संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अद्वितीय है। अज्ञानसे ही वह अशुद्ध-सा, असत्-सा, नाना-सा और असर्वव्यापी-सा (सीमित-सा) ज्ञात होता है। जैसे जल भिन्न है और तरङ्ग उससे भिन्न है—ऐसी जो बालकों अथवा मूर्खोंकी कल्पना है, उसीसे जल और तरङ्गमें मिथ्या भेदकी प्रतीति होती है, उसी तरह जो यह जगत्का भेद प्रतीत होता है, वह भी वास्तविक नहीं है। केवल अज्ञानियोंने उसकी कल्पना कर रखी है। जैसे रस्सीमें सर्पकी स्थिति है, वैसे ही ब्रह्ममें शत्रु और मित्रके समान विरुद्ध और अविरुद्ध भेदाभेद शक्तियों-की स्थिति सम्भव है। (सर्ग ६६–७९)
परमात्मसत्ताका विवेचन, बीजमें वृक्षकी भाँति परमात्मामें जगत्की त्रैकालिक स्थितिका निरूपण तथा ब्रह्मसे पृथक् उसकी सत्ता नहीं है—इसका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! नामरहित तथा मन और नेत्र आदि छः ज्ञानेन्द्रियोंसे अगम्य होनेके कारण आकाशसे भी सूक्ष्म चिन्मात्र परमात्मा ही 'अणु' शब्दसे कहा गया है। अणुके भी अणु सच्चिदानन्दघन परमात्माके अंदर अज्ञानियोंकी दृष्टिसे सत्-सा और ज्ञानियोंकी दृष्टिसे असत्-सा स्थित हुआ यह जगत् बीजके भीतर वृक्षकी सत्ताके समान स्फुरित होता है। सम्पूर्ण वस्तुओंकी सत्ता वास्तविक सत्ताके अधीन है; उसको यदि और किसीके अधीन मानें तो भूल होगी। अतः स्वतःसिद्ध वास्तविक सत्तासे ही सबकी सत्ता है। यह परम आकाशरूपी परमात्मा सूक्ष्म होनेके कारण नेत्रेन्द्रियका विषय नहीं है। सर्वात्मक होता हुआ भी वह मनसहित पाँचों इन्द्रियोंसे अतीत होकर स्थित है, अतः अणुका भी अणु है। सर्वात्मक होनेके कारण ही वह कभी शून्य नहीं हो सकता। क्योंकि 'वह है, नहीं है'—ऐसा कहने और मनन करनेवाला पुरुष आत्मा ही तो है; फिर उसकी असत्ता कैसे कही जा सकती है। किसी भी युक्तिसे यहाँ सत् वस्तुकी असत्ता नहीं सिद्ध की जा सकती। जैसे कपूर अपनी सुगन्धसे प्रतीत होता है, वैसे ही सर्वात्मा सर्वव्यापीरूपसे अनुभवमें आता है। अणुका-भी-अणु चेतन परमात्मा ही सब कुछ है। मन और इन्द्रियों-की वृत्तिसे नानात्वकी प्रतीति होनेके कारण मनः-परिच्छिन्नरूपसे ही वह सर्वात्मक है और इन्द्रियातीत होनेके कारण वह निर्मल परमात्मा नित्य सत्तावान् होकर भी कुछ प्रतीत नहीं होता—इन्द्रियों-का विषय नहीं होता। वही एक है और सम्पूर्ण जीवोंके अन्तःकरणमें आत्मारूपसे अनुभूत होनेके कारण अनेक भी है। वही अपने संकल्पसे इस सम्पूर्ण जगत्को धारण करता है। अतः जगतरूपी रत्नोंका कोष भी वही है।
जैसे जिसका मुँह बंद है, ऐसे घड़ेको अन्य देशमें ले जानेपर उसमें स्थित आकाशका गमन और आगमन नहीं होता, उसी प्रकार देहरूपी उपाधिके गमनागमनसे आत्माका गमनागमन नहीं हो सकता। चिन्मय परमात्मा अपनी चेतनसे सूर्य आदिके प्रकाशका भी प्रकाशक है और महाकल्पके प्रलयकालीन मेघोंसे भी वह नष्ट नहीं होता; क्योंकि वह स्वयम्प्रकाशरूप एवं अविनाशी है। वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म नेत्रोंसे नहीं देखा जा सकता; क्योंकि वह अनुभवरूप, हृदय-मन्दिरको प्रकाशित करने-वाला, सबको सत्ता देनेवाला, अनन्त और परम प्रकाश-स्वरूप बताया गया है। आकाश आदि देश, काल और क्रिया आदिकी सत्ता एवं जगत् उसी ज्ञानस्वरूप परमात्मामें प्रतीत होते हैं। वही सबका स्वामी, कर्ता, पिता और भोक्ता है। वास्तवमें परमात्मा होनेके कारण उसका किसीसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। न निमेष है न कल्प है, न सामीप्य है और न दूरी ही है। चेतन परमात्माका संकल्प ही अन्यान्य वस्तुओंके रूपमें