भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 166

उत्पत्ति-प्रकरण ] * लीलाका भूतलमें प्रवेश और उसके द्वारा अपने पूर्वजन्मके स्वजनोंके दर्शन * १३१

हुए पूर्वसंकल्पजनित संस्कार-ज्ञानसे गृहाकाशमें ही एक बित्ता ऊँचे उठकर आकाश-गमनमें समर्थ चिन्मय आकृतियाँ धारण कर लीं । दोनों ही चेतन आकाश ( ब्रह्म )-रूपिणी हो गयीं । यद्यपि वे उसी घरमें बैठी रहीं, तथापि चिन्मय चित्तके संकल्पसे कोटि योजन विस्तृत दूर-से-दूर आकाशस्थलमें उड़ने लगीं—उड़नेका अनुभव करने लगीं । यद्यपि ये दोनों सखियाँ वास्तवमें चेतन आभासमय शरीरवाली थीं, तो भी पूर्वसंकल्पित दृश्यके अनुसंधानमें लगे रहनेवाले चित्तके साथ अभिन्नताको प्राप्त हुए अपने स्वभावके कारण वे एक दूसरेके शरीरको देखती और परस्पर स्नेहमग्न होती थीं ।

तदनन्तर वे दोनों देवियाँ यथाशक्ति यत्र-तत्र विश्राम करती हुई धीमी चालसे आगे बढ़ने लगीं । उन्होंने शून्यमें ही देखा आकाशमण्डल बड़े-बड़े भुवनों और वहाँके निवासियोंके निर्माण कार्यसे अत्यन्त भर गया है—अवकाशशून्य हो रहा है । ऊपर-ऊपरका आकाश भिन्न-भिन्न भुवनोंसे अलग-अलग घिरा हुआ था । वे सुन्दर विमानोंसे सुशोभित भुवन विचित्र आभूषणोंके समान प्रतीत होते थे । उसमें कहींपर वज्र, चक्र, शूल, खड्ग और शक्ति आदि अस्त्र-शस्त्रोंके अधिष्ठाता देवता मूर्तिमान् होकर विचर रहे थे । उनसे युक्त वह लोक बिना भीतके ही भवनोंसे विभूषित था और वहाँ नारद, तुम्बुरु आदि गन्धर्व गीत गाते थे । कहीं मेघोंके मार्गमें ( पुष्कर और आवर्तक आदि ) महामेघोंके वृष्टि-सम्बन्धी महान् आयोजनसे वहाँ सब ओर हलचल मची थी और कहींपर प्रलयकालके मेघ चित्रलिखितकी भाँति निश्चेष्ट एवं नीरव दिखायी देते थे । कहीं उठते हुए कज्जलगिरिके समान सुन्दर मेघोंकी घटा घिरी आ रही थी । कहीं सुवर्ण-द्रवके समान मनोहर सूर्यके तापको दूर करनेवाले बादल छा रहे थे और कहीं दिशाओंके दाहसे उत्पन्न हुई गर्मी फैल रही थी । कहीं शून्यता रूपी जलसे परिपूर्ण आकाश प्रशान्त महासागरके समान शोभा पाता था । कहीं विमानोंपर बैठे हुए देवताओंकी बहुरंगी प्रभासे आकाशकी रूप-रेखा चितकबरी-सी जान पड़ती थी ! कहीं वह शान्त, समाधिस्थ तथा परम पदमें विश्रान्त मुनियोंकी मण्डलीसे घिरा हुआ था और कहीं जिन्होंने क्रोधको दूरसे ही त्याग दिया है, उन साधु महात्माओंके चित्तके समान वह सुन्दर एव सम था । कहीं रुद्रपुर, कहीं ब्रह्मपुर और कहीं मायानिर्मित पुर वहाँ दृष्टिगोचर होते थे । कहीं सिद्धोंके समुदाय विचर रहे थे । कहीं यह आकाश ज्ञानी पुरुषके हृदयकी भाँति दृश्यभ्रमसे अत्यन्त शून्य, उज्ज्वल, आवरणरहित, आनन्दमय, कोमल, शान्त, स्वच्छ एवं विस्तृत था ।

जहाँ गूलरके फलके भीतर रहनेवाले छोटे छोटे मच्छरों-के समान त्रिभुवनवासी प्राणियोंका समुदाय घूम रहा था, उस आकाशको बहुत ऊँचेतक लाँघकर वे दोनों ललनाएँ फिर भूतलपर जानेको उद्यत हुईं । ( सर्ग २३-२४ )


लीलाका भूतलमें प्रवेश और उसके द्वारा अपने पूर्वजन्मके स्वजनोंके दर्शन, ज्येष्ठशर्माकी माताके रूपमें लीलाका दर्शन न होनेका कारण

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! आकाशसे किसी पर्वतीय ग्रामको जाती हुई उन दोनों स्त्रियोंने उसी भूतलको देखा, जो ज्ञानकी देवी सरस्वतीके मनमें था—जिसे वे लीलाको दिखाना चाहती थीं । सागर, बड़े-बड़े पर्वत, लोकपाल, स्वर्ग, आकाश और भूतलसे परिवेष्टित जगत्‌के मध्यभागका अवलोकन करके मानव-कन्या रानी लीलाने तुरंत ही अपने मन्दिरके आधारभूत पर्वतीय ग्रामका वह स्थान देखा ।

इस प्रकार वे दोनों सुन्दरियाँ, जहाँ राजा पद्म रहते थे, उस ब्रह्माण्डमण्डलसे निकलकर दूसरे ब्रह्माण्डमें

संक्षिप्त योगवासिष्ठ · पृष्ठ 166, कुल 750 में से · BharatKosha