संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८० * अविच्छिन्नसच्चिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
यह जगत् शान्त हो जाता है। जिस पुरुषके पैर जूतेसे ढके होते हैं, उसके लिये मानो सारी पृथ्वीपर ही चमड़ा बिछा हुआ है; इसी प्रकार जिसका चित्त शान्त है, उसके लिये सारा जगत् ही शान्त हो गया। जैसे केलेके वृक्षमें पत्तोंको छोड़कर और कुछ भी सार नहीं रहता, उसी प्रकार जगत्में भ्रमके सिवा और कुछ भी सार तत्त्व नहीं है। जीव जन्म लेता है; फिर क्रमशः बाल्यावस्था, युवावस्था, वृद्धावस्था तथा मृत्युको प्राप्त होता है। तत्पश्चात् वह शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार स्वर्ग और नरकमें पहुँचता है। यह सब भ्रमवश चित्तका नृत्य अर्थात् संकल्पमात्र है। जैसे मलदोषसे मलिन नेत्र चन्द्रमा आदिमें दो-दो आकृतियाँ देखता है, वैसे ही भ्रमसे आक्रान्त हुआ जीवात्मा परमात्मामें द्वैत देखता है (जीव और ईश्वरमें भेदका दर्शन करता है)। जैसे मदिरा पीकर मतवाला हुआ मनुष्य नशेके कारण वृक्षोंको घूमते देखता है, उसी प्रकार जीवात्मा चित्तद्वारा कल्पित संसारोंका दर्शन करता है। जैसे बालक खेल-कूदमें वेगसे घूमनेके कारण सारे जगत्को कुम्हारके चाककी भाँति घूमता देखते हैं, उसी प्रकार जीव चित्तके भ्रमसे ही इस दृश्य-जगत्को देखते हैं—यों समझो। जिस पदार्थका चेतन अनुभव करता है, वह चेतनसे अतिरिक्त दूसरा कुछ नहीं है। इस प्रकार दृश्यकी शान्ति होनेपर विषय न रहनेसे ईंधनरहित अग्निके समान चित्त स्वयं शान्त हो जाता है। जब पुरुष सच्चिदानन्दघन परमात्मासे एकताको प्राप्त होकर निश्चल स्थितिमें स्थित हो जाता है, तब वह शान्त होकर बैठे या व्यवहारमें लगा रहे—दोनों ही अवस्थाओंमें भलीभाँति शान्त कहा जाता है। व्यष्टि-चेतन अज्ञानी जीव विषयका अनुभव करता है, परंतु सच्चिदानन्दघनमें एकीभावको प्राप्त ज्ञानी महात्मा विषयका आस्वादन नहीं करता।
परमपदमें आरूढ़ और सच्चिदानन्दघन परब्रह्ममे एकीभावको प्राप्त हुए पुरुषका 'देहके भानसे शून्य' और 'निर्विषय' आदि समानार्थक शब्दोंद्वारा वर्णन होता है। जीवात्मा चित्तके संकल्पद्वारा ही स्थूलताको प्राप्त होता है और 'मैं उत्पन्न हूँ, जीवित हूँ, देखता हूँ तथा (जन्म-मृत्युरूप) संसारको प्राप्त होता हूँ' इत्यादि रूपसे मिथ्या-भ्रमका दर्शन करता है। चेतनके द्वारा जिस किसीका अनुभव होता है, वही स्थूल जगत् है। रज्जुमें सर्पकी भाँति प्रतीत होनेवाले उस आभासको अविद्या—भ्रम कहते हैं। इस संसार नामक व्याधिकी चिकित्सा एवं निवारण केवल ज्ञानमात्रसे ही सम्भव है। यह संसार चित्तका एक संकल्पमात्र है। इसके बाधमें किसी प्रकारका आयास नहीं है। जैसे अच्छी तरह देखभाल करनेसे रस्सीमें साँपका भ्रम मिट जाता है, उसी प्रकार परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे यह संसार-रूपी भ्रम अवश्य नष्ट हो जाता है।
श्रीराम! जिस वस्तुकी अभिलाषा हो, उसीका निश्चित रूपसे त्याग करके यदि रहा जा सके, तब तो मोक्ष प्राप्त ही है। इतना करनेमें कौन-सी कठिनाई है। परमात्माकी प्राप्ति-रूप महान् उद्देश्यसे सम्पन्न पुरुष जब इस संसारमें अपने प्राणोंका भी मोह तिनकेके समान त्याग देते हैं, तब जिस सांसारिक वस्तुकी इच्छा की गयी है, केवल उसीका त्याग करनेमें कंजूसी कैसे की जा सकती है। जैसे हाथमें रक्खा हुआ बेलका फल अथवा सामने खड़ा हुआ पर्वत प्रत्यक्ष ही दिखायी देता है, उसी प्रकार उस तत्त्वज्ञ महात्माके लिये परमात्माका जन्म आदि विकारोंसे रहित होना प्रत्यक्ष ही है। जैसे प्रलयकालका अनन्त अपार एकार्णव अपनी असंख्य तरङ्गोंके कारण अनेक-सा प्रतीत होता है, उसी प्रकार अप्रमेय परमात्मा ही अज्ञानके कारण जगद्रूपसे प्रतीत हो रहा है। उसके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान हो जाय तो वही मोक्षरूप सिद्धि प्रदान करता है; परंतु जो उसे तत्त्वतः जान नही लेता, उसका मन सदा बन्धनमें ही पड़ा रहता है।
रघुनन्दन! ब्रह्म सदा सम्पूर्ण शक्तियोंसे सम्पन्न तथा सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। वह जहाँ जिस शक्तिसे