भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उत्पत्ति-प्रकरण ] * परमात्माके स्वरूपका विवेचन, बीजमें वृक्षकी भाँति परमात्मामें जगत्‌की स्थिति ॐ १८३


स्थित है, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं है। इस प्रकार जगत्‌के मिथ्यात्वका उपपादन करनेवाले न्यायों (युक्तियों) की बारंबार भावनारूप अभ्यासके द्वारा निर्मल हुए मनसे जिसने पारमार्थिक वस्तु ब्रह्मका दर्शन कर लिया है, उस पुरुषकी अविद्याका नाश हो जानेके कारण चिदाकाशमें उसे फिर संसारकी प्रतीति नहीं होती। जैसे बीजके भीतर स्थित हुए वृक्षकी सत्ता अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण आकाशके तुल्य है, उसी तरह ब्रह्मके भीतर स्थित हुए जगत्‌का परमात्मा साक्षी है; इसलिये जगत्‌का साक्षीसे पृथक् प्रतीति न होनेके कारण सच्चिदानन्दरूपसे ही उसकी स्थिति है। शान्त, सर्वात्मक, जन्मरहित, अद्वितीय, आदि और मध्यसे शून्य, निर्द्वन्द्व, मायाके कार्यसे रहित, जगद्रूपमें नाना-सा प्रतीत होता हुआ भी वास्तवमें एक, विशुद्ध, ज्ञानस्वरूप, अजन्मा, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही है। उसमें किसी प्रकारकी कोई कल्पना किसी तरह भी सम्भव नहीं है।

जगत्‌की प्रतीतिका अभाव ही जिस (परमात्मा) के स्वरूपका परम अनुभव है, सम्पूर्ण संकल्पोंका त्याग ही चित्तके द्वारा जिसका संग्रह (चिन्तन) है, जिसके संकोचसे संसारका प्रलय और विकाससे उसकी सृष्टि होती है, जो वेदान्त-वाक्योंका परम तात्पर्य एवं वाणीका अविषय है, यह चराचर जगत् जिसकी चिन्मयी लीला है तथा विश्वरूप होनेपर भी जिसकी अखण्डता कभी खण्डित नहीं होती, वही सन्मात्र शाश्वत ब्रह्म कहा गया है। वह अणुसे भी अणु परमात्मा अपने संकल्पसे वायु होता है। किंतु उसकी वह भ्रमरूपता भ्रान्तदृष्टिमूलक है, अतः वास्तवमें वह वायु आदि कुछ भी नहीं है, केवल शुद्ध चेतन ही है। वही परमात्मा शब्दके संकल्पद्वारा शब्द बनता है; किंतु उसकी शब्दरूपताका दर्शन भ्रममूलक है। वास्तवमें तो वह शब्द और शब्दार्थकी दृष्टिसे बहुत दूर है। उस परमात्माकी प्राप्तिके सैकड़ों साधन हैं। उसके प्राप्त होनेपर कुछ भी पाना शेष नहीं रहता। वही परम ज्ञातव्य हैं। उसके सिवा कुछ भी नहीं है।

जो अणुका भी अणु, केवल चिन्मय और अत्यन्त सूक्ष्मतम है, उस परमात्मासे यह सम्पूर्ण विश्व सब ओरसे परिपूर्ण है। अणुरूप होता हुआ भी यह परमात्मा सैकड़ों—अनन्त योजनोंमें नहीं समाता; क्योंकि वह सर्वव्यापी, अनादि और रूपरहित होनेके कारण निराकार है। जैसे मेरु पर्वतकी सरसोंके साथ तुलना करना उचित नहीं, उसी तरह शुद्ध ज्ञानमय चेतनाकाशरूप परमात्माकी परमाणुके साथ तुलना करना शोभा नहीं देता। जैसे प्रतिबिम्ब दर्पणमें ही पड़ता है, उसी प्रकार जलमें जो कोई भी सम्पूर्ण रस है, वह परमात्माका ही आश्रय लेकर स्थित है। परमात्माके बिना स्वतः उसकी कोई सत्ता नहीं है। जिसने सकल्प-रहित होनेपर इस जगत्‌को त्याग दिया—इसका अभाव कर दिया है और अपने संकल्पसे ही पुनः सम्पूर्ण जगत्‌को उत्पन्न किया है, जगत्‌का अभाव करनेवाले उस अणुसे भी अणु चिन्मय परमात्माने इस समस्त विश्वको व्याप्त कर रखा है। जैसे सपनेमें एक ही निमेषमें बाल्यावस्थासे लेकर बुढ़ापेतकका बोध होता है, उसी प्रकार उस सूक्ष्म चिन्मय परमात्मामें निमेषका ज्ञान ही सहस्रों कल्पोंके समान प्रतीत होता है। इसलिये वह सूक्ष्म परमात्मा निमेषरूप होता हुआ ही शतकोटि कल्पोंका समूह है। अणुसे-भी-अणु सच्चिदानन्दघन परमात्मामें सम्पूर्ण जगत् स्थित हैं और उसीसे जगत्‌की सारी प्रतीतियाँ होती हैं।

जैसे बीजमें भावी वृक्ष रहते हैं, वैसे ही चिन्मय परमात्मामें भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालोंके प्राणी सदा विद्यमान रहते हैं। वह परमात्मा सम्पूर्ण जगत्‌में उदासीनकी भाँति स्थित है। कर्तापन और भोक्तापनसे उसका थोड़ा-सा भी स्पर्श या सम्बन्ध नहीं है। परमात्मा इस जगत्‌के बाहर भी स्थित है और