।
परमपदमें आरूढ़ और सच्चिदानन्दघन परब्रह्ममे एकीभावको प्राप्त हुए पुरुषका 'देहके भानसे शून्य' और 'निर्विषय' आदि समानार्थक शब्दोंद्वारा वर्णन होता है। जीवात्मा चित्तके संकल्पद्वारा ही स्थूलताको प्राप्त होता है और 'मैं उत्पन्न हूँ, जीवित हूँ, देखता हूँ तथा (जन्म-मृत्युरूप) संसारको प्राप्त होता हूँ' इत्यादि रूपसे मिथ्या-भ्रमका दर्शन करता है। चेतनके द्वारा जिस किसीका अनुभव होता है, वही स्थूल जगत् है। रज्जुमें सर्पकी भाँति प्रतीत होनेवाले उस आभासको अविद्या—भ्रम कहते हैं। इस संसार नामक व्याधिकी चिकित्सा एवं निवारण केवल ज्ञानमात्रसे ही सम्भव है। यह संसार चित्तका एक संकल्पमात्र है। इसके बाधमें किसी प्रकारका आयास नहीं है। जैसे अच्छी तरह देखभाल करनेसे रस्सीमें साँपका भ्रम मिट जाता है, उसी प्रकार परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे यह संसार-रूपी भ्रम अवश्य नष्ट हो जाता है।
श्रीराम! जिस वस्तुकी अभिलाषा हो, उसीका निश्चित रूपसे त्याग करके यदि रहा जा सके, तब तो मोक्ष प्राप्त ही है। इतना करनेमें कौन-सी कठिनाई है। परमात्माकी प्राप्ति-रूप महान् उद्देश्यसे सम्पन्न पुरुष जब इस संसारमें अपने प्राणोंका भी मोह तिनकेके समान त्याग देते हैं, तब जिस सांसारिक वस्तुकी इच्छा की गयी है, केवल उसीका त्याग करनेमें कंजूसी कैसे की जा सकती है। जैसे हाथमें रक्खा हुआ बेलका फल अथवा सामने खड़ा हुआ पर्वत प्रत्यक्ष ही दिखायी देता है, उसी प्रकार उस तत्त्वज्ञ महात्माके लिये परमात्माका जन्म आदि विकारोंसे रहित होना प्रत्यक्ष ही है। जैसे प्रलयकालका अनन्त अपार एकार्णव अपनी असंख्य तरङ्गोंके कारण अनेक-सा प्रतीत होता है, उसी प्रकार अप्रमेय परमात्मा ही अज्ञानके कारण जगद्रूपसे प्रतीत हो रहा है। उसके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान हो जाय तो वही मोक्षरूप सिद्धि प्रदान करता है; परंतु जो उसे तत्त्वतः जान नही लेता, उसका मन सदा बन्धनमें ही पड़ा रहता है।
रघुनन्दन! ब्रह्म सदा सम्पूर्ण शक्तियोंसे सम्पन्न तथा सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। वह जहाँ जिस शक्तिसे
उत्पत्ति-प्रकरण ] * चित्तका विलास ही द्वैत है, त्याग और ज्ञानसे ही मनका क्षय होता है * १८१
स्फुरित होता है, वहाँ अपनेमें उसी शक्तिको प्राप्त हुई देखता है। सबका आत्मा ब्रह्म अनादिकालसे जिस व्यष्टि-चेतनको स्वयं जानता है, वही यहाँ जीव नामसे कहा गया है और वह जीव ही संकल्प करनेवाला है। जीव-ईश्वरका अनादिकालसे जो स्वाभाविक भेद है, वही जीवके जन्म-मरणमें कारण है। जैसे आकाशमें क्रियाशील और अक्रिय वायु ही है, उससे अतिरिक्त कुछ नहीं है, उसी तरह यहाँ सर्वत्र क्रियाशील और अक्रिय सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही है। उससे अतिरिक्त और कुछ नहीं है। उस ब्रह्मके क्रियाशील होनेपर सृष्टिका प्रादुर्भाव होता है और अक्रिय रहनेपर सबका प्रलय हो जाता है। उस अवस्थामें ब्रह्म ही शान्तभावसे स्थित रहता है। जिसने जीव-ईश्वरके भेदकी कल्पना कर रखी है, ऐसे जीवात्माको ही देहकी प्राप्ति होती है। वह जीवात्मा ही संसारमें संकल्पसे नाना प्रकारके विषयोंको प्राप्त होता है। यही नाना योनियोंको प्राप्त जीवात्मा ज्ञान होनेपर शीघ्र मुक्त हो जाता है। उनमेंसे कोई मन्द अभ्यासी तो साधन करते-करते हजारों जन्मोंमें मुक्ति प्राप्त करता है और कोई तीव्र अभ्यास करनेवाला पुरुष एक ही जन्ममें मुक्ति लाभ कर लेता है। स्वभावके कारण ही जीवात्मा ब्रह्म और जीवके भेदभावको प्राप्त हो रहा है। इसीसे वह गुणोंका सङ्ग पाकर कर्मानुसार स्वर्ग, मोक्ष, नरक और बन्धन आदिके हेतुभूत देहभावको क्रमशः प्राप्त होता है। वास्तवमें यह संसार न तो उत्पन्न हुआ है और न यह सत्तावान् होकर स्थित ही है, तथापि मनका भ्रम इसे देखता है। जैसे गोलाकार घूमने या नृत्य करनेसे भ्रमपीड़ित पुरुष नगरको भी घूमता हुआ-सा देखता है, उसी तरह मनके भ्रमसे युक्त जीवात्मा 'मैं उत्पन्न हुआ, स्थित रहा और मरा' इत्यादि भावोंका अनुभव करता है। परमार्थ-वस्तुका दर्शन न होनेके कारण आशा-तृष्णाके वशीभूत हुआ चित्त 'अहं-मम' इत्यादि रूपसे अनुभवमें आनेवाले असत् संसारको ही देखता (और उसे सद् मानता) है।
श्रीराम ! जैसे जल तरङ्गरूपसे स्फुरित होता है, उसी तरह केवल मनकी भ्रान्तिके उल्लास (उत्कर्ष) से विस्तारको प्राप्त हुआ यह सभी दृश्य-प्रपञ्च जगत्रूपसे भासित होता है। व्यष्टि-चेतन ही बुद्धि-वृत्तिके संयोगसे जीव कहलाता है। वह जीव ही सङ्कल्प करनेसे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार तथा मायाके रूपमें परिणत हो जाता है। जैसे स्वप्नमें जो नगर आदिका भान होता है, वह मनका भ्रम ही है, उसी तरह यह संसार भी चित्तका भ्रम ही है। व्यष्टि-चेतनको जो संसारका ज्ञान है, वही जागरण कहा गया है। सूक्ष्म शरीरमें जो उसका अहंभाव है, उसीको स्वप्न माना गया है। मनका जो प्रकृतिमें विलीन हो जाना है, वही सुषुप्ति है तथा केवल सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें जो एकीभावसे तन्मय हो जाना है, उसीको तुरीयावस्था कहते हैं। अत्यन्त शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमात्मामें जो अविचल स्थिति है, वही परिणाममें विकार-रहित तुरीयातीत पद है। उस पदमें स्थित पुरुष कभी शोक नहीं करता (वहाँ शोकका सर्वथा अभाव है)। उस परमात्मामें ही यह सब जगत् सम्पन्न होता है (उसीमें स्थित रहता है) और उसीमें लीन हो जाता है। वास्तवमें न तो यह ब्रह्म जगत्रूप है और न उस ब्रह्ममें जगत् ही है। जैसे नेत्रदोषके कारण आकाशमें भ्रमसे मोतीके दाने-से दीखते हैं, वैसे ही ब्रह्ममें भ्रमसे इस जगत्का दर्शन होता है। जैसे स्फटिकके भीतर प्रतिबिम्बित वन आदि उसके यथार्थ ज्ञानके बिना सत्य-से दीखते हैं, उसी तरह यथार्थ ज्ञान न होनेके कारण अद्वितीय ब्रह्मरूप होता हुआ भी यह जगत् शुद्ध ब्रह्मके भीतर नाना-सा प्रतीत होता है। ब्रह्मासे लेकर कीट-पतंग-पर्यन्त बुद्धिवृत्तिका भ्रमरूप जगत् असत् ही है; क्योंकि परमात्माका यथार्थ ज्ञान होनेपर इसका बाध हो जाता है। यह जगत् मिथ्या ही उत्पन्न हुआ है, मिथ्या ही बढ़ता है, मिथ्या ही रुचिकर प्रतीत होता है और मिथ्या ही लयको प्राप्त होता है; शुद्ध सर्वव्यापी ब्रह्म अनन्त और
१८२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अद्वितीय है। अज्ञानसे ही वह अशुद्ध-सा, असत्-सा, नाना-सा और असर्वव्यापी-सा (सीमित-सा) ज्ञात होता है। जैसे जल भिन्न है और तरङ्ग उससे भिन्न है—ऐसी जो बालकों अथवा मूर्खोंकी कल्पना है, उसीसे जल और तरङ्गमें मिथ्या भेदकी प्रतीति होती है, उसी तरह जो यह जगत्का भेद प्रतीत होता है, वह भी वास्तविक नहीं है। केवल अज्ञानियोंने उसकी कल्पना कर रखी है। जैसे रस्सीमें सर्पकी स्थिति है, वैसे ही ब्रह्ममें शत्रु और मित्रके समान विरुद्ध और अविरुद्ध भेदाभेद शक्तियों-की स्थिति सम्भव है। (सर्ग ६६–७९)
परमात्मसत्ताका विवेचन, बीजमें वृक्षकी भाँति परमात्मामें जगत्की त्रैकालिक स्थितिका निरूपण तथा ब्रह्मसे पृथक् उसकी सत्ता नहीं है—इसका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! नामरहित तथा मन और नेत्र आदि छः ज्ञानेन्द्रियोंसे अगम्य होनेके कारण आकाशसे भी सूक्ष्म चिन्मात्र परमात्मा ही 'अणु' शब्दसे कहा गया है। अणुके भी अणु सच्चिदानन्दघन परमात्माके अंदर अज्ञानियोंकी दृष्टिसे सत्-सा और ज्ञानियोंकी दृष्टिसे असत्-सा स्थित हुआ यह जगत् बीजके भीतर वृक्षकी सत्ताके समान स्फुरित होता है। सम्पूर्ण वस्तुओंकी सत्ता वास्तविक सत्ताके अधीन है; उसको यदि और किसीके अधीन मानें तो भूल होगी। अतः स्वतःसिद्ध वास्तविक सत्तासे ही सबकी सत्ता है। यह परम आकाशरूपी परमात्मा सूक्ष्म होनेके कारण नेत्रेन्द्रियका विषय नहीं है। सर्वात्मक होता हुआ भी वह मनसहित पाँचों इन्द्रियोंसे अतीत होकर स्थित है, अतः अणुका भी अणु है। सर्वात्मक होनेके कारण ही वह कभी शून्य नहीं हो सकता। क्योंकि 'वह है, नहीं है'—ऐसा कहने और मनन करनेवाला पुरुष आत्मा ही तो है; फिर उसकी असत्ता कैसे कही जा सकती है। किसी भी युक्तिसे यहाँ सत् वस्तुकी असत्ता नहीं सिद्ध की जा सकती। जैसे कपूर अपनी सुगन्धसे प्रतीत होता है, वैसे ही सर्वात्मा सर्वव्यापीरूपसे अनुभवमें आता है। अणुका-भी-अणु चेतन परमात्मा ही सब कुछ है। मन और इन्द्रियों-की वृत्तिसे नानात्वकी प्रतीति होनेके कारण मनः-परिच्छिन्नरूपसे ही वह सर्वात्मक है और इन्द्रियातीत होनेके कारण वह निर्मल परमात्मा नित्य सत्तावान् होकर भी कुछ प्रतीत नहीं होता—इन्द्रियों-का विषय नहीं होता। वही एक है और सम्पूर्ण जीवोंके अन्तःकरणमें आत्मारूपसे अनुभूत होनेके कारण अनेक भी है। वही अपने संकल्पसे इस सम्पूर्ण जगत्को धारण करता है। अतः जगतरूपी रत्नोंका कोष भी वही है।
जैसे जिसका मुँह बंद है, ऐसे घड़ेको अन्य देशमें ले जानेपर उसमें स्थित आकाशका गमन और आगमन नहीं होता, उसी प्रकार देहरूपी उपाधिके गमनागमनसे आत्माका गमनागमन नहीं हो सकता। चिन्मय परमात्मा अपनी चेतनसे सूर्य आदिके प्रकाशका भी प्रकाशक है और महाकल्पके प्रलयकालीन मेघोंसे भी वह नष्ट नहीं होता; क्योंकि वह स्वयम्प्रकाशरूप एवं अविनाशी है। वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म नेत्रोंसे नहीं देखा जा सकता; क्योंकि वह अनुभवरूप, हृदय-मन्दिरको प्रकाशित करने-वाला, सबको सत्ता देनेवाला, अनन्त और परम प्रकाश-स्वरूप बताया गया है। आकाश आदि देश, काल और क्रिया आदिकी सत्ता एवं जगत् उसी ज्ञानस्वरूप परमात्मामें प्रतीत होते हैं। वही सबका स्वामी, कर्ता, पिता और भोक्ता है। वास्तवमें परमात्मा होनेके कारण उसका किसीसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। न निमेष है न कल्प है, न सामीप्य है और न दूरी ही है। चेतन परमात्माका संकल्प ही अन्यान्य वस्तुओंके रूपमें
उत्पत्ति-प्रकरण ] * परमात्माके स्वरूपका विवेचन, बीजमें वृक्षकी भाँति परमात्मामें जगत्की स्थिति ॐ १८३
स्थित है, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं है। इस प्रकार जगत्के मिथ्यात्वका उपपादन करनेवाले न्यायों (युक्तियों) की बारंबार भावनारूप अभ्यासके द्वारा निर्मल हुए मनसे जिसने पारमार्थिक वस्तु ब्रह्मका दर्शन कर लिया है, उस पुरुषकी अविद्याका नाश हो जानेके कारण चिदाकाशमें उसे फिर संसारकी प्रतीति नहीं होती। जैसे बीजके भीतर स्थित हुए वृक्षकी सत्ता अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण आकाशके तुल्य है, उसी तरह ब्रह्मके भीतर स्थित हुए जगत्का परमात्मा साक्षी है; इसलिये जगत्का साक्षीसे पृथक् प्रतीति न होनेके कारण सच्चिदानन्दरूपसे ही उसकी स्थिति है। शान्त, सर्वात्मक, जन्मरहित, अद्वितीय, आदि और मध्यसे शून्य, निर्द्वन्द्व, मायाके कार्यसे रहित, जगद्रूपमें नाना-सा प्रतीत होता हुआ भी वास्तवमें एक, विशुद्ध, ज्ञानस्वरूप, अजन्मा, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही है। उसमें किसी प्रकारकी कोई कल्पना किसी तरह भी सम्भव नहीं है।
जगत्की प्रतीतिका अभाव ही जिस (परमात्मा) के स्वरूपका परम अनुभव है, सम्पूर्ण संकल्पोंका त्याग ही चित्तके द्वारा जिसका संग्रह (चिन्तन) है, जिसके संकोचसे संसारका प्रलय और विकाससे उसकी सृष्टि होती है, जो वेदान्त-वाक्योंका परम तात्पर्य एवं वाणीका अविषय है, यह चराचर जगत् जिसकी चिन्मयी लीला है तथा विश्वरूप होनेपर भी जिसकी अखण्डता कभी खण्डित नहीं होती, वही सन्मात्र शाश्वत ब्रह्म कहा गया है। वह अणुसे भी अणु परमात्मा अपने संकल्पसे वायु होता है। किंतु उसकी वह भ्रमरूपता भ्रान्तदृष्टिमूलक है, अतः वास्तवमें वह वायु आदि कुछ भी नहीं है, केवल शुद्ध चेतन ही है। वही परमात्मा शब्दके संकल्पद्वारा शब्द बनता है; किंतु उसकी शब्दरूपताका दर्शन भ्रममूलक है। वास्तवमें तो वह शब्द और शब्दार्थकी दृष्टिसे बहुत दूर है। उस परमात्माकी प्राप्तिके सैकड़ों साधन हैं। उसके प्राप्त होनेपर कुछ भी पाना शेष नहीं रहता। वही परम ज्ञातव्य हैं। उसके सिवा कुछ भी नहीं है।
जो अणुका भी अणु, केवल चिन्मय और अत्यन्त सूक्ष्मतम है, उस परमात्मासे यह सम्पूर्ण विश्व सब ओरसे परिपूर्ण है। अणुरूप होता हुआ भी यह परमात्मा सैकड़ों—अनन्त योजनोंमें नहीं समाता; क्योंकि वह सर्वव्यापी, अनादि और रूपरहित होनेके कारण निराकार है। जैसे मेरु पर्वतकी सरसोंके साथ तुलना करना उचित नहीं, उसी तरह शुद्ध ज्ञानमय चेतनाकाशरूप परमात्माकी परमाणुके साथ तुलना करना शोभा नहीं देता। जैसे प्रतिबिम्ब दर्पणमें ही पड़ता है, उसी प्रकार जलमें जो कोई भी सम्पूर्ण रस है, वह परमात्माका ही आश्रय लेकर स्थित है। परमात्माके बिना स्वतः उसकी कोई सत्ता नहीं है। जिसने सकल्प-रहित होनेपर इस जगत्को त्याग दिया—इसका अभाव कर दिया है और अपने संकल्पसे ही पुनः सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न किया है, जगत्का अभाव करनेवाले उस अणुसे भी अणु चिन्मय परमात्माने इस समस्त विश्वको व्याप्त कर रखा है। जैसे सपनेमें एक ही निमेषमें बाल्यावस्थासे लेकर बुढ़ापेतकका बोध होता है, उसी प्रकार उस सूक्ष्म चिन्मय परमात्मामें निमेषका ज्ञान ही सहस्रों कल्पोंके समान प्रतीत होता है। इसलिये वह सूक्ष्म परमात्मा निमेषरूप होता हुआ ही शतकोटि कल्पोंका समूह है। अणुसे-भी-अणु सच्चिदानन्दघन परमात्मामें सम्पूर्ण जगत् स्थित हैं और उसीसे जगत्की सारी प्रतीतियाँ होती हैं।
जैसे बीजमें भावी वृक्ष रहते हैं, वैसे ही चिन्मय परमात्मामें भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालोंके प्राणी सदा विद्यमान रहते हैं। वह परमात्मा सम्पूर्ण जगत्में उदासीनकी भाँति स्थित है। कर्तापन और भोक्तापनसे उसका थोड़ा-सा भी स्पर्श या सम्बन्ध नहीं है। परमात्मा इस जगत्के बाहर भी स्थित है और
१८४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
भीतर भी—यह बात तीनों लोकोंमें अधिकारी प्राणियोंके उपदेशके लिये कही जाती है। यह बाह्य और आन्तरिक स्थितिका भेद 'शब्द'तक ही सीमित है, वस्तुमें नहीं है; क्योंकि वस्तु चेतनरूप है, अतः उसमें उक्त भेदका होना कदापि सम्भव नहीं। द्रष्टा परमात्मा दृश्य जगत्का रूप नहीं धारण कर सकता; क्योंकि दृश्यत्व असत् एव वास्तविक हैं। जो कोई भी वस्तु परमात्मामें हैं ही नहीं, परमात्मा उसका स्वरूप कैसे धारण कर सकता है। व्यवहारदृष्टिसे द्रष्टा ही दृश्यभावको प्राप्त होता है। जैसे पिताके बिना पुत्र और भोक्ताके बिना भोग्य नहीं हैं, उसी प्रकार दृश्यके बिना द्रष्टापन नहीं है।
जैसे विशुद्ध सुवर्णमें यह सामर्थ्य है कि उसका कगन आदि बन सके, उसी प्रकार चिन्मय होनेके कारण द्रष्टामें यह शक्ति है कि वह दृश्यका निर्माण कर सके। जैसे सोनेका कड़ा यह सामर्थ्य नहीं रखता कि वह सुवर्णका निर्माण कर सके, उसी प्रकार जड होनेके कारण दृश्यमें यह शक्ति नहीं है कि वह द्रष्टाका निर्माण कर सके। जैसे सुवर्ण कंगनके भ्रमको उत्पन्न करता है, उसी प्रकार चिन्मय परमात्मा दृश्यका निर्माण करता है। उक्त दृश्य असत् होता हुआ भी अज्ञानवश सत्-सा प्रतीत होता है। दृश्य अज्ञानमात्रसे उत्पन्न है। जबतक कारणभूत अज्ञान रहता है तभीतक उसकी स्थिति रहती है। जैसे कड़े और कगन आदिकी प्रतीतिके समय सुवर्णकी सुवर्णता सत्य होनेपर भी स्फुटरूपसे स्फुरित नहीं होती, क्योंकि मूढ़ पुरुषकी बुद्धि उक्त आभूषणके नाम-रूपमें ही उलझी रहती है, उसी प्रकार द्रष्टाके दृश्यरूपमें स्थित होनेपर उसके वास्तविक स्वरूपकी स्फूर्ति नहीं होती। जैसे कगनके रूपमें प्राप्त होनेपर सुवर्ण अपनी पूर्वसिद्ध सुवर्णताको लक्ष्य कराता है, वैसे ही दृश्यरूपमें स्थित हुआ द्रष्टा अपने द्रष्टापनको लक्षित कराता है। द्रष्टा जब अज्ञानवश अपनेको दृश्यरूपमें देखता है, तब अपने वास्तविक स्वरूपको नहीं देख पाता। द्रष्टामें दृश्यत्वकी प्राप्ति होनेपर उसकी सत्ता भी असत्ता-सी हो जाती है अर्थात् वह सद्रूप होनेपर भी असत्-सा भासित होने लगता है। परंतु जब ज्ञानसे दृश्य गलित हो जाता है, तब केवल द्रष्टाकी ही सत्ता रह जाती है। जैसे कड़े और कंगनको गला देनेपर जब उसके नाम-रूपकी प्रतीति नहीं रहती, तब केवल सुवर्णकी सुवर्णता ही रह जाती है।
जैसे जल, भूमि आदि पाँच भूतोंसे भौतिक पदार्थ तनिक भी पृथक् नहीं हैं, उसी प्रकार इस स्वभावसिद्ध परमात्मारूप अणुसे कुछ भी पृथक् नहीं है। परमात्मा सर्वव्यापी अनुभवरूप है तथा सबका अनुभव भी उसीका स्वरूप है; अतः एकत्वके यथार्थ अनुभवकी युक्ति जब सुदृढ़ हो जाती है, तब इस परमात्माकी सबके साथ एकता समझमें आती है। परमात्मा दिशा, काल आदिसे सीमित नहीं है। वह एकमात्र, अद्वितीय है। सबका आत्मा होनेके कारण सबसे अभिन्न है। स्वतः तो वह सर्वानुभवरूप ही है, जड नहीं है।
जैसे कड़े या कंगनकी सत्ता सुवर्णसे पृथक् नहीं हैं, उसी प्रकार द्वैत भी ब्रह्मसे अलग नहीं है—जिसे भलीभाँति ऐसा ज्ञान हो चुका है, उसका वह ज्ञान ही द्वैत है और वह ज्ञान सत् नहीं है। जैसे जलकी द्रवता जलसे, वायुका स्पन्दन वायुसे तथा आकाशकी शून्यता आकाशसे अलग नहीं है, वैसे ही द्वैत परमात्मासे पृथक् नहीं है। द्वैत और अद्वैतकी प्रतीति दुःखस्वरूप प्रवृत्तिकी सिद्धिके लिये ही है, निवृत्तिके लिये नहीं। वास्तवमें जो इन दोनोंकी अनुपलब्धि या अप्रतीति है, वह यदि अच्छी तरह समझमें आ जाय तो ज्ञानी पुरुष उसीको परमपद मानते हैं। प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय-रूप तथा द्रष्टा, दर्शन और दृश्यरूप जो यह सम्पूर्ण जगत् है, वह अणुसे-भी-अणु चेतन परमात्माके स्वरूपमें ही स्थित है। जैसे वायु अपने शरीरमें ही स्पन्दनको उत्पन्न करती और लीन भी कर लेती है,