भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

१५४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


प्रकार चढ़ा, जैसे ध्रुव उच्चतम स्थानको आरूढ़ हुए हों।

ऊँचे चढ़े हुए उन योद्धाओंने सम्पूर्ण दिशाओंमें उसी प्रकार श्वेत वस्त्र हिलाया, जैसे रात्रि शुभ्र किरणोंसे सुशोभित पूर्ण चन्द्रमाको समस्त दिशाओंमें घुमाती है। वस्त्र हिलाकर उन्होंने यह सूचना दी कि 'अब युद्ध बंद करो।'

इसके बाद जैसे प्रलयके अन्तमें तत्कालीन एकार्णवसे जलका प्रवाह चारों दिशाओंमें निकलने लगता है, उसी प्रकार उस युद्धस्थलसे दोनों सेनाएँ बाहर जाने लगीं। सारी रणभूमि मुर्दोंके ढेरसे पट गयी थी। जहाँ-तहाँ खूनकी नदियाँ बह रही थीं और सब ओर घायल योद्धाओंके चीत्कार सुनायी पड़ते थे। वह रणभूमि मृत्युके उद्यानकी भाँति जान पड़ती थी। वहाँ मरकर गिरे हुए असंख्य घोड़ों, हाथियों, मनुष्यों, राजाओं, सारथि-सहित रथों और कटी हुई ऊँटोंकी गर्दनोंसे जो रक्तका प्रवाह सब ओर फैल रहा था, उससे एक सुन्दर नदी प्रवाहित हो चली थी। खूनसे भीगे हुए अस्त्र-शस्त्र ही वहाँ जलसे सींची हुई हरी-भरी लताओंके समान जान पड़ते थे। वह रणोद्यान प्रलयकालमें पर्वतोंसहित विध्वस्त


हुए सम्पूर्ण जगत्की भाँति दृष्टिगोचर हो रहा था।

(सूर्यास्तके पश्चात्) आकाश, पर्वत उसके निकुञ्ज और उसकी गुफाके भीतर फैलकर पिण्डके समान एकत्र हुए घने अन्धकारका समूह काले मेघोंकी घटाके समान वहाँ सब ओर छा गया था। चञ्चल भूतोंके वेगसे व्याकुल हुआ वह रणक्षेत्र प्रलयकालकी वायुसे कम्पित लोकों और उनके उपकरणोंसे युक्त ब्रह्माण्डके समान जान पड़ता था।

तदनन्तर जब सर्वत्र नीरवता छा गयी, अन्धकारका संचार हो गया, सम्पूर्ण दिशाओंके लोगोंकी आँखें निद्रासे बंद हो गयीं, उस समय उदारहृदय लीला-पति कुछ खिन्नचित्त-से होकर चन्द्रमाके मध्यभागके सदृश मनोहर तथा शीतल कमरोंवाले अपने सुन्दर महलमें पूर्ण चन्द्रमाके समान आकारवाली और बर्फके समान शीतल श्वेत शय्यापर अपने नेत्र-कमलोंको बंद करके सो गये और दो ही घड़ीमें उन्हें गहरी नींद आ गयी।

तत्पश्चात् वे दोनों ललनाएँ उस युद्धस्थलके आकाशको छोड़कर उस राजमहलमें खिड़कियोंके छेदोंसे उसी प्रकार घुस गयीं, जैसे वायुकी दो रेखाएँ इसी छोटे रन्ध्रमार्गसे

उत्पत्ति-प्रकरण ] * युद्धका उपसंहार, विदूरथके शयनागारमें लीला और सरस्वतीका प्रवेश * १४५


अधखिले कमलके भीतर प्रविष्ट हुई हों।

श्रीरामजीने पूछा—विद्वान् वक्ताओंमें श्रेष्ठ प्रभो ! यह इतना बड़ा स्थूलशरीर तन्तुके समान सूक्ष्म छेदकी राहसे किस प्रकार उस घरमें प्रविष्ट हुआ ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जिस पुरुषने पहले दीर्घकालसे यह अनुभव किया हो कि 'मै स्थूल शरीर नहीं हूँ, शुद्ध चिन्मय आत्मा हूँ, अतः सभी स्थानोंमें जा सकता हूँ' वह पीछे चलकर स्थूलदेहकी अवरोध आदि क्रियाओंसे कैसे युक्त हो सकता है ? क्योंकि वह उसी चेतनका अंश है, जो सर्वत्र जानेमें समर्थ है। जिसकी आकृति स्वप्नगत पुरुष या संकल्पकल्पित पुरुषके समान है, आकाशमात्र ही जिसका आकार है अर्थात् जो वास्तवमें स्थूल आकारसे रहित है, उसे कौन कैसे रोक सकता है। जीव जहाँ मरता है, उसी स्थानको शीघ्र देखता है और वहीं उसे अनेक भुवनोंसे युक्त यह विस्तृत प्रपञ्च इसी रूपमें स्थित-सा दिखायी देता है। आगन्तुक गेह आदिसे आत्मवान् हुआ-सा यह चेतन आकाशरूपी जीव देह आदिको ही आत्मा समझकर निर्मल चिन्मय आकाशमें ही 'यह मैं हूँ, यह जगत् है' इस आकाशरूप (शून्य) भ्रमका अनुभव करता है। इस जगद्रूपी भ्रममें देवताओं, अमरावती आदि श्रेष्ठ नगरों, मेरु आदि पर्वतों, सूर्य, चन्द्रमा और तारासमूहके कारण अपूर्व सौन्दर्य प्रतीत होता है। इस भ्रमरूपी वृक्षके खोखलेमें जरा, मृत्यु, व्याकुलता तथा नाना प्रकारकी आधि-व्याधियाँ ठूँस-ठूँसकर भरी हुई हैं। इसमें अपने अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति और अनिष्ट वस्तुके निवारणके लिये स्थूल-सूक्ष्म, चर-अचर सभी प्राणी उद्योगशील हैं तथा यह भ्रमरूपी प्रपञ्च समुद्र, पर्वत, नदी, उनके अधिपति, दिन, रात, कल्प, क्षण और प्रलय—इन सबसे युक्त है। इस प्रकार यद्यपि यह विश्व दीवालकी तरह स्थूल एवं स्थिर दिखायी देता है, तथापि मनन—मनके संकल्पके सिवा और कुछ नहीं है। मनन करनेपर यह चल (अस्थिर) ही सिद्ध होता है। तुम इस समय मनमें अपने अनुभवके अनुसार इसके स्वरूपपर विचार करो। जो ही चेतन आकाशरूप परमात्मा है, वही मननरूप कहा गया है और जो ही चेतन आकाशरूप परमात्मा है, वही परमपद है। चेतन आकाशस्वरूप परमात्माका अभूत (असत्य अथवा अनादि) मायाकाशमें या सूक्ष्म भूतोंके कार्यरूप चित्ताकाशमें जो स्फुरण है, वही नाम और रूपसे नाना भावको प्राप्त होनेवाला जगत् कहा जाता है। लीला और सरस्वती दोनों निष्पाप देवियों परमात्माके तुल्य विशुद्ध एवं चिदाकाशमय शरीरसे युक्त थीं; इसलिये वे सर्वत्र जा सकती थीं। उनके लिये कहीं भी प्रवेश करनेमें कोई बाधा नहीं थी। वे चिदाकाशमें जहाँ-जहाँ अपनेको प्रकट करनेकी इच्छा करती थीं, वहाँ-वहाँ सदा ही अपनी रुचि और अभिलाषाके अनुसार प्रकट हो जाती थीं। इसलिये राजा विदूरथके घरमें उन दोनोंका जाना सम्भव हुआ। चिन्मय आकाश सर्वत्र विद्यमान है, उसमें जिसे आतिवाहिक कहते हैं, वह चिदाकाशमय सूक्ष्मशरीर सर्वत्र विचरण कर सकता है; क्योंकि वह यथार्थ ज्ञानस्वरूप, धारणात्मक एवं मननरूप है। तुम्हीं बताओ, उस सूक्ष्मदेहको कौन, कैसे और किस लिये रोक सकता है !

(सर्ग ३७—४०)

१४६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

राजा पद्मके भवनमें सरस्वती और लीलाका प्रवेश और राजाद्वारा उनका पूजन, मन्त्रीद्वारा राजाका जन्मवृत्तान्त-वर्णन, राजा विदूरथ और सरस्वती देवीकी बातचीत, वसिष्ठजीद्वारा अज्ञानावस्थामें जगत् और स्वप्नकी सत्यताका वर्णन, सरस्वतीद्वारा विदूरथको वरप्रदान, नगरपर शत्रुका आक्रमण और नगरकी दुरवस्थाका कथन, भयभीत हुई राजमहिषीका राजाकी शरणमें आना, लीलाको दूसरे वररूप राजा पद्मकी प्राप्ति

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! उन दोनों देवियोंके प्रवेश करनेपर राजा पद्मके भवनका भीतरी भाग उज्ज्वल छटासे सुशोभित हो गया, मानो वहाँ दो चन्द्रमा उदय हो गये हों। उसमें मन्दार पुष्पका स्पर्श करके आयी हुई शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु चलने लगी। उन देवियोंके प्रभावसे राजाके अतिरिक्त अन्य स्त्री-पुरुष निद्राके वशीभूत हो गये, परंतु चन्द्रद्रवके समान शीतल उन दोनोंके शरीरके प्रभा-पुञ्जसे आह्लादित होकर राजा पद्मकी निद्रा भङ्ग हो गयी, मानो उसपर अमृत छिड़क दिया गया हो। उठते ही उसने दो दिव्य नारियोंको देखा, जो दो आसनोंपर विराजमान थीं। उन्हें देखकर ऐसा लगता था मानो मेरुपर्वतके दो शिखरोंपर दो चन्द्रमण्डल उदित हो गये हों। यह देखकर राजाका मन विस्मयाविष्ट हो गया, फिर क्षणभर मन-ही-मन विचार करके वह अपनी शय्यासे उठ पड़ा—ठीक उसी तरह, जैसे चक्र-गदाधारी भगवान् विष्णु शेषशय्यासे उठते हैं। तत्पश्चात् उसने सोते समय अस्त-व्यस्त हुए अपने माला, हार और अधोवस्त्रको यथास्थान ठीक किया। फिर सिरहाने रक्खी हुई फूलोंकी डलियामेंसे मालीकी तरह स्वयं ही अत्यन्त खिले हुए पुष्पोंसे अपनी अञ्जलि भर ली और भूमिपर ही पद्मासन लगाकर वह नम्रतापूर्वक देवियोंसे कहने लगा—'देवियो ! आप दोनों जन्म, दुःखमय जीवन और त्रिविध तापरूपी धोपका शमन करनेके लिये चाँदनीके समान तथा बाह्य और आन्तरिक अज्ञानान्धकारका विनाश करनेके लिये सूर्यकी प्रभाके तुल्य हैं। आपकी जय हो।' यों कहकर राजाने उन देवियोंके चरणोंपर पुष्पाञ्जलि समर्पित की। तदनन्तर देवी सरस्वतीने लीलासे राजाका जन्म-वृत्तान्त वर्णन करनेके लिये पार्श्वमें सो पड़े हुए मन्त्रीको अपने संकल्पसे जगाया। जागनेपर मन्त्रीने उन दोनो दिव्य नारियोंको देखकर उन्हें प्रणाम किया और उनके चरणोंमें पुष्पाञ्जलि समर्पित करके विनयपूर्वक वह उनके आगे खडा हो गया। तब देवीने राजासे पूछा—'राजन् ! तुम कौन हो ? किसके पुत्र हो ? और यहाँ कब पैदा हुए हो ?' ऐसा प्रश्न सुनकर मन्त्रीने उत्तर देना आरम्भ किया—

'देवियो ! यह आपलोगोका ही कृपा-प्रसाद है, जो मैं आपके समक्ष भी बोलनेमें समर्थ हो सका हूँ; अतः अब आप मेरे स्वामीका जन्म-वृत्तान्त सुनिये। प्राचीन काल-

उत्पत्ति-प्रकरण ] * राजा पद्मके भवनमें सरस्वती और लीलाका प्रवेश तथा राजाद्वारा उनका पूजन * १४७


में एक कुन्दरथ नामके राजा हो गये हैं, जो इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न हुए थे। वे परम शोभाशाली थे। उनके नेत्र कमलके समान सुन्दर थे। उन्होंने अपनी भुजाओंकी छायासे सारे भूमण्डलको आच्छादित कर लिया था। उन्हीं नरेशके भद्ररथ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसके मुखकी कान्ति चन्द्रमाके समान थी। उन भद्ररथके विश्वरथ, विश्वरथके बृहद्रथ, बृहद्रथके सिन्धुरथ, सिन्धुरथके शैलरथ, शैलरथके कामरथ, कामरथके महारथ, महारथके विष्णुरथ और विष्णुरथके पुत्र नमोरथ हुए। ये हमारे राजा उन्हीं महाराज नमोरथके पुत्र हैं। ये अपने पिताके महान् पुण्यपुञ्जोंके फलस्वरूप क्षीरसागरसे उत्पन्न हुए चन्द्रमाकी भाँति प्रकट हुए हैं। जैसे पार्वतीजीसे गुहकी उत्पत्ति हुई थी, उसी प्रकार ये अपनी माता सुमित्राके गर्भसे दूसरे स्कन्दकी भाँति पैदा हुए हैं। इनकी आकृति पूर्णचन्द्रमाके समान निर्मल है इन्होंने अपने अमृत-तुल्य गुणोंसे जनताको भलीभाँति तृप्त कर दिया है। ये विदूरथ नामसे विख्यात हैं। जब इनकी अवस्था दस ही वर्षकी थी, तभी इनके पिता इन्हें राज्यभार सौंपकर वनवासी हो गये थे। ये तभीसे इस भूमण्डलका धर्मपूर्वक पालन कर रहे हैं। आज पुण्यरूपी वृक्षके फलित होनेपर आप दोनों देवियोंका यहाँ शुभागमन हुआ है; क्योंकि दीर्घ तप आदि सैकड़ो क्लेश उठानेपर भी आपका दर्शन मिलना कठिन है। इस प्रकार विदूरथ नामसे प्रसिद्ध ये महीपाल आज आपके दर्शन-प्रदानरूप प्रसादसे परम पवित्र हो गये।'

यों कहकर जब मन्त्री चुप हो गया तथा भूपाल भूतलपर पद्मासन लगाकर हाथ जोड़े सिर नीचा किये बैठे रहे, उसी समय सरस्वती देवीने 'राजन् ! तुम विवेकद्वारा स्वयं ही अपने पूर्वजन्मका स्मरण करो' यों कहकर उनके मस्तकपर अपना हाथ फेरा। देवी सरस्वतीके करस्पर्शसे राजा पद्म (विदूरथ) का हृदयान्धकार एवं माया—सबके सब नष्ट हो गये। उनका हृदय अत्यन्त विकसित हो गया। उन्हें अपने पूर्वजन्मका वृत्तान्त इस प्रकार स्मरण हो आया, जैसे वह उनके अन्तःकरणमें स्फुरित होता हुआ-सा स्थित था। फिर लीलाके कर्तव्यके साथ-साथ शरीर और एकच्छत्र राज्यके त्याग, सरस्वतीके वृत्तान्त, लीलाकी विशेष उन्नति और आत्मकथाको जानकर राजा समुद्रमें गोते लगाते हुएकी तरह विस्मयमें पड़ गया। वह मन-ही-मन कहने लगा—'खेद है, सारे संसारमें यह माया ही व्याप्त है। इस समय इन देवियोंकी कृपासे मुझे इसका पूर्ण ज्ञान हुआ है।'

राजाने पूछा—देवियो ! मुझे जो अपने अनेक कार्योंका, परदादाका तथा अपनी बचपन एवं युवावस्थाका और मित्र तथा बन्धु-बान्धवोंका स्मरण हो रहा है, इसका क्या कारण है ?

श्रीसरस्वती देवीने कहा—राजन् ! मृत्युरूपी महामोहमयी मूर्च्छाके अनन्तर उसी मुहूर्त्तमें गिरिग्रामनिवासी उस ब्राह्मणके घरके भीतर आकाशमें ही स्थित गृहके मध्यभागमें जो मण्डप है, उसीके अन्दर तुम्हारा यह

१४८* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

जन्मादि दृश्य-प्रपञ्च आभासित हो रहा है। वहीं निर्मल आकाशकी भाँति स्वच्छ तुम्हारे चित्तमें यह विस्तृत व्यवहार-भ्रम स्फुरित हुआ है । 'यह मेरा जन्म हुआ । इक्ष्वाकुवंश ही मेरा कुल है । पूर्वकालमें मेरे ये पितामह आदि इस नामवाले हुए थे। मैं पैदा हुआ । जब मैं दस वर्षका बालक था, तभी मेरे पिता इस राज्यपर मेरा अभिषेक करके स्वयं परिव्राजक होकर वनको चले गये । तदनन्तर मैंने दिग्विजय करके अपने राज्यको निष्कण्टक बनाया । फिर इन मन्त्रियों तथा पुरवासियोंके साथ पृथ्वीका पालन करता रहा हूँ। यज्ञकर्मोंका अनुष्ठान तथा धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते मेरी आयुके सत्तर वर्ष व्यतीत हो चुके । इस समय इस शत्रु-सेनाने मुझपर आक्रमण किया और उसके साथ मेरा भयंकर युद्ध हुआ । युद्ध करके मैं अपने घर लौट आया हूँ और यहाँ पूर्ववत् स्थित हूँ । ये दोनों देवियाँ मेरे घर पधारी हैं और मैं इनका पूजन कर रहा हूँ; क्योंकि पूजित होनेपर देवता मनोऽभिलषित पदार्थ प्रदान करते हैं। जैसे सूर्यकी प्रभा मुकुलित कमलको विकसित कर देती है, उसी तरह इन दोनोंमेंसे इस एक देवीने मुझे यहाँ ऐसा ज्ञान प्रदान किया है, जो पूर्वजन्मकी स्मृतिको जगानेवाला है। अब मैं कृतकृत्य हो गया हूँ और मेरे सभी संशय नष्ट हो गये हैं। मैं शान्ति-लाभ करूँगा, परम निर्वाणको प्राप्त होऊँगा और केवल सुखरूप होकर स्थित होऊँगा'—इस प्रकार तुम्हारी यह भ्रान्ति, जो बहुसंख्यक संदेहोंसे युक्त, नाना प्रकारके आचार-विचारोंसे सम्पन्न और लोकान्तर-में गमन करनेवाली है, विस्तारको प्राप्त हुई है । पहले जिस मुहूर्तमें तुम मृत्युको प्राप्त हुए थे, उसी समय यह प्रतिभा अपने-आप तुम्हारे हृदयमें आविर्भूत हुई थी। जैसे नदीका प्रवाह उठे हुए एक आवर्तको त्यागकर तुरंत ही दूसरा धारण कर लेता है, उसी प्रकार चित्त-प्रवाह भी एक कल्पना-सृष्टिका त्याग करके दूसरी कल्पना-सृष्टि करता रहता है । जैसे आवर्त कभी दूसरे आवर्तसे संयुक्त होकर और कभी पृथक् ही प्रवृत्त होता है, उसी तरह यह सृष्टि भी कभी दूसरीसे सम्बन्धित और कभी स्वतन्त्र ही बढ़ती रहती है । उस मृत्युक्षणमें चिद्भानुस्वरूप तुम्हारी प्रतिभा में प्रतिभासित असत्-रूप यह जगज्जाल उसी तरह उपस्थित हुआ है, जैसे स्वप्नके एक ही मुहूर्तके अंदर सैकड़ों वर्षोंका भ्रम होता है । वास्तवमें तो न तुम कभी पैदा हुए हो और न कभी तुम्हारी मृत्यु ही हुई है । तुम तो शुद्ध विज्ञान-स्वरूप हो और अपने शान्त आत्मामें स्थित हो । यह सारा प्रपञ्च तुम्हें दृश्य-सा प्रतीत हो रहा है । वस्तुतः तुम कुछ नहीं देख रहे हो, बल्कि निर्मल महामणि तथा भासमान सूर्य आदिके समान तुम अपने आत्मामें अपने-आप नित्य सर्वात्मभावसे प्रदीप्त हो रहे हो । वस्तुतः न यह भूतल सत् है, न प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाला यह त्रिदृश्य-देह ही सत् है और न ये पर्वत, ग्राम, तुम्हारे शत्रु-मित्र तथा हमलोग ही सत् हैं।

राजन् ! जिन्हें ज्ञातव्य वस्तुओका ज्ञान हो चुका है तथा जो एकमात्र शुद्ध बोधस्वरूप हैं, ऐसे पुरुषोंके मनमें यह कोई भी सांसारिक पदार्थ सत् नहीं है । भला, जिसका आत्मा शुद्ध ज्ञानसे सम्पन्न है, उसे जगत्की भ्रान्ति' कहाँसे हो सकती है। जैसे रस्सीका ज्ञान हो जानेपर जब उसमें सर्पका भ्रम मिट जाता है, तब पुनः उसमें सर्पकी भ्रान्ति नहीं होती, उसी तरह जगत्-भ्रमके अद्भावका पूर्ण ज्ञान हो जानेपर फिर उसकी सत्ता कहाँसे टिक सकेगी। मृगमरीचिकाका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर पुनः उसमें जलबुद्धि कैसे हो सकती है । उसी तरह स्वप्नावस्थामें घटित हुआ अपना मरण जाग्रदवस्थामें अपने स्वरूपका ज्ञान हो जानेपर कैसे सत्य हो सकता है ? शरत्कालीन निर्मल आकाशकी शोभाके समान जिसका हृदय स्वच्छ, निर्मल और अत्यन्त विस्तृत है, उस शुद्ध तत्त्ववेत्ता पुरुषकी बुद्धिमें 'अहम्' और 'जगत्'-

उत्पत्ति-प्रकरण ] * राजा पद्मके भवनमें सरस्वती और लीलाका प्रवेश तथा राजाद्वारा उनका पूजन * १४९

की प्रतीति तुच्छ शब्दार्थकी द्योतक है। यह वास्तविक नहीं है, केवल वाचिक व्यवहारमात्र है।

महर्षिके यों कथा कहते-कहते दिन समाप्त हो गया। भगवान् भास्कर अस्ताचलकी ओर प्रस्थित हो गये और मुनि-मण्डली महर्षिको नमस्कार करके सायंकालिक विधि सम्पन्न करनेके लिये स्नानार्थ चली गयी। रात्रि बीतनेपर सूर्योदय होते-होते पुनः मुनिमण्डली एक साथ सभामें उपस्थित हुई।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! जिसकी बुद्धिमें ज्ञानका उदय नहीं हुआ है तथा जिसकी परमात्मतत्त्वमें दृढ़ स्थिति नहीं है, अतएव जो मोहग्रस्त है, उसके लिये यह जगत् असत् होते हुए भी सत्-सा प्रतीत होता है। जैसे मरुस्थलमें सूर्यका ताप ही मृगोंके लिये जलकी भ्रान्तिका कारण होता है, उसी तरह ही मृगोंके लिये जलकी भ्रान्तिका जगत् सत्य-सा भासित होता है। जैसे प्राणीकी स्वप्न-मृत्यु जो बिल्कुल असत्य है, फिर भी सत्य-सी प्रतीत होकर शोक-रुदन आदि कार्य करा देती है, उसी तरह जिनकी बुद्धि मोहाच्छन्न है, उन पुरुषोंके लिये यह जगत् शोकप्रद होता है। जो कटक-कुण्डल आदिमें व्याप्त सुवर्णके ज्ञानसे अनभिज्ञ है, उसको जैसे स्वर्ण-निर्मित कड़ेमें कड़ेका ही ज्ञान होता है, उसमें उसकी थोड़ी भी स्वर्णबुद्धि नहीं होती, उसी प्रकार अज्ञानीकी यह नगर, गृह, पर्वत, गजराज आदिसे प्रकाशित होनेवाली दृश्य-दृष्टि ही है, दूसरी—परमार्थ-दृष्टि नहीं है।

श्रीरामजीने पूछा—मुने ! यदि केवल मायास्वरूप स्वप्नमें कल्पित स्वप्नपुरुष सत्य न भी हों तो क्या दोष होगा ? यह बतलाइये।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघव ! स्वप्नमें देखे गये नगरनिवासी वस्तुतः सत्य नहीं हैं—इस विषयमें मैं तुम्हें प्रत्यक्ष प्रमाण बतलाता हूँ, सुनो; अन्य प्रमाणोंके जाननेकी आवश्यकता नहीं है। सृष्टिके आदिमें स्वयम्भू ब्रह्मा स्वयं ही स्वप्न-तुल्य अनुभवसे सम्पन्न दिखायी देते हैं, अतः उनके सङ्कल्पसे उत्पन्न हुआ यह विश्व भी स्वप्न-सदृश ही है। इस प्रकार यह विश्व भी स्वप्न है। उसमें जैसे मेरी दृष्टिमें तुम सत्य हो, उसी तरह अन्य लोग भी तुम्हारी और मेरी दृष्टिसे सत्य हैं एवं अन्य मनुष्योंकी भी अपने-अपने अनुभवके अनुसार स्वप्नके विषयमें सत्यता सिद्ध है। यदि ये नगरनिवासी स्वप्नमें सत्य न हों तो इस स्वप्नाकार जाग्रदवस्थामें भी वे मेरे लिये थोड़ा भी सत्य न सिद्ध होंगे। इसलिये तुम्हारी दृष्टिमें जैसे मैं सत्यात्मा हूँ, उसी तरह मेरी दृष्टिमें सब सत्य हैं; क्योंकि स्वप्न-तुल्य संसारमें पदार्थोंकी परस्पर सिद्धिके लिये ऐसी नीति है। इस महान् स्वप्नरूपी संसारमें जैसे तुम्हारी दृष्टिमें मैं सत्य हूँ और मेरी दृष्टिमें तुम सत्य हो, उसी तरह सभी सत्य हैं—यही सारे स्वप्नोंमें न्याय है। इस प्रकार यह सब स्वप्न और जाग्रद्रूप प्रपञ्च वास्तवमें सत्य नहीं हैं, परंतु सत्य-सा प्रतीत होता है और स्वप्न-स्त्री-प्रसङ्गकी भाँति मिथ्या ही जीवोंको मोहित करता है। सभी वस्तुएँ देहके बाहर तथा भीतर सर्वत्र विद्यमान हैं। ज्ञानवृत्ति जिसे जैसा जानती है, उसे उसी तरह स्वयं ही देखती है। जैसे कोशमें जो धन मौजूद रहता है, उसे उसका द्रष्टा प्राप्त करता है, उसी तरह चेतनाकाशरूप परमात्मामें सब कुछ स्थित है और वही परमात्मा उसका अनुभव करता है। अस्तु,

तदनन्तर देवी सरस्वतीने विदूरथको ज्ञानामृतके सिञ्चनसे विवेकरूपी सुन्दर अङ्कुरसे संयुक्त करके उनसे इस प्रकार कहा—'राजन् ! यह पूर्वोक्त तत्त्वज्ञान मैंने लीलाकी प्रसन्नताके लिये तुमसे वर्णन किया है। लीलाने भी जगन्मिथ्यात्वकी दृष्टान्तभूत तुम्हारी दृष्टियाँ देख ली हैं; अतः तुम्हारा कल्याण हो, अब हम दोनों जाना चाहती हैं।'

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! मधुर अक्षरोंसे

१५० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

युक्त वाणीद्वारा सरस्वतीके यों कहनेपर बुद्धिमान् राजा विदूरथने इस प्रकार कहा।

विदूरथ बोले—देवि! मुझ साधारण मनुष्यका भी यदि किसी याचकको दर्शन हो जाय तो वह निष्फल नहीं जाता; फिर आप तो महान् फल प्रदान करनेवाली हैं, आपका दर्शन व्यर्थ कैसे हो सकता है। देवि! जैसे स्वप्न देखता हुआ मनुष्य उस स्वप्नको छोड़कर दूसरा स्वप्न देखने लगता है, उसी तरह मैं अपनी इस देहका परित्याग करके यहाँ दूसरे लोकको जाऊँगा। माता! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप मुझ शरणागतको करुणापूर्ण दृष्टिसे देखिये और शीघ्र ही मेरी प्रार्थित वस्तु प्रदान कीजिये। मा! मुझपर ऐसी कृपा कीजिये कि मैं जिस लोकमें जाऊँ, वही लोक मेरे इस मन्त्री और इस कुमारी कन्याको भी प्राप्त हो।

श्रीसरस्वतीजीने कहा—पूर्वजन्मके चक्रवर्ती सम्राट्! तुम्हें विदित होना चाहिये कि हमलोगोंने कभी भी याचकोंकी कामनाका निराकरण कर दिया हो—ऐसा नहीं देखा गया। अतः आओ और लीलाकी भक्ति और भाग्यके अनुरूप पदार्थोंकी समृद्धिसे सुन्दर इस राज्यका निर्भय होकर उपभोग करो।

राजन्! इस समय इस भीषण संग्राममें तुम्हारी मृत्यु निश्चित है और तुम्हे तुम्हारा प्राचीन राज्य प्राप्त होगा। यह सब प्रत्यक्ष तुम्हारी आँखोंके सामने ही होगा। कुमारी कन्याको, मन्त्रीको और तुमको शवरूप शरीर प्राप्त करके उस प्राचीन नगरमें आना होगा। अब हम दोनों जैसे आयी थीं, वैसे ही लौट जा रही हैं; परंतु कुमारी कन्याको, मन्त्रीको और तुम्हें मृत्युको प्राप्त होकर वायुरूपसे अर्थात् सूक्ष्मदेहसे उस प्रदेशमे आना चाहिये।

देवी सरस्वती और राजा दोनों मधुरभाषी थे। उनमें परस्पर वार्तालाप हो ही रहा था, तबतक राजमहलके ऊर्ध्वभागमें बैठकर नगरकी देखभाल करनेवाला मनुष्य भयभीत हो राजाके पास आकर कहने लगा—'देव! ज्वार-भाटासे संयुक्त महासागरकी भाँति बाण, चक्र, खड्ग, गदा और परिघकी वर्षा करनेवाली एक विशाल शत्रु-सेना आ पहुँची है। वह अत्यन्त उत्साहसे सम्पन्न है और प्रलयकालकी वायुसे उड़ाये गये कुल-पर्वतोंकी शिलाओंके समान भयंकर गदा, शक्ति और भुशुण्डियोंकी वर्षा कर रही है। साथ ही इस पर्वताकार नगरमें आग लग गयी है, जिसने चारों दिशाओको व्याप्त कर लिया है। वह चट-चट शब्दके साथ इस उत्तम नगरीको जलाती हुई नष्ट-भ्रष्ट कर रही है।'

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलभूषण राम! वह पुरुष सभीत होकर राजासे यों कह ही रहा था, तबतक बाहर कठोर शब्दोंसे युक्त महान् कोलाहल होने लगा जो अपने भीषण शब्दसे सारी दिशाओंमें व्याप्त हो रहा था। वह कोलाहल बलपूर्वक कानतक खींचकर बाणोंकी वर्षा करनेवाले धनुषोंकी टंकारसे तथा जिनकी स्त्री और बच्चे जल गये थे, उन पुरवासियोंके महान् हाहाकारसे, जलती हुई लपटोंके परिस्पन्दनसे उत्पन्न चट-चट एवं टूटकर गिरते हुए अङ्गारोंके शब्दसे व्याप्त था। तब सरस्वती और लीला—दोनो देवियोंने एवं मन्त्री और राजा विदूरथने उस घोर रात्रिके समय राजमहलके झरोखेसे झाँककर उस विशाल नगरकी ओर दृष्टिपात किया, जो तुमुल नादसे गूँज रहा था। उस समय वह नगर प्रलयाग्निसे विक्षुब्ध हुए महासागरके सदृश वेगवाले तथा भयंकर अस्त्ररूपी तरङ्गोंसे व्याप्त शत्रु-सैन्यसे खचाखच भरा था और प्रलयकालीन अग्निकी ज्वालासे पिघलते हुए मेरुपर्वतके सदृश कान्तिमान् एवं गगनचुम्बी महान् ज्वाला-समूहोंसे भस्म हो रहा था। उस नगरको लूटते समय लुटेरे दूसरोंको डराने-धमकानेके लिये महान् मेघकी गर्जनाके समान डाँट बता रहे

उत्पत्ति-प्रकरण ] * राजा पद्मके भवनमें सरस्वती और लीलाका प्रवेश तथा राजाद्वारा उनका पूजन * १५१


थे। उनके उस भीषण कोलाहलसे वह नगर भयानक लग रहा था। तदनन्तर राजा विदूरथने अपने योद्धाओ-का तथा उन लोगोंका, जिनका देखते-देखते ही स्त्री-पुत्र आदि सर्वस्व स्वाहा हो गया था, इसलिये वे इधर-उधर दौड़ लगा रहे थे, करुण-क्रन्दन सुना। अहो ! यह तो सदाचारसे हीन महान् अनुचित कार्य हो रहा है, जो शस्त्रधारी शत्रुसैनिक राजरानियोंको भी पकड़ रहे हैं।

इसी बीचमें जैसे लक्ष्मी कमलकोशमें प्रविष्ट होती है, उसी तरह राजमहिषीने, जो यौवनके मदसे उन्मत्त हो रही थी, राजा आदिद्वारा अधिष्ठित उस गृहमें प्रवेश किया। उस समय वह हारके छिन्न-भिन्न हो जानेसे व्याकुल एवं भयसे घबरायी हुई थी। उसके पुष्पहार और वस्त्र जोर-जोरसे हिल रहे थे तथा सखियाँ और दासियाँ उसके पीछे-पीछे चल रही थीं, वहाँ पहुँचकर जैसे कोई अप्सरा संग्राममें संलग्न हुए देवराज इन्द्रसे निवेदन करे, उसी तरह उसकी एक सखी राजा विदूरथसे निवेदन करने लगी—'देव ! महारानी हम-लोगोंके साथ अन्तःपुरसे भागकर आपकी शरणमें आयी हैं—ठीक उसी तरह, जैसे झंझावातसे पीडित लता वृक्षका आश्रय ग्रहण करती है। राजन् ! जैसे महासागरकी लहरियाँ तटवर्ती वृक्षोंपर लिपटी हुई लताओंको अपने साथ समेट ले जाती हैं, उसी तरह अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित उन बलवान् शत्रुओंने आपकी अन्यान्य रानियोंका अपहरण कर लिया है। अचानक आ धमके हुए उन उद्दण्ड शत्रुओंने आँधीद्वारा नष्ट-भ्रष्ट किये गये बड़े-बड़े वृक्षोंकी भाँति अन्तःपुरके सभी संरक्षकोंको चकनाचूर कर दिया है। इस प्रकार हमलोगोंको जो यह विविध प्रकारकी विपत्तिने आ घेरा है, उसका सर्वथा निवारण करनेके लिये आपकी ही सामर्थ्य है।' यह सुनकर राजाने दोनो देवियोंकी ओर देखकर कहा—

'देवियो ! मै युद्धके लिये जाता हूँ, अब आप मुझे क्षमा करें ! अब मेरी यह भार्या आपलोगोंके चरणकमलों-की भ्रमरी बनेगी अर्थात् आपके चरणोंकी सेवा करेगी।'

१५२ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

यों कहकर राजा विदूरथ, जिसके नेत्र क्रोधवश लाल हो गये थे, उसी प्रकार राजभवनसे बाहर निकला, जैसे मदमत्त गजराजद्वारा वनके छिन्न-भिन्न कर दिये जानेपर सिंह अपनी गुहासे बाहर निकला हो। तदनन्तर प्रबुद्ध लीलाने अपनी ही रूप-रेखाके तुल्य आकृतिवाली सुन्दरी लीलाको दर्पणमें प्रतिबिम्बित हुई-सी देखा और कहा।

प्रबुद्ध लीलाने पूछा—देवि ! किस कारणसे मैं यह हो गयी ? पहले मैं जो थी, वही मैं इस रूपमें कैसे स्थित हूँ ? इसका क्या रहस्य है ? यह मुझे बतलानेकी कृपा कीजिये। ये सभी मन्त्री आदि पुरवासी तथा सेना और सवारियोंसहित शूरवीर पूर्ववत् ही हैं। ये जैसे यहाँ स्थित हैं, वैसे ही वहाँ भी हैं। देवि ! जैसे दर्पणमें प्रतिबिम्बित वस्तु बाहर और भीतर दोनों ओर दीखती है, उसी तरह ये सभी यहाँ और वहाँ स्थित हैं—इसका क्या कारण है ? क्या वे सचेतन हैं ?

श्रीदेवीजीने कहा—लीले ! भीतर जैसा ज्ञान उद्भूत होता है, वैसा ही बाहर क्षणमात्रमें अनुभव होने लगता है। जैसे मन चित्तार्थता—स्वप्न आदिमें चित्तद्वारा अनुभूत जाग्रत्‌की स्वरूपताको प्राप्त हो जाता है, उसी तरह चेतन दृश्याकारताको प्राप्त हो जाता है। हृदयके अंदर उद्भूत पदार्थ बाह्य-से प्रतीत होते हैं। इस विषयमें स्वप्नदृष्ट पदार्थ ही प्रमाण हैं; क्योंकि हृदयके भीतर जो स्वप्नमें संकल्प-नगरका स्फुरण होता है, वह चेतनका विकास है। इस राजाके जिन मन्त्री आदिका जो अविरोध तथा सर्वार्थरूपसे अनुभव हो रहा है, इसका कारण यह है कि वे स्वप्नमें संकल्पित सैन्यकी भाँति चेतन सत्तात्मक होनेसे सद्रूप ही हैं। अथवा यदि यों कहें कि उत्तरकाल अर्थात् जाग्रदवस्थामें स्वप्नके विनाशी होनेके कारण वह असत् है तो ऐसा तो यह सारा जाग्रत्-जगत् ही है; क्योंकि स्वप्नमें जाग्रत् असत् है और जाग्रत्-कालमें स्वप्न असत् है। फिर जाग्रत्में कौन-सी विशेष सत्यता सिद्ध हुई ? अनघे !

इस प्रकार यह स्वप्न और जाग्रत्-जगत् न सत् है और न असत् ही। ये केवल भ्रान्तिरूपसे ही प्रतीत होते हैं; क्योंकि महाकल्पके अन्तमें, आज और अगले युगमें अर्थात् भूत, भविष्य और वर्तमान आदि तीनों कालोंमें भी जो कभी उस स्वरूपसे नहीं था, वही ब्रह्म है, अतः वही जगत् है। उस ब्रह्मस्वरूप जगत्‌में ये सृष्टि नामवाली भ्रान्तियाँ विकसित होती हैं। पर वास्तवमें विकसित-सी नहीं दीखतीं; क्योंकि जैसे महासागरमें लहरें उठती हैं, उसी प्रकार ये सृष्टियाँ परब्रह्ममें उत्पन्न हो-होकर पुनः आँधीमें घुले-मिले हुए धूलिकणोंकी भाँति उसी परब्रह्ममें विलीन हो जाती हैं। इसलिये जिसमें 'त्वम्' और 'अहम्' आदिका विभाग मिथ्या ही है तथा जो मृगतृष्णाके जलसमूहकी भाँति भ्रान्तिमय आभासित हो रहा है, उस जले हुए वस्त्रके भस्मके समान प्रपञ्चमें कौन-सी आस्था है ? इस सारे प्रपञ्चके शान्त होनेपर जो अवशिष्ट रहता है, वही ब्रह्म है। उस ब्रह्मसे पृथक् होनेपर यह दृश्य जगत् कभी भी सत्य नहीं है और ब्रह्मस्वरूप होनेके कारण असत्य भी नहीं है। तत्पश्चात् उसी तरहका अनुभव होनेके कारण यह स्पष्टरूपसे जीवभावको प्राप्त होता है। यह जगत् सत्य हो या असत्य, पर यह चिदाकाशमें विभासित हो रहा है।

(श्रीसरस्वतीजीने पुनः कहा)—जैसे राजारूप चिदाकाशमें सन्मयी प्रतिभा उदित होती है, उसी तरह उससे पूर्व होनेवाली सत्यसङ्कल्परूपा प्रतिभा अव्याकृत आकाशरूप ईश्वरमें उत्पन्न होती है। इसी तरह प्रतिभा-के प्रतिबिम्बसे उत्पन्न हुई यह लीला तुम्हारे-सरीखे शील, आचार, कुल और शरीरसे युक्त दीख रही है। सर्व-व्यापक ज्ञानवृत्तिरूपी दर्पणमें जैसी प्रतिभा प्रतिबिम्बित होती है, वह जहाँ जिस रूपमें उत्पन्न होती है, वहाँ निरन्तर उसी रूपमें प्रकट होती है। अन्तर्यामी ईश्वरकी जो प्रतिभा भीतर वर्तमान है, वही स्वयं बाहर भी कार्य

उत्पत्ति-प्रकरण ] * राजा पद्मके भवनमें सरस्वती और लीलाका प्रवेश तथा राजाद्वारा उनका पूजन * १५३

करती है, इसलिये चिन्मय दर्पणमें प्रतिबिम्बित होनेके कारण यह तुम्हारे ही समान स्थित है । लीले ! इस निश्चयमें तुम ऐसा समझो कि यह आकाश, उसके भीतर भुवन, उसके अन्तर्गत पृथ्वी, उसपर यह तुम, मैं और राजा—यों जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह सब-का-सब ब्रह्मरूपसे मैं ही हूँ, इस कारण तुम स्वरूपमें स्थित होकर पूर्णरूपसे शान्त हो जाओ । तुम्हारा पति यह विदूरथ रणाङ्गणमें शरीरका त्याग करके उसी अन्तःपुरमें पहुँचकर राजा पद्मके रूपमें उत्पन्न होगा ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं— रघुनन्दन ! देवीकी बात सुनकर उस नगरमें रहनेवाली लीला हाथ जोडकर देवीके आगे खड़ी हो गयी और भक्तिविनम्र होकर बोली ।

द्वितीय लीलाने कहा— देवेशि ! मैंने नित्य ही भगवती सरस्वती देवीकी अर्चा-पूजा की है और वे देवी रात्रिके समय स्वप्नमें मुझे दर्शन दिया करती हैं । अम्बिके ! उन देवीका जैसा आकार-प्रकार है, वैसी ही आप भी हैं । सुमुखि ! आप दीनोंपर करुणा करनेवाली हैं, अतः मुझे वर प्रदान कीजिये ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं— श्रीराम ! लीलाके ऐसा कहनेपर भगवती सरस्वती उस समय उसके भक्तिपूर्वक किये गये ध्यान-पूजनका स्मरण करके प्रसन्न हो गयीं और उस नगरनिवासिनी लीलासे यों बोलीं ।

श्रीदेवीजीने कहा— वत्से ! जीवनपर्यन्त की गयी तुम्हारी अनन्यभक्तिसे, जो कभी भी शिथिल नहीं हुई, मैं परम संतुष्ट हूँ; अतः तुम मुझसे अपना मनोऽभिलषित वरदान ग्रहण करो ।

तब वह नगरनिवासिनी लीला बोली— देवि ! मेरे पतिदेव रणभूमिमें शरीरका परित्याग करके जहाँ स्थित होंगे, मैं भी इसी शरीरसे वहाँ उनकी पत्नी होऊँ ।

श्रीदेवीजीने कहा— पुत्रि ! तुमने चिरकालतक अनन्य-भक्तिभावसे पुष्प-धूप आदि प्रचुर पूजन-सामग्रीद्वारा मेरी निर्विघ्न पूजा की है, इसलिये 'एवमस्तु'—तुम्हारी कामना पूर्ण हो ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं— राघव ! तदनन्तर जब उस वर-प्राप्तिसे तद्देशवासिनी लीला हर्षोत्फुल्ल हो रही थी, उसी समय पूर्व लीलाने, जिसका हृदय सन्देहके दोलेमें झूल रहा था, देवीसे कहा ।

पूर्व लीला बोली— ऐश्वर्यशालिनी देवि ! जो आपके सदृश सत्य कामना एवं सत्य संकल्पवाले हैं, अतएव जो ब्रह्मस्वरूप हो गये हैं, उनका सारा मनोरथ जब शीघ्र ही सिद्ध हो जाता है, तब यह बतलाइये कि आपने मुझे किसलिये इसी शरीरसे गिरिग्रामक नामवाले उस लोकान्तरमें नहीं पहुँचाया ?

श्रीदेवीजीने कहा— सुन्दरि ! मैं किसीका कुछ नहीं करती, बल्कि जीव स्वयं ही अपनी समस्त अभिलाषाओंका शीघ्र ही सम्पादन कर लेता है; क्योंकि प्रत्येक जीवमें जीवशक्तिस्वरूपा चेतनशक्ति वर्तमान है । इसलिये जिस-जिस जीवकी जो शक्ति जिस-जिस रूपमें प्रकट होती है, वह उसी-उसी रूपमें उस-उस जीवको सदा तदनुरूप फल प्रदान करती हुई-सी प्रतीत होती है । जिस समय

१५४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

तुम मेरी सम्यक् प्रकारसे आराधना कर रही थी, उस समय चिरकालतक तुम्हारे मनमें जो जीव-शक्ति उत्पन्न हुई थी, उसकी कामना थी कि यदि इसी जन्ममें मैं मुक्त हो जाती तो अच्छा होता । अतः उत्तम रूप-रंगवाली लीले ! उसी-उसी प्रकारसे मैंने तुम्हें भलीभाँति समझाया है और उसी युक्तिद्वारा तुम इस निर्मल भावको प्राप्त हुई हो। जब चिरकालतक मैंने तुम्हें इसी भावनासे ज्ञानोपदेश किया है, तभी तुम अपनी चेतनशक्तिके प्रभावसे सदाके लिये उसी अर्थको प्राप्त हुई हो; क्योंकि जिस जिसका चिरकालतक जैसा अपनी चेतनशक्तिका प्रयत्न होता है, वह समयानुसार उस-उसको वैसा ही फल प्रदान करता है। अपनी चेतनशक्ति ही तपस्या अथवा देवताका रूप धारण करके स्वच्छन्दरूपसे आकाशसे फल गिरनेकी भाँति फल देती है। अपनी ज्ञानशक्ति प्रयत्नके बिना कभी कुछ भी फल नहीं देती; इस कारण तुम्हारी जैसी अभिलाषा हो, शीघ्र ही तदनुरूप कार्य आरम्भ कर दो। तुम ऐसी धारणा कर लो कि चित्सत्ता ही सबमें अन्तरङ्गरूपसे व्याप्त है। वही विहित अथवा निषिद्ध जिस कर्मका विचार करती है और उसके लिये प्रयत्न करने लग जाती है, उसीकी फलश्री प्राप्त होती है। इसलिये जो पावन पद है, उसे जानकर तुम उसीमें स्थित हो जाओ।

(सर्ग ४१-४५)


राजा विदूरथका विशाल सेनाके साथ युद्धके लिये प्रयाण, युद्धारम्भ, लीलाके पूछनेपर सरस्वतीद्वारा राजा सिन्धुके विजयी होनेमें हेतु-कथन, विदूरथ और राजा सिन्धुके दिव्यास्त्रोंद्वारा किये गये युद्धका सविस्तर वर्णन, राजा विदूरथकी पराजय और देशपर राजा सिन्धुके अधिकारका कथन

श्रीरामजीने पूछा—मुने ! जब वे तीनों देवियाँ उस राजमहलके भीतर यों परस्पर वार्तालाप कर रही थीं, उस समय विदूरथने क्रोधावेशमें महलसे निकलकर क्या किया ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—वत्स राम ! जिस समय राजा विदूरथ अपने भवनसे बाहर निकला, उस समय वह नक्षत्रसमूहसे घिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति विशाल सैन्यदलसे परिवेष्टित था । उसका सारा शरीर कवच आदिसे सुरक्षित था । हार आदि आभूषण उसके शरीरकी शोभा बढ़ा रहे थे । वह जय-जयकारकी तुमुल ध्वनिके साथ देवराज इन्द्रके समान बाहर निकला । उस समय वह योद्धाओंको आदेश दे रहा था । मन्त्री व्यूह-रचना एवं जनपद-व्यवस्था-सम्बन्धी व्यवस्था उसे सुना रहे थे । वह वीरगणोंका निरीक्षण करता हुआ एक ऐसे रथपर आरूढ़ हुआ, जिसमें आठ घोड़े जुते थे । उत्तम जातिवाले उन अश्वोंकी गर्दन बड़ी सुहावनी थी । वे शुभलक्षणोंसे युक्त, फुर्तीले और एकहरे बदनके थे तथा अपनी हिनहिनाहटसे सारी दिशाओंको निनादित कर रहे थे । उस समय जिन्हें सरस्वती देवीने दिव्यदृष्टि प्रदान की थी, वे दोनों लीला नामवाली देवियाँ और वह राजकुमारी उस महायुद्धको देख रही थीं । उसे देखकर उनका हृदय विदीर्ण-सा हो रहा था । राजा विदूरथकी युद्ध-यात्राके पश्चात् शत्रु-सैनिकोंके बाणों एवं आयुधोंसे निकलता हुआ कट्कट् शब्द पूर्णरूपसे शान्त हो गया—ठीक उसी तरह, जैसे एकार्णवके जलप्रवाहोंसे वडवानल शान्त हो जाता है । उस समय राजा विदूरथ अपनी सेनाको धीरे-धीरे आगे बढ़ा रहे थे। उन्हें अपने तथा शत्रुपक्षके बलाबलका ज्ञान नहीं हो पाया था—इसी दशामें उन्होंने शत्रु-सेनामें प्रवेश किया ।

जिस समय समरभूमिमें दोनों सेनाओंकी भीषण मुठभेड़ हो रही थी, उसी समय दोनों लीलाओंने भगवती सरस्वतीसे पुनः प्रश्न किया ।

दोनों लीलाओंने पूछा—देवि ! यह बतलाइये कि आपके संतुष्ट होनेपर भी मेरे पतिदेव इस युद्धमें, जिसमेंसे

उत्पत्ति-प्रकरण] * राजा विदूरथका सेनाके साथ युद्धके लिये प्रयाण, युद्धारम्भ तथा विदूरथकी पराजय ~ १५५


गजराज भागे जा रहे हैं, अकस्मात् विजय क्यों नहीं प्राप्त कर रहे हैं ?

श्रीसरस्वतीजीने कहा—पुत्रि ! राजा विदूरथके शत्रु इस राजा सिन्धुने विजय-प्राप्तिकी कामनासे चिरकालतक मेरी आराधना की थी, परंतु भूपाल विदूरथकी आराधना विजयार्थ नहीं थी; इसलिये यह राजा सिन्धु ही विजयी होगा और विदूरथ पराजित हो जायगा । क्योंकि समस्त प्राणियोंके हृदयान्तर्गत ज्ञानवृत्तिरूपसे मै ही स्थित हूँ, अत. जो मुझको जिस समय जिस रूपसे प्रेरित करता है, मै शीघ्र ही उसके लिये उस समय वैसे ही फलका सम्पादन करती हूँ । बाले ! इस राजा विदूरथने 'मैं मुक्त हो जाऊँ' इसी भावनासे मुझ प्रतिभारूपिणीका ध्यान किया था, इस कारण यह मुक्त हो जायगा । और इसके शत्रु राजा सिन्धुने 'मैं स्वयं संग्राममें विजयी होऊँ' इस कामनासे मेरी पूजा की थी; इसलिये बाले ! विदूरथ भार्यारूपिणी तुम्हारे और इस लीलाके साथ समयानुसार उस शवस्वरूप देहको प्राप्त होकर मुक्त हो जायगा तथा इसका शत्रु राजा सिन्धु स्वयं उसे मारकर विजयश्रीसे सुशोभित हो भूतलपर राज्य करेगा ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! देवी सरस्वती यों कह ही रही थीं, तबतक भगवान् सूर्य उदयाचलपर आ पहुँचे, मानो वे जूझती हुई दोनो सेनाओंका आश्चर्यमय युद्ध देखना चाहते थे । उस समय जैसे द्युलोकमें आकाशके चिह्नभूत सूर्य और चन्द्रमा दिखायी देते हैं, उसी तरह जनसंहार हो जानेके कारण उस शून्य संग्रामभूमिमें राजा पद्म (विदूरथ) और राजा सिन्धुके प्रकाशमान रथ चलते हुए दीख रहे थे । उन दोनो रथोंमें चक्र, शूल, मुशुण्डी, ऋष्टि और प्रास आदि आयुध खचाखच भरे थे । उन रथोंके पीछे बहुसंख्यक शूरवीर योद्धा, जिनके सैनिक भयभीत हो गये थे, रणभूमिमें भालो, बाणो, धनुषो, शक्तियों, प्रासो, शङ्खओ और चमकते हुए चक्रोंकी भयंकर वृष्टि करते हुए चल रहे थे । इतनेमें ही प्रलयकालीन वायुद्वारा गिराये गये शिलाखण्डोकी तरह दोनों सेनाओंपर बाण गिरने लगे । उस समय राजा विदूरथ और राजा सिन्धुकी परस्पर ऐसी भयंकर मुठभेड़ हुई जिसे देखकर लोगोंको ऐसी आशङ्का होने लगी मानो प्रलयके लिये विशेषरूपसे बढ़े हुए दो महासागर परस्पर टकरा रहे हों ।

राजा विदूरथ अपने विपक्षी राजा सिन्धुको, जिसके कंधे ऊँचे थे, सामने उपस्थित पाकर मध्याह्नालिक सूर्यके दुस्सह आतपकी भाँति प्रचण्ड कोपसे भर गया । फिर तो उसने अपने धनुषको, जिसकी टंकारध्वनि चिरकालके लिये सारी दिशाओको निनादित कर देती थी, कानतक खींचा । उस समय ऐसा भयंकर शब्द हुआ, जैसे कल्पान्त-कालमें उठी हुई वायु मेरुगिरिके तटप्रान्तसे टकरा रही हो । राजा विदूरथका हस्तलाघव सराहनीय था; क्योंकि लोग देखते थे कि उसकी प्रत्यञ्चासे एक ही बाण छूटता है, परंतु वह आकाशमें पहुँचते-पहुँचते हजार हो जाता है और विपक्षियोंपर एक लाख होकर गिरता है । राजा सिन्धुकी भी शक्ति और फुर्ती विदूरथके ही समान थी । उन दोनोंको ऐसी धनुर्युद्ध-कुशलता वरदायक भगवान् विष्णुके वरप्रसादसे उपलब्ध हुई थी । तदनन्तर उन दोनोंके छोड़े हुए मुसल नामक बाणोसे, जिनकी आकृति मूसलकी-सी थी, आकाश आच्छादित हो गया । उन बाणोसे प्रलयकालीन वज्रोंकी गड़गड़ाहटके समान भीषण शब्द हो रहा था । युद्धस्थलमें राजा विदूरथके बाणसमूह वेगपूर्वक घरघर शब्द करते हुए राजा सिन्धुके सम्मुख उसी प्रकार बढ़ रहे थे, मानो आकाश-मार्गसे गिरते हुए गङ्गाके प्रवाह कलकलनाद करते हुए महासागरकी ओर जा रहे हो । परंतु राजा सिन्धुरूपी बड़वानलने अपने अगस्त्य-तुल्य बाणोकी ऊष्मासे विदूरथके उस बाण-महासागरको पी लिया—ठीक उसी तरह, जैसे महर्षि जहु गङ्गाजीको पी गये थे । तदनन्तर राजा सिन्धुने बाणोंकी उस वृष्टिको छिन्न-भिन्न करके स्वयं बाणोकी इतनी झड़ी लगायी कि आकाशमें सायकोका ही मेघमण्डल

१५६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


घिर आया। तब विदूरथने भी जैसे प्रलयकालीन वायु उमड़े हुए साधारण मेघको उड़ा देती है, उसी तरह अपने उत्तम सायकोंसे शीघ्र ही उस बाणरूपी मेघमण्डलको विध्वंस कर डाला। इस प्रकार वे दोनों भूपाल परस्पर बदला लेनेकी भावनासे एक-दूसरेको लक्ष्य बनाकर बाणोंकी वर्षा करते थे और एक-दूसरेके प्रहारको व्यर्थ कर देते थे।

तदनन्तर राजा सिन्धुने मोहनास्त्रका संधान किया। यह अस्त्र उसे किसी गन्धर्वके साथ मित्रता होनेके कारण प्राप्त हुआ था। उस मोहनास्त्रके प्रयोगसे विदूरथके अतिरिक्त शेष सभी सैनिक मूर्च्छित हो गये। उनके शस्त्रास्त्र और वस्त्र अस्त-व्यस्त हो गये, मुख और नेत्रोंमें उदासी छा गयी। उनकी बोलती बंद हो गयी और वे मृतक-तुल्य अथवा चित्रलिखित-से प्रतीत होने लगे। तब राजा विदूरथने प्रबोधास्त्र हाथमें लिया। फिर तो प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर जैसे कमलिनी विकसित हो जाती है, उसी तरह उस अस्त्रके प्रयोगसे सभी योद्धाओंकी मूर्च्छा जाती रही और वे उठ बैठे। तत्पश्चात् राजा सिन्धुने भयंकर नागास्त्रको, जो नागपाश-बन्धनद्वारा महान् कष्ट-दायक था, धनुषपर चढ़ाया। उसके संधानसे आकाश पर्वत-सरीखे विशालकाय नागोंसे व्याप्त हो गया। मृणालों-द्वारा सुशोभित हुई पोखरीकी तरह पृथ्वी श्वेत वर्णके सर्पोंसे विभूषित हो गयी। सारे पर्वत काले नागरूपी कम्बलोंसे सम्पन्न हो गये। ये सभी पदार्थ विषकी ऊष्मासे मलिन हो गये और वन तथा पर्वतोंकी विशालतासे युक्त पृथ्वी व्याकुल हो गयी। तब महान् अस्त्रोंके मर्मज्ञ विदूरथने भी गरुडास्त्रका प्रयोग किया। उस अस्त्रसे पर्वत-सदृश विशालकाय इतने गरुड प्रकट हुए, जिनसे सारी दिशाएँ भर गयीं। उनके सुनहरे पक्षोंकी चमकसे सभी दिशाएँ स्वर्णमय प्रतीत होने लगीं। उड़ते हुए उन गरुडोंके पंखसे पक्षधारी पर्वतोंकी उड़ानसे उत्पन्न हुए प्रलयकालीन वायुकी भाँति भयंकर आँधी प्रकट हो गयी। वे अपने श्वासवेगसे फुफकारते हुए नाग-समूहोंको अपनी ओर खींच लेते थे। उनकी घुरघुराहटकी तीव्र आवाज समुद्रपर्यन्त व्याप्त हो गयी। तत्पश्चात् राजा सिन्धुने तमोऽस्त्र प्रकट किया, जो अंधा बना देनेवाले अन्धकारका उत्पादक था। उससे भूगर्भका-सा घना अन्धकार फैल गया। उस समय सारी प्रजाएँ अन्धकूपमें गिरे हुएकी भाँति प्रतीत होने लगीं और कल्पान्तकी तरह सभी दिशाओंके व्यवहार एकदम बंद हो गये। तब मन्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ विदूरथने किसी गुप्त मन्त्रणाकी अपेक्षा किये बिना ही ब्रह्माण्ड-मण्डपमें दीपककी तरह प्रकाश फैलानेवाले सूर्यास्त्रकी सृष्टि करके सबको सचेष्ट कर दिया। उस समय सूर्यरूपी अगस्त्यने अपनी किरणोंसे उस प्रकट हुए अन्धकारके महासागरको पी लिया—ठीक उसी तरह, जैसे निर्मल शरद-ऋतु काले बादलोंको पी जाती है। यह देखकर राजा सिन्धु क्रोधसे भर गया। फिर तो उसने उसी क्षण अत्यन्त भीषण राक्षसास्त्र प्रकट किया, जिससे मन्त्रोच्चारण करते ही बाण निकलने लगते थे। उस राक्षसास्त्रका प्रयोग करते ही पातालनिवासी दिग्गजोंके फूत्कारसे विक्षुब्ध हुए महासागरकी भाँति बहुत-से भयंकर एवं क्रूर स्वभाववाले वनराक्षस सभी दिशाओंसे प्रकट हो गये। इसी बीचमें लीलाके स्वामी राजा विदूरथने उस युद्धस्थलमें नारायणास्त्रका प्रयोग किया, जो दुष्ट प्राणियोंके निवारण करनेमें सिद्धहस्त है। उस अस्त्रराजके प्रकट होते ही राक्षसोंके अस्त्रसमूह पूर्णरूपसे शान्त हो गये, जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकार विलीन हो जाता है। तदनन्तर राजा सिन्धुने वायव्यास्त्रकी सृष्टि की, जिसने आकाशमण्डलको प्रचण्ड वायुसे भर दिया। तब महान् अस्त्रवेत्ता विदूरथने पार्वतास्त्र चलाया, जो मानो मेघ-जलसहित आकाशको भी आत्मसात् कर लेनेके लिये उद्यत था। तदुपारान्त राजा सिन्धुने उदीप्त वज्रास्त्र प्रकट किया, जिससे झुंड-के-झुंड वज्र निकलकर रणभूमिमें विचरने लगे। वे ईंधनको भस्मसात् कर लेनेवाली आगकी भाँति विशाल पर्वतरूपी अन्धकारको पी जाते थे

उत्पत्ति-प्रकरण] * राजा विदूरथका सेनाके साथ युद्धके लिये प्रयाण, युद्धारम्भ तथा विदूरथकी पराजय * १५७

तथा अपने करोड़ों चोंचोंसे पर्वतोंके शिखरोंको काट-काट- कर उसी प्रकार भूतलपर गिरा देते थे, जैसे प्रचण्ड वायु फलोंको गिराकर पृथ्वीपर बिछा देती है । तब विदूरथने वज्रास्त्रको शान्त करनेके लिये ब्रह्मास्त्रका प्रयोग किया । फिर तो ब्रह्मास्त्र और वज्रास्त्र दोनों एक साथ ही शान्त हो गये।

इस प्रकार जब वह भयकर संग्राम चल ही रहा था, उसी समय प्रतिभाशालीयोंमें सर्वश्रेष्ठ, महान् उदार एवं उत्कृष्ट धैर्यशाली राजा सिन्धुने विपक्षियोंकी सारी सेनाका विनाश और अपनी सेनाकी पीड़ा-शान्तिके लिये एकमात्र वैष्णवास्त्रका स्मरण किया, जो दिव्यास्त्रोंका राजा, परम ऐश्वर्यशाली एवं कालरुद्रके समान संहारकारी था । उस वैष्णवास्त्रसे अभिमन्त्रित करके राजा सिन्धुने जो बाण चलाया, उसके फलके अग्रभागसे उल्मुक आदि निकलने लगे । उससे निकली हुई प्रकाशमान चक्रोंकी पङ्क्तियोंने दिशाओंको सैकड़ों सूर्योंसे युक्त-सा बना दिया । पङ्किरूपमें सम्मुख दौड़ती हुई गदाएँ आकाशमें सैकड़ों बाँसोंकी भाँति प्रतीत होती थीं । सौ धारवाले वज्रसमूहोंने आकाशको तृणराशिसे आच्छादित-सा कर दिया। पद्माकार पट्टिशोंकी कतारें आकाशमें कटे हुए वृक्षों-सी दीख रही थीं । तीक्ष्ण- धारवाले बाणोंकी पङ्क्तियाँ ऐसी जान पड़ती थीं, जैसे आकाशमें पुष्पजाल बिछा हो। काली आकृतिवाले खड्गोंकी कतारें नभोमण्डलको पत्र-समूहोंसे व्याप्त-सा कर रही थीं । तब विपक्षी राजा विदूरथने भी उस वैष्णवास्त्रकी शान्तिके लिये वैष्णवास्त्रका ही प्रयोग किया, जो शत्रुके पराक्रमके अनुरूप ही था। उससे भी बाण, शक्ति, गदा, प्रास, पट्टिश आदि आयुधरूपी जलसे परिपूर्ण बहुत-सी शस्त्रास्त्रोंकी सरिताएँ प्रकट हुईं, जिन्होंने पूर्वप्रयुक्त वैष्णवास्त्रसे उद्भूत हथियारोंको नष्ट कर दिया । उन शस्त्रास्त्रपूर्ण नदियोंका आकाशमें ही ऐसा भीषण युद्ध प्रारम्भ हुआ, जो द्युलोक और पृथ्वीके अवकाशका विनाश करनेवाला तथा बड़े-बड़े कुलपर्वतोंको विदीर्ण कर देनेवाला था । जैसे मेरे आयुधोंने विश्वामित्रके अस्त्रोंका निवारण किया था, उसी तरह परस्पर जूझते हुए उन दोनों वैष्णवास्त्रोंकी धारावाहिक बाण-वृष्टिने शस्त्र-समूहोंको काट डाला और उन अस्त्रोंसे प्रकट हुए वज्रोंने अकाट्य पर्वतोंको भी जर्जर कर दिया । इस प्रकार दोनों राजाओंके वे अस्त्र पराक्रमशाली दो सुभटोंकी भाँति क्षणभरतक परस्पर अत्यन्त भयंकर युद्ध करके शान्त हो गये ।

तत्पश्चात् राजा सिन्धु अपने रथको छोड़कर पृथ्वीपर उतर पड़ा और ढाल-तलवारसे लैस हो गया । फिर तो उसने पलक मारते-मारते बड़ी फुर्तीसे अपने शत्रु राजा विदूरथके रथके घोड़ोंके खुरोंको मृणालकी भाँति तलवारसे काट गिराया । अब तो राजा विदूरथ भी रथहीन हो गये, अतः उन्होंने भी ढाल-तलवार उठा ली । उस समय उन दोनोंके आयुध एक-से थे और दोनोंका उत्साह भी समान था; अतः वे परस्पर वार करनेके लिये पैंतरे बदलने लगे। परस्पर प्रहार करते हुए उन दोनोंके खड्ग आरेके समान हो गये थे । इसी बीच राजा विदूरथने खड्ग छोड़कर एक शक्ति हाथमें ली और उसे शत्रुपर चला दिया । वह शक्ति मथे जाते हुए समुद्रके जलकी तरह घर्घर्शब्दसे युक्त अतएव महान् उत्पातकी सूचना देनेवाले वज्रके सदृश थी । वह अविच्छिन्नरूपसे आयी और राजा सिन्धुके वक्षःस्थलपर गिरी; परंतु उस शक्तिके आघातसे राजा सिन्धुकी मृत्यु नहीं हुई ।

तब उस देशकी लीलाने पूर्वलीलासे कहा—'देवि ! बड़े कष्टकी बात है, क्योंकि जैसे देवराज इन्द्र शत्रु का विनाश करनेके लिये वज्रका सहारा लेते हैं, उसी तरह यह राजा सिन्धु प्रहार करनेके लिये मुसलास्त्रकी ओर देख रहा है; परंतु मेरे पतिदेव मुसलधारी राजा सिन्धुको चकमा देकर बड़ी फुर्तीसे सकुशल दूसरे रथपर चढ़ गये और वेगपूर्वक दूर हट गये हैं । फिर भी हाय ! धिक्कार है, महान् कष्ट आ पड़ा। इस राजा सिन्धुने अत्यन्त वेगसे बाण बरसाकर मेरे स्वामीके रथको तहस-नहस करके उन्हें भी व्यथित कर दिया और अब यह अपने वज्र-सरीखे

१५८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

बाणोंद्वारा उनके स्थूल मस्तकको विदीर्ण करके उन्हें भूतपर गिराना ही चाहता है। देखो न, बडी कठिनाईसे होशमें आनेपर जब मेरे पतिदेव सारथिद्वारा लाये गये दूसरे रथपर चढ रहे थे, उसी समय इसने उनके कधेको काट दिया, जिससे वे रक्तके फौवारे छोड़ रहे हैं । हाय ! हाय ! अब तो और भी कष्टकी बात हुई,इस राजा सिन्धुने अपने खङ्गकी तीखी धारसे मेरे पतिदेवकी दोनों पिंडलियोको उसी प्रकार फाड़ डाला, जैसे आरेसे वृक्ष चीरा जाता है । हाय ! अब तो मैं बुरी तरह मारी गयी; क्योंकि मेरे पतिके दोनों घुटने भी मृणालकी तरह काट डाले गये ।' यों कहकर और पतिकी उस अवस्थापर दृष्टिपात करके पति-प्रेम और भयसे आतुर हुई वह लीला फरसेसे कटी हुई लताकी भाँति मूर्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी । विदूरथ यद्यपि जानुरहित हो गये थे, तथापि वे शत्रुपर प्रहार कर ही रहे थे । उसी अवस्थामें वे जड़से कटे हुए वृक्षकी तरह रथसे नीचे गिरना ही चाहते थे, तबतक सारथि उन्हे रथद्वारा संग्रामभूमिसे दूर हटा ले गया ।

जब ये भागे जा रहे थे, उस समय क्रूर-हृदय राजा सिन्धुने इनके गलेपर अस्त्र प्रहार किया, जिससे इनका आधा गला कट गया । फिर भी राजा सिन्धु इनका पीछा कर ही रहा था । तबतक राजा विदूरथ जैसे सूर्यकी किरणें कमलकोशमें घुस जाती है, उसी तरह रथद्वारा भागकर अपने महलमें जा पहुँचे; किंतु राजा सिन्धु उस राज-भवनमें प्रविष्ट न हो सका, क्योंकि वह महल सरस्वती देवीके प्रभावसे सुरक्षित था । वहाँ पहुँचकर सारथिने राजा विदूरथको, जिसके वस्त्र, कवच और शरीर खङ्गसे काटे गये गलेके छिद्रसे बुद्बुद ध्वनिके साथ निकलती हुई रक्तधाराओंसे सन गये थे, महलके भीतर ले जाकर भगवती सरस्वतीके समक्ष मरणशय्यापर लिटा दिया । इधर विपक्षी राजा सिन्धु महलमें प्रवेश न कर सकनेके कारण लौट गया ।

रघुनन्दन ! राजा विदूरथके मृत-तुल्य हो जानेपर जब 'रणभूमिमें प्रतिद्वन्द्वी राजाके हाथसे राजा विदूरथ मार डाले गये, राजा मारे गये' ऐसी खबर फैल गयी, तब सारा राष्ट्र भयभीत हो गया । उस समय विदूरथके राष्ट्रकी ऐसी दशा हो गयी थी कि वह शत्रु-राष्ट्रकी साधारण एवं सैनिक जनताके विजयोल्लासके शब्दसे मुखरित हो रहा था । उसमे स्वामियोसे रहित हो जानेके कारण हाथी, घोडे और वीर सैनिक टकराकर साधारण जनताको धराशायी कर रहे थे। कोषगृहके किंवाडोके तोडे जानेके कारण उठा हुआ घर्घर शब्द चारों ओर गूँज रहा था। शत्रुपक्षका मन्त्रिमण्डल राजा सिन्धुके पुत्रका अभिषेक-कार्य सम्पन्न करनेके लिये आदेश देनेमें तत्पर था। राजा सिन्धुकी रानियाँ नगरकी शोभा देखनेके लिये झरोखों एवं अन्य बनाये गये छिद्रोंपर बैठ रही थीं । अभिषिक्त हुए राजा सिन्धुके पुत्रका जय-जयकारके सैकडों उच्च घोषोके साथ-साथ प्रबल प्रभाव फैला हुआ था। स्वपक्षीय असंख्य नरेशोने राजा सिन्धुद्वारा बनायी गयी राष्ट्रमर्यादाको नतमस्तक होकर स्वीकार कर लिया था ।

उत्पत्ति-प्रकरण] राजा विदूरथकी मृत्यु, संसारकी असत्यता और द्वितीय लीलाकी वासनारूपताका वर्णन * १५९

तदनन्तर 'भूमण्डलके एकच्छत्र सम्राट् राजा सिन्धुकी जय हो!' यों घोषणा करते हुए लोग प्रत्येक नगरमें भेरियाँ बजाने लगे। पुत्रके राज्याभिषेकके पश्चात् राजा सिन्धुने, जो विजयी होनेके कारण उन्नत-मस्तक था, युगान्तके समय जगत्‌की सृष्टि करनेके लिये प्रकट हुए दूसरे मनुकी भाँति प्रजाकी नयी व्यवस्थाके हेतु राजधानीमें प्रवेश किया। तत्पश्चात् राजा सिन्धुके नगरमें दसों दिशाओंसे हाथी-घोड़ोंके रूपमें भेंट आने लगी। मन्त्रियोंने तत्काल ही प्रत्येक दिशाओंके सामन्त राजाओंके पास राजकीय नियम, चिह्न और आदेश भेज दिये। फिर तो जैसे मन्थन-कालमें आवर्तोंके कारण क्षुब्ध हुआ क्षीरसागर मन्दराचलके निकाल लिये जानेपर तुरंत ही प्रकृतिस्थ हो गया था, उसी तरह अराजकताके कारण विक्षुब्ध हुआ सारा राष्ट्र दसों दिशाओंसहित शीघ्र ही शान्त हो गया।

(सर्ग ४६-५१)


राजा विदूरथकी मृत्यु, संसारकी असत्यता और द्वितीय लीलाकी वासनारूपताका वर्णन, लीलाके गमनमार्ग और स्वामी पद्मकी प्राप्तिका कथन, पदार्थोंकी नियति, मरणक्रम, भोग और कर्म, गुण एवं आचारके अनुसार आयुके मानका वर्णन, आदि-सृष्टिसे लेकर जीवकी विचित्र गतियों तथा ईश्वरकी स्थितिका निरूपण

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! इसी बीचमें मूर्च्छित होकर सामने पड़े हुए अपने स्वामीको, जिनका श्वासमात्र ही अवशेष रह गया था, देखकर लीलाने सरस्वतीसे कहा—'अम्बिके ! ये मेरे पतिदेव अब यहाँ अपनी देह-का उत्सर्ग करनेके लिये उद्यत हैं।'

श्रीसरस्वतीजीने कहा—लीले ! इस प्रकार महान् उद्योग-से परिपूर्ण, राष्ट्र-विप्लवकारी और परम विचित्र व्यवसायोंसे युक्त इस संग्रामके आरम्भ होने, चलने और समाप्त होनेपर यह राष्ट्र अथवा भूतल न तो कहीं कुछ भी उत्पन्न हुआ है और न नष्ट ही हुआ है; क्योंकि यह जगत् तो स्वप्नात्मक है। अनघे ! पूर्वोक्त गिरिग्राम-निवासी ब्राह्मणके घरके भीतर स्थित राजा पद्मके शवके निकटवर्ती आकाशमें वर्तमान अन्तःपुरके भीतर तुम्हारे पतिका यह भूतलरूप राष्ट्र प्रतीत हो रहा है। पुनः विन्ध्याद्रि-के ग्राममें वसिष्ठनामक ब्राह्मणके घरके अंदर यह राष्ट्रसहित ब्रह्माण्ड स्थित है। उसी ब्राह्मणके घरमें शवयुक्त गेह-जगत् वर्तमान है। उस शवयुक्त गेह-जगत्‌के मध्यमें इस गेह-जगत्-का अस्तित्व है। यो यह त्रिजगत्, जो महान् व्यवसायोंसे युक्त है, भ्रमरूप ही है तथा गिरिग्रामरूपी देहके मध्यभागमें स्थित आकाशकोशमें यह सागरसहित पृथ्वी दृष्टिगोचर हो रही है और तुमसे, मुझसे, इस लीलासे एवं इस विदूरथसे संयुक्त यह चेतन परमात्मा ही विकसित हो रहा है। इसलिये तुम उत्पत्ति-विनाशरहित उस परमपदरूप परमात्माको जानो। वह स्वयंप्रकाश, परम शान्त और निर्विकार है तथा मण्डपगृहके भीतर अपने चिन्मात्र स्वभावके कारण उदित हुए अपने आत्मा-में जगत्-रूपसे आभासित हो रहा है। यदि भ्रमका द्रष्टा ही न रहे तो भ्रममें भ्रमता कैसे होगी। अतः भ्रमकी सत्ता है ही नहीं। जो कुछ है, वह अविनाशी परमपदरूप परमात्मा ही है। उस परमात्माको तुम ऐसे समझो कि वह उत्पत्ति-विनाशरहित, स्वयंप्रकाश, शान्त, आदिरूप और निर्विकार होते हुए भी जगत्रूपसे प्रतीत हो रहा है। स्वप्नावस्थामें देहके अंदर देखे गये महापुरकी भाँति मेरु आदि पर्वत-समुदायद्वारा उपलक्षित यह सारा दृश्यवर्ग शून्यात्मकरूप ज्ञानमात्र ही है, इसमें स्थूलरूपता कुछ भी नहीं है। शुभे ! यह राजा पद्म जिस लोकमें शवरूपसे वर्तमान है, तुम्हारी यह सपत्नी लीला वहाँ पहले ही पहुँच गयी है। यह लीला तुम्हारे

१६० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ ]


समक्ष ज्यों ही मूर्छित हुई त्यों ही तुम्हारे पति राजा पद्मके शवके निकट जा पहुँची है।

लीलाने पूछा—देवि ! यह पहले ही वहाँ पहुँचकर देहधारिणी कैसे हो गयी ? इसके मेरे सपत्नी-भावको प्राप्त होनेमें क्या कारण है ? तथा राजा पद्मके उस उत्तम राजमहलके जो निवासी हैं, वे इसे किस रूपमें देखते हैं और इसे क्या कहते हैं ?—यह सब मुझे संक्षेपसे बतलाइये।

श्रीदेवीजीने कहा—लीले ! तुमने मुझसे जैसा प्रश्न किया है, तदनुसार मैं सारी घटना तुमसे संक्षेपमें वर्णन करती हूँ; सुनो। यह दूसरी लीलाके रूपमें वर्तमान तुम्हारा ही वृत्तान्त है, जो तुम्हारी शङ्काओंका निर्णायक है। इससे मरण-परलोकगमन आदि भी, जिनका प्रत्यक्षीकरण होना कठिन है, तुम्हारे दृष्टिगोचर हो जायँगे। यह जो नगरादिरूपसे दृष्टिगोचर होनेवाला जगन्मय भ्रम है, उस अत्यन्त विस्तृत भ्रमको तुम्हारा पति यह राजा पद्म उसी शवयुक्त गृहमें देखता है। यहाँतक कि यह सामने घटित हुआ युद्ध भ्रमयुद्ध है। यह लीला भी भ्रान्तिस्वरूप ही है। यह जन-समुदाय जन्मादिरहित आत्मा है। यहाँकी मृत्यु भी भ्रान्तिसे ही दीख पड़ती है। इस प्रकार यह संसार भ्रमात्मक है। इसी भ्रमक्रमसे लीला इस राजा पद्मकी प्रेयसी भार्या हुई है। वरारोहे ! तुम और यह दोनों सुन्दरियाँ भी स्वप्नमात्र ही हो। जिस प्रकार इस राजाकी तुम दोनों सुन्दरी प्रियतमाएँ स्वप्नमात्र हो, उसी तरह तुम दोनोंका पति यह राजा और स्वयं मैं भी स्वप्नमात्र ही हूँ। इसी तरह जगत्की यह सारी शोभा भी भ्रमपूर्ण ही है और यहाँका दृश्यवर्ग भ्रममात्र कहा जाता है। इसी तरह यह लीला, तुम, यह संसारस्थिति, यह राजा पद्म और मैं—ये सबके सब परमात्माके सर्वव्यापक होनेके कारण उसी परमात्मामें सत्यरूपसे स्थित हैं। अतः महाचिद्घनकी स्थितिके सर्वात्मक होनेके कारण ये राजा आदि और हमलोग यथा-परस्पर एक-दूसरेके द्वारा प्रेरित होनेके कारण इस रूपमें परिणत हो गये हैं। जब इस लीलाके लिये पद्मकी मनोवासना जाग्रत् हुई, उसी समय यह तुम्हारे-सरीखे आकार-प्रकार धारण करके चैतन्यरूप चमत्कारमें प्रवृत्त हो गयी तथा तुम्हारे पतिदेवने अपनी मृत्युके अनन्तर शीघ्र ही इसे अपने सामने उपस्थित देखा; क्योंकि जिस समय चित्त वासनाभ्यासवश आधिभौतिक पदार्थोंका स्वप्नमें अनुभव करता है, उस समय उस अनुभवके कारण तब यह दृश्यवर्ग सत्य-सा प्रतीत होता है; वस्तुतः यह मिथ्या कल्पनामात्र ही; परंतु जब चित्त इस भौतिक जगत्के पदार्थोंका सत्यरूपसे अनुभव नहीं करता अथवा असत् समझता है, उस समय तदनुरूप दृढ़ वासनासे उसके मिथ्यात्वका निर्णय हो जाता है।

ये दोनों स्त्री-पुरुष जब स्मरणानुकूल मूर्च्छावस्थाको प्राप्त हुए, उसी समय इन्होंने पूर्ववासनाके जाग्रत् हो जानेके कारण अपने हृदयमें ऐसा अनुभव किया कि 'ये हमारे पिता हैं, ये हमारी माताएँ हैं। यह हमारा देश है। यह हमारी सम्पत्ति है। यह हमारा कर्म है। पूर्वजन्ममें हमने ऐसा ही कर्म किया था। इस प्रकार हम दोनोंका विवाह हुआ और इस रूपमें हम दोनो एकताको प्राप्त हुए।' इनका वह कल्पित जनसमूह भी उसी अवस्थामें सत्यताको प्राप्त हुआ। जैसे स्वप्नावस्थामें देखा हुआ पदार्थ सत्य-सा प्रतीत होता है, उसी तरह यहाँ भी यह दृष्टान्त है। लीले ! इस लीलाने 'मै विधवा न होऊँ' ऐसी भावनासे भावित होकर मेरी आराधना की थी तथा मैंने भी उसे मनोऽनुकूल वर प्रदान किया था। इसी कारण निश्चयही यह बालिका यहाँ पहले ही मृत्युको प्राप्त हुई है। तुम लोग व्यष्टिचेतन हो और मैं तुमलोगोंकी समष्टिचेतन-स्वरूपा कुलदेवी हूँ, अतः सदा पूजनीय हूँ। मैं अपने आप ही सब कुछ करती हूँ। जब इस लीलाके जीवने इसके शरीरसे उत्क्रमण करना चाहा, उसी क्षण उसने

उत्पत्ति-प्रकरण] * राजा विदूरथकी मृत्यु, संसारकी असत्यता और द्वितीय लीलाकी वासणारूपताका वर्णन * १६१

प्राणवायुके रूपमें सूक्ष्मशरीर धारण कर लिया और मन- द्वारा चलायमान हो मुखछिद्रसे निकलकर इस देहका परित्याग कर दिया । तदनन्तर मरणानुकूल मूर्च्छाके उपरान्त जीवात्मारूपसे स्थित इस लीलाने इसी घरके आकाशमें बुद्धिमें संकल्पित पदार्थोंको देखा । फिर यह भावनावश पूर्वदेहकी स्मृति हो जानेसे स्वप्नकी तरह ब्रह्माण्डमण्डलके भीतर जाकर अपने पतिसे संयुक्त हो गयी ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! तदनन्तर यह लीला, जिसे सरस्वतीद्वारा वर उपलब्ध हो चुका था, इसी वासनामय शरीरसे अपने पति राजा पद्मसे मिलनेके लिये आकाशमार्गसे ऊपरके लोकोंमें जानेको उद्यत हुई; उस समय पतिमिलनके सुखका विचार करके यह प्रबल प्रेमभाव- से संयुक्त हो आनन्दपूर्वक उड़ चली । वहाँ पहुँचकर इसे इसकी प्यारी कुमारी कन्या, जिसे सरस्वती देवीने ही वहाँ भेजा था, प्राप्त हुई, मानो वह लीलाके संकल्परूपी महान् दर्पणसे निकलकर आगे खड़ी हो गयी हो ।

कुमारीने कहा—सरस्वती देवीकी सहेली ! तुम्हारा स्वागत है। मैं तुम्हारी कन्या हूँ । सुन्दरि ! तुम्हारी ही प्रतीक्षा करती हुई मैं यहाँ आकाशमार्गमें खड़ी हूँ ।

तब लीलाने कहा—कमलनयनी देवि ! तुम मुझे स्वामीके समीप ले चलो ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तब वह कुमारी 'मातः ! आओ, हम दोनों वहीं चल रही हैं'—यों कहकर लीलाके आगे होकर आकाशमें मार्गप्रदर्शन करने लगी । तत्पश्चात् वह लीला उसके पीछे-पीछे प्रस्थित हुई । आगे बढ़नेपर वह मेघमार्गको लाँघकर वायुमार्गमें प्रविष्ट हुई । फिर वहाँसे चलकर सूर्यमार्गसे निकलती हुई नक्षत्रमार्गमें गयी । उसे भी पार करके ब्रह्माण्ड-कपालमें जा पहुँची । वहाँ जानेपर, अपना चित्तमात्र ही जिसका शरीर है, वह लीला अपने हृदयमें यों अनुभव करने लगी कि निश्चय ही यह सारा दृश्य अपनी कल्पनाके स्वभावसे उत्पन्न हुआ भ्रम ही है । तदनन्तर ब्रह्माण्डके उस पार पहुँचकर वह जलादि आवरणोंको लाँघती हुई आगे बढ़नेपर महान् चेतनाकाशके मध्यमें प्रविष्ट हुई । वह चेतनाकाश इतना विस्तृत है कि यदि अत्यन्त वेगशाली गरुड़ भी उसके चारों ओर चक्कर लगायें तो सैकड़ों करोड़ कल्पोंमें भी उसके ओर-छोरका पता नहीं लगा सकते । जैसे महान् वनमें फलोंकी गणना नहीं हो सकती, उसी तरह उस चेतनाकाशमें लाखों क्या, असंख्य ब्रह्माण्ड हैं, जो परस्पर एक-दूसरेसे अलक्षित हैं। उन्हीं- मेंसे एक ब्रह्माण्डको, जो सामने उपस्थित एवं विस्तृत आवरणसे आवेष्टित था, वेधकर वह लीला उसके भीतर प्रविष्ट हुई—ठीक उसी तरह, जैसे कीड़ा बेरके फलमें छेद करके उसके भीतर घुस जाता है । तदनन्तर भूमण्डलमें राजा पद्मके राज्यान्तर्गत उसके नगरमें पहुँचकर उस मण्डपमें प्रवेश करके वह राजाके शवके निकट स्थित हुई । इतनेमें ही वह कुमारी सुन्दरी लीलाकी आँखोंसे ओझल हो गयी । जैसे पूर्ण ज्ञान हो जानेपर माया विनष्ट हो जाती है, उसी तरह वह भी कहीं चली

६२* अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

यी। तदुपरान्त लीला शत्रुरूपी अपने पतिके मुखको देखकर अपनी प्रतिभाके प्रभावसे इस सत्यको समझ गयी कि 'ये मेरे पतिदेव संग्राममें राजा सिन्धुके हाथों मारे गये और अब इन वीर-लोकोंको प्राप्त होकर सुखपूर्वक सो रहे हैं। मैं भी इस प्रकार श्रीदेवीकी कृपासे सशरीर यहाँ आ पहुँची हूँ, अतः मेरे समान धन्य दूसरी कोई स्त्री नहीं है।' यों भलीभाँति विचारकर लीला अपने हाथमें एक सुन्दर चँवर लेकर डुलाने लगी।

श्रीदेवीजीने कहा—लीले! वह राजा, वह वासनामयी लीला और उसके वे सभी भृत्य परस्पर पति-पत्नी एवं स्वामी-सेवकके भावके अनुकूल ही एक-दूसरेको देखते हैं—जैसे 'यह मेरी स्वाभाविक भार्या है। यह मेरी स्वाभाविक सखी है। यह मेरी स्वाभाविक रानी है और यह मेरा स्वाभाविक नौकर है।' परंतु इस आश्चर्यमय वृत्तान्तको पूर्णरूपसे केवल तुम, मैं और यह लीला—ये तीन ही जान सकेंगी। अन्य किसीके लिये भी इसका जानना असम्भव है। इसलिये जो ज्ञातव्य वस्तुका ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं अथवा जिन्होंने परम धर्मका आश्रय ग्रहण कर लिया है, वे ही आतिवाहिक अर्थात् ब्रह्मादि लोकोंको प्राप्त होते हैं। दूसरोंके लिये वह दुर्लभ है। महाप्रलयके अवसरपर जब सभी पदार्थोंका विनाश हो जाता है, उस समय केवल अनन्त चेतनाकाशस्वरूप शान्त सद्ब्रह्म ही शेष रहता है और जीवात्मा चेतनरूप होनेके कारण 'मैं तेजःस्वरूप सद्ब्रह्मका अंश हूँ' यों अनुभव करता है, जैसे तुम स्वप्नावस्थामें आकाशगमन आदिका अनुभव करती हो। तदनन्तर तेजोंऽशरूप वह जीवात्मा स्वयं ही अपनेमें स्थूलत्व लाभ करता है। फिर वह स्थूलत्व ही यह ब्रह्माण्ड कहा जाता है, जो असत्य होते हुए भी सत्य-सा प्रतीत होता है। उस ब्रह्माण्डके अन्तर्गत स्थित वह ब्रह्म यों समझता है कि 'यह ब्रह्मा मैं ही हूँ।' तब फिर वह अपने-आप मनोराज्यकी सृष्टि करता है। वही मनोराज्य यह जगत् है। उस प्रथम सृष्टिमें जो संकल्प-वृत्तियाँ जहाँ जिस रूपमें विकसित हुईं, वे वहाँ उसी रूपमें आज भी निश्चल भावसे स्थित हैं। प्रलयकालमें भी विश्वरूप परमात्माको सम्पूर्ण वस्तुओंसे शून्य कहना युक्त नहीं। भला, सुवर्ण कटक-कुण्डल आदि स्थानोंको छोड़कर कैसे रह सकता है। अर्थात् जैसे सुवर्ण कटकादिमें ओतप्रोत है, उसी तरह परमात्मा समस्त पदार्थोंमें व्याप्त है।

यद्यपि पृथ्वी आदि दृश्य-प्रपञ्च आकाशरूप है, तथापि सृष्टिके प्रारम्भमें जो जहाँ जिस रूपमें विकसित हुआ, वह आजतक भी वहाँ उसी रूपमें वर्तमान है। अपनी स्थितिसे विचलित होनेमें समर्थ न हो सका। वस्तुतः तो सृष्टिके आदिमें यह जगत् उत्पन्न ही नहीं हुआ था। यह जो कुछ अनुभव हो रहा है वह तो चिदाकाशरूप जीवात्माके संकल्पका विकास है। इसे स्वप्नकालमें घटित हुए स्त्रीप्रसङ्गकी भाँति कल्पित ही समझना चाहिये। सृष्टिके आदिमें चिदाकाशस्वरूप जीवात्मा आकाशका संकल्प करनेके कारण आकाशरूपताको और कालका संकल्प करनेके कारण कालरूपताको प्राप्त होता है।

उत्पत्ति-प्रकरण] ⁠राजा विदूरथकी मृत्यु, संसारकी असत्यता और द्वितीय लीलाकी वासनारूपताका वर्णन⁠ १६३

जैसे स्वप्नमें पुरुष अपनेमें ही जलताका दर्शन करता है, उसी तरह जीवात्मा जलका संकल्प करनेके कारण जलवत् स्थित होता है। स्वप्नकी भाँति जीवात्मा उस-उस रूपको प्राप्त होता है और जैसा होता है, वैसा ही वह ज्यों-का-त्यों स्थित रहता है; क्योंकि चेतनके चमत्कार अर्थात् मायाकी चतुरतासे यह प्रपञ्च असत् होते हुए भी सत्-सा दीख पड़ता है। जैसे स्वप्न, कल्पना और ध्यानमें आयी हुई वस्तुएँ असत् होती हैं, उसी तरह आकाशत्व, जलत्व, पृथिवीत्व, अग्नित्व और वायुत्व—ये सभी असत् हैं—ऐसा चेतन स्वयं अपने अंदर अनुभव करता है। अब मृत्युके पश्चात् कर्मफलके अनुभव करनेका जो क्रम है, उसे सम्पूर्ण संशयोंकी शान्तिके लिये सुनो। वह मरनेपर कल्याणकारी होता है। जगत्में अपने कर्मोंकी देश, काल, क्रिया और द्रव्यजनित शुद्धि और अशुद्धि ही मनुष्योंकी आयुके अधिक और न्यून होनेमें कारण होती हैं। अपने कर्मरूप धर्मका ह्रास होनेपर मनुष्योंकी आयु क्षीण हो जाती है और उस धर्मके बढ़नेपर आयुकी वृद्धि होती है। बाल्यावस्थामें मृत्यु प्रदान करनेवाले कर्मोंको करनेसे बालक, युवावस्थामें मृत्युदायक कर्मोंसे नौजवान और बुढ़ापेमें मृत्युप्रद कर्मोंके करनेसे वृद्ध मृत्युको प्राप्त होता है। जो अपने धर्मका शास्त्रानुकूल आरम्भ करके पीछे उसका अनुष्ठान करता रहता है, वह श्रीमान् पुरुष शास्त्रवर्णित आयुका भागी होता है। यों अपने कर्मोंके अनुसार ही जीवको अन्तिम दशा प्राप्त होती है और उस मरणासन्न अवस्थाको प्राप्त हुआ जीव मर्मघातिनी वेदनाओंका प्रत्यक्ष अनुभव करता है।

प्रबुद्ध लीलाने पूछा—चन्द्रवदनी देवि ! मरण सुखरूप है अथवा दुःखरूप ? और मरनेके बाद फिर क्या होता है ? इस प्रकार मरणका वृत्तान्त मुझसे संक्षेपमें कहिये।

श्रीदेवीजीने कहा—लीले ! शरीरान्तके समय मुमूर्षु पुरुष तीन प्रकारके होते हैं—मूर्ख, धारणाभ्यासी और युक्तिमान् । इनमें धारणाभ्यासी दृढतापूर्वक धारणाका अभ्यास करके शरीरको छोड़कर सुखपूर्वक प्रयाण करता है। उसी प्रकार युक्तिमान् भी सुखपूर्वक ही गमन करता है; परंतु जिसने न तो धारणाका अभ्यास किया है और न युक्ति ही प्राप्त की है, वह मूर्ख पुरुष अपने मृत्युसमयमें विवश होकर दुःखको प्राप्त होता है। वह विषयी पुरुष वासनाके आवेशसे विवशताका अनुभव करता हुआ जड़से कटे हुए कमलकी तरह अत्यन्त दीनताको प्राप्त हो जाता है। जिसकी बुद्धि शास्त्राभ्यासद्वारा संस्कृत नहीं है एवं जो दुष्टोंकी संगतिको सेवन करता है, वह मरनेपर अग्निमें गिरे हुए जीवकी भाँति अन्तर्दाहका अनुभव करता है। जब उस अज्ञानी पुरुषके कण्ठसे घुरघुराहटकी आवाज निकलने लगती है, आँखोंकी पुतलियाँ उलट जाती हैं, शरीरका रंग विकृत हो जाता है, उस समय उसकी बड़ी दयनीय दशा हो जाती है। उसकी आँखोंके सामने घना अन्धकार छा जाता है, जिससे उसे कुछ सूझ नहीं पड़ता। बोलनेमें असमर्थ होनेके कारण वह स्वयं जड़वत् हो जाता है। जैसे सूर्यके अस्ताचलका आश्रय लेनेपर क्रमशः प्रकाशकी मन्दताके कारण दिशाएँ धुँधली हो जाती हैं, उसी तरह उसकी सारी इन्द्रियोंकी शक्तियाँ क्षीण हो जानेके कारण वे अपने-अपने विषयोंको ग्रहण करनेमें असमर्थ हो जाती हैं। विशेषरूपसे मोहके वशीभूत हो जानेसे उसके मनकी कल्पनाशक्ति नष्ट हो जाती है, जिससे वह अविवेकवश मोहके अगाध सागरमें डूबता-उतराता रहता है। ज्यों ही उसे थोड़ी सी मूर्च्छा हुई, त्यों ही प्राणवायुकी गति बंद हो जाती है और जब सभी प्राणोंकी क्रिया रुक जाती है, तब उसे घोर मूर्च्छा आ घेरती है। इस प्रकार परस्पर एक-दूसरेके सहयोगसे पुष्टताको प्राप्त हुए मोह, संवेदन और भ्रमसे जीव पाषाणवत् जड़ताको प्राप्त हो जाता है। सृष्टिके प्रारम्भसे ही यह नियम चला आ रहा है।

प्रबुद्ध लीलाने पूछा—देवि ! यद्यपि यह शरीर आठ