संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति-प्रकरण ] * चित्तका विलास ही द्वैत है, त्याग और ज्ञानसे ही मनका क्षय होता है * १८१
स्फुरित होता है, वहाँ अपनेमें उसी शक्तिको प्राप्त हुई देखता है। सबका आत्मा ब्रह्म अनादिकालसे जिस व्यष्टि-चेतनको स्वयं जानता है, वही यहाँ जीव नामसे कहा गया है और वह जीव ही संकल्प करनेवाला है। जीव-ईश्वरका अनादिकालसे जो स्वाभाविक भेद है, वही जीवके जन्म-मरणमें कारण है। जैसे आकाशमें क्रियाशील और अक्रिय वायु ही है, उससे अतिरिक्त कुछ नहीं है, उसी तरह यहाँ सर्वत्र क्रियाशील और अक्रिय सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही है। उससे अतिरिक्त और कुछ नहीं है। उस ब्रह्मके क्रियाशील होनेपर सृष्टिका प्रादुर्भाव होता है और अक्रिय रहनेपर सबका प्रलय हो जाता है। उस अवस्थामें ब्रह्म ही शान्तभावसे स्थित रहता है। जिसने जीव-ईश्वरके भेदकी कल्पना कर रखी है, ऐसे जीवात्माको ही देहकी प्राप्ति होती है। वह जीवात्मा ही संसारमें संकल्पसे नाना प्रकारके विषयोंको प्राप्त होता है। यही नाना योनियोंको प्राप्त जीवात्मा ज्ञान होनेपर शीघ्र मुक्त हो जाता है। उनमेंसे कोई मन्द अभ्यासी तो साधन करते-करते हजारों जन्मोंमें मुक्ति प्राप्त करता है और कोई तीव्र अभ्यास करनेवाला पुरुष एक ही जन्ममें मुक्ति लाभ कर लेता है। स्वभावके कारण ही जीवात्मा ब्रह्म और जीवके भेदभावको प्राप्त हो रहा है। इसीसे वह गुणोंका सङ्ग पाकर कर्मानुसार स्वर्ग, मोक्ष, नरक और बन्धन आदिके हेतुभूत देहभावको क्रमशः प्राप्त होता है। वास्तवमें यह संसार न तो उत्पन्न हुआ है और न यह सत्तावान् होकर स्थित ही है, तथापि मनका भ्रम इसे देखता है। जैसे गोलाकार घूमने या नृत्य करनेसे भ्रमपीड़ित पुरुष नगरको भी घूमता हुआ-सा देखता है, उसी तरह मनके भ्रमसे युक्त जीवात्मा 'मैं उत्पन्न हुआ, स्थित रहा और मरा' इत्यादि भावोंका अनुभव करता है। परमार्थ-वस्तुका दर्शन न होनेके कारण आशा-तृष्णाके वशीभूत हुआ चित्त 'अहं-मम' इत्यादि रूपसे अनुभवमें आनेवाले असत् संसारको ही देखता (और उसे सद् मानता) है।
श्रीराम ! जैसे जल तरङ्गरूपसे स्फुरित होता है, उसी तरह केवल मनकी भ्रान्तिके उल्लास (उत्कर्ष) से विस्तारको प्राप्त हुआ यह सभी दृश्य-प्रपञ्च जगत्रूपसे भासित होता है। व्यष्टि-चेतन ही बुद्धि-वृत्तिके संयोगसे जीव कहलाता है। वह जीव ही सङ्कल्प करनेसे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार तथा मायाके रूपमें परिणत हो जाता है। जैसे स्वप्नमें जो नगर आदिका भान होता है, वह मनका भ्रम ही है, उसी तरह यह संसार भी चित्तका भ्रम ही है। व्यष्टि-चेतनको जो संसारका ज्ञान है, वही जागरण कहा गया है। सूक्ष्म शरीरमें जो उसका अहंभाव है, उसीको स्वप्न माना गया है। मनका जो प्रकृतिमें विलीन हो जाना है, वही सुषुप्ति है तथा केवल सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें जो एकीभावसे तन्मय हो जाना है, उसीको तुरीयावस्था कहते हैं। अत्यन्त शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमात्मामें जो अविचल स्थिति है, वही परिणाममें विकार-रहित तुरीयातीत पद है। उस पदमें स्थित पुरुष कभी शोक नहीं करता (वहाँ शोकका सर्वथा अभाव है)। उस परमात्मामें ही यह सब जगत् सम्पन्न होता है (उसीमें स्थित रहता है) और उसीमें लीन हो जाता है। वास्तवमें न तो यह ब्रह्म जगत्रूप है और न उस ब्रह्ममें जगत् ही है। जैसे नेत्रदोषके कारण आकाशमें भ्रमसे मोतीके दाने-से दीखते हैं, वैसे ही ब्रह्ममें भ्रमसे इस जगत्का दर्शन होता है। जैसे स्फटिकके भीतर प्रतिबिम्बित वन आदि उसके यथार्थ ज्ञानके बिना सत्य-से दीखते हैं, उसी तरह यथार्थ ज्ञान न होनेके कारण अद्वितीय ब्रह्मरूप होता हुआ भी यह जगत् शुद्ध ब्रह्मके भीतर नाना-सा प्रतीत होता है। ब्रह्मासे लेकर कीट-पतंग-पर्यन्त बुद्धिवृत्तिका भ्रमरूप जगत् असत् ही है; क्योंकि परमात्माका यथार्थ ज्ञान होनेपर इसका बाध हो जाता है। यह जगत् मिथ्या ही उत्पन्न हुआ है, मिथ्या ही बढ़ता है, मिथ्या ही रुचिकर प्रतीत होता है और मिथ्या ही लयको प्राप्त होता है; शुद्ध सर्वव्यापी ब्रह्म अनन्त और