संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति-प्रकरण ] * जगत्की असत्ता या भ्रमरूपताका प्रतिपादन * १७७
स्मृति-वाक्यके अनुसार जो देह आदिमें अहंभावका अनुभव नहीं करता, ऐसा कौन मनुष्य जन्म-मरणरूपी भ्रमको प्राप्त होगा । परब्रह्ममें व्यष्टि जीव-रूपसे प्रकट हुई जो अद्वितीय चित्-सत्ता है, वह जलकी तरलताके भीतर व्यक्त हुई आवर्त (भँवर) की रेखाके समान है। वही अहंभावसे युक्त होकर इन तीनों लोकोंको धारण करती है। वास्तवमें तो परमात्माके भीतर न सद्रूप जगत् है और न असद्रूप । (सर्ग ६१)
जगत्की असत्ता या भ्रमरूपताका प्रतिपादन तथा नियति और पौरुषका विवेचन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ये वर्तमान, भविष्य और भूतकालकी सृष्टि-परम्पराएँ अपनी सत्ताको उसी प्रकार धारण करती हैं, जैसे जलकी तरलता अपने भीतर स्पष्ट रूपसे आवर्तोंकी परम्परा धारण करती हैं। जैसे महती मरुभूमिमें तटवर्ती वृक्षों और लताओंसे झड़ती हुई पुष्प-राशिसे परिपूर्ण लहराती नदी मिथ्या ही प्रतीत होती है,उसी प्रकार सच्चिदानन्दघन परमात्मामें यह सृष्टि-सुषमा सर्वथा मिथ्या ही है । जैसे स्वप्नका संसार-इन्द्रजालका नगर और संकल्प या मनोरथद्वारा कल्पित जगत्—ये सब सत्य न होनेपर भी प्रतीतिके विषय होते हैं, उसी प्रकार सृष्टियोंके अनुभवकी भूमि असत्य होनेपर भी प्रतीतिगोचर हो रही है ।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—ज्ञानवानोंमें श्रेष्ठ गुरुदेव ! पूर्वोक्त प्रकारसे भलीभाँति विवेक-विचार करनेपर जब एकमात्र अद्वितीय परब्रह्म परमात्माके साथ अपनी एकता-का पूर्ण निश्चय हो जानेसे उत्कृष्ट एवं संशयरहित आत्म-विज्ञान प्रकाशित हो जाता है, तब तत्त्वज्ञानियोंके भी शरीर यहाँ किसलिये टिके रहते हैं ? यदि कहें वे दैवके ही अधीन होकर रहते हैं तो ठीक नहीं जान पड़ता, क्योंकि उन तत्त्वज्ञानियोंपर दैवका प्रभाव कैसे रह सकता है ।*
* श्रुति कहती है—'तस्य ह न देवाश्च नाभूत्या ईशते । आत्मा ह्येषां स भवति' अर्थात् तत्त्वज्ञानीके पराभवमें देवता भी समर्थ नहीं; क्योंकि वह उनका आत्मा ही हो जाता है । (बृहदारण्यक० १ । ४ । १० )
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! ब्रह्मा आदि तत्त्वज्ञानियोंने अज्ञानियोंके बोधके लिये यह बताया है कि जो ब्रह्म है, वही नियति है और वही यह सर्ग है। स्फटिक-शिलाके भीतर प्रतिबिम्बित चित्रसमूहकी भाँति परमात्मामें स्थित हुए ब्रह्माने नियति (जीवोंके अदृष्ट)-रूपी भावी सृष्टिको उसी तरह देखा है, जैसे सोया हुआ पुरुष अपनेमें स्वप्न-जगत्की कल्पनाके आधारभूत आकाशको देखता है। जैसे चेतन-स्वभाव होनेके कारण अङ्गी (देहधारी पुरुष) को शरीरमें अङ्ग आदि दिखायी देते हैं, उसी तरह 'कमलोद्भव' रूपसे प्रसिद्ध चिन्मय ब्रह्माको भी नियति आदि अङ्गोंके दर्शन होते हैं। यह नियति (प्रारब्ध) ही दैव नामसे कही गयी है, जो शुद्ध चेतन परमात्माकी शक्तिरूप है। यही भूत, भविष्यत् एवं वर्तमानकालमें सम्पूर्ण पदार्थोंको अपने अधीन करके जगत्की व्यवस्थारूपसे स्थित है। 'भविष्यमें अमुक पदार्थमें इस प्रकारकी स्फूर्ति होनी चाहिये, अमुकको मोक्षका पद प्राप्त होना चाहिये, इसके द्वारा इस प्रकार और उसके द्वारा इस प्रकार अवश्य होना चाहिये' ऐसा विचार दैव ही करता है। यह दैव या नियति ही सम्पूर्ण भूत आदि अथवा काल-क्रिया आदि जगत् है। इस नियति या प्रारब्धसे ही पुरुषार्थकी सत्ता लक्षित होती है और पुरुषार्थसे ही इस प्रारब्धकी सत्ता सूचित होती है। जबतक तीनों भुवन हैं, तबतक प्रारब्ध और पुरुषार्थ—ये दोनों सत्ताएँ परस्पर अभिन्न-रूपसे स्थित हैं। मनुष्यको अपने पौरुषसे ही दैव और