भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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१७८ -* अविच्छिन्नान्मचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

पुरुषार्थ दोनोंको बनाना चाहिये। प्रारब्धके अनुसार अवश्य होनेवाला भोग होकर ही रहेगा—ऐसा निश्चय करके बुद्धिमान् पुरुष कभी पौरुषका त्याग न करे; क्योंकि प्रारब्ध पौरुषरूपसे ही नियामक होता है अर्थात् पूर्वजन्मोंमें किया गया पुरुषार्थ ही वर्तमान जन्ममें प्रारब्ध होकर यह नियम करता है कि अमुकको ऐसा ही होना चाहिये।

जो प्रारब्धके भरोसे मूक बनकर पौरुषशून्य एवं अकर्मण्य हो जाता है, वह कभी सुखी नहीं हो सकता। जो अकर्मण्य होकर बैठेगा, उसकी प्राण-वायुकी चेष्टा कहाँ चली जायगी। यदि निर्विकल्प समाधिमें चित्तको शान्ति प्रदान करनेवाला प्राणनिरोध करके पुरुष साधु होकर मुक्ति पा ही गया तो वह भी उसके पुरुषार्थका ही फल है। बिना पुरुषार्थके किस फलकी प्राप्ति बतायी जा सकती है ? एकमात्र शास्त्रीय पुरुषार्थमें तत्पर होना कल्याणकारी श्रेष्ठ साधन है और कर्तृत्वका अत्यन्त अभावरूप मोक्ष सर्वश्रेष्ठ कल्याणमय फल है।

इन साधन और फलोंकी अपेक्षा ज्ञानियोंका पक्ष सबल है; क्योंकि उन ज्ञानी महात्माओंका प्रारब्ध-भोग दुःखरहित है। जो दुःखरहित प्रारब्ध-भोग है, वह यदि ब्रह्मसत्ताके प्रकाशमें स्थिर हो जाय तो निश्चय समझना चाहिये कि वह परम शुद्ध ब्रह्म, जिसे परम गति कहते हैं, प्राप्त हो ही गया। (सर्ग ६२)


ब्रह्मकी सर्वरूपता तथा उसमें भेदका अभाव, परमात्मासे जीवकी उत्पत्ति और उसके स्वरूपका विवेचन, परमात्मासे ही मनकी उत्पत्ति, मनका भ्रम ही जगत् है—इसका प्रतिपादन तथा जीव-चित्त आदिकी एकता

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! यह जो ब्रह्म-तत्त्व है, वह सर्वथा, सर्वदा, सब ओरसे सर्वशक्तिमान्, सर्वरूप, सर्वेश्वर, सर्वव्यापी और सर्वमय ही है। वह जब, जहाँ, जिसकी, जिस प्रकारसे भावना करता है, तब वहाँ उसीको प्रत्यक्ष देखता है। सर्वशक्तिमान् परमात्मासे जो-जो शक्ति जैसे उदित होती है, वह उसी प्रकार रहती है। ऐसी स्थितिमें वह शक्ति स्वभावसे ही नाना प्रकारके रूपवाली है। परमार्थ-दृष्टिसे ये सारी शक्तियाँ यह आत्मा ही है अर्थात् शक्ति और शक्तिमान् परमात्मामें कोई भेद नहीं है। बुद्धिमानोंने लौकिक व्यवहारकी सिद्धिके लिये इस प्रकार भेदरूप संसार-जालकी कल्पना की है। वस्तुतः परमात्मामें भेद नहीं है। जैसे समुद्रमें छोटी-बड़ी लहरोंका और समुद्रका; कंगन, बाजूबंद और केयूरके साथ सोनेका तथा अवयव और अवयवीका भेद वास्तविक नहीं है, उसी प्रकार आत्मामें द्वैत अथवा भेद वास्तविक नहीं है, कल्पना करनेवाले पुरुषकी बुद्धिसे कल्पित है। परमार्थ-दृष्टिसे देखा जाय तो यह सम्पूर्ण आकारोंसे युक्त विस्तृत प्रपञ्च सर्वव्यापी ब्रह्म ही है। मिथ्या ज्ञानवाले लोगोंने ही शक्ति और शक्तिमान्‌के तथा अवयव और अवयवीके भेदकी कल्पना कर रक्खी है। यह भेद यथार्थ नहीं है। सत् हो या असत्, सच्चिदानन्दघन परमात्मा जिस सदसद्-वस्तुका संकल्प अथवा अभिनिवेश करता है, उसी-उसीको देखता है। वास्तवमें सब वस्तुओंके रूपमें वह सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही भासित हो रहा है।

श्रीराम ! यह जो सर्वव्यापी, स्वयम्प्रकाश, आदि-अन्तसे रहित, सबका महान् ईश्वर, स्वानुभावानन्दस्वरूप, शुद्ध, सच्चिदानन्दघन परमात्मा है, इसीसे पहले जीव उत्पन्न हुआ है। वही उपाधिकी प्रधानतासे चित्त कहलाता है और चित्तसे यह जगत् उत्पन्न हुआ है।

रघुनन्दन ! जिसमें प्रतीत होनेवाला दृश्य-प्रपञ्च असत्