भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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२३२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

जा पहुँचीं, जहाँ वसिष्ठ नामक ब्राह्मणका घर था। वे दोनों ही स्त्रियाँ सिद्ध थीं। उन्होंने दूसरे लोगोंसे अदृश्य रहकर ही ब्राह्मणके निवासभूत मण्डपको, जो उनका अपना ही घर था, देखा। वह घर गृहस्वामीके वियोगसे हतप्रभ हो गया था। उसके मुख अर्थात् द्वारकी कान्ति करुणासे व्याप्त थी और उसका विनाश निकट था।

रघुनन्दन ! सुन्दरी लीला चिरकालतक सुन्दर ज्ञान-का अभ्यास करनेके कारण देवताकी भाँति सत्यसंकल्प और सत्यकाम हो गयी थी। (वह जो चाहती, वही हो जाता था।) उसने सोचा, ये मेरे बन्धुजन मुझको और इन देवी सरस्वतीको साधारण स्त्रीके रूपमें देखें। उसके ऐसा संकल्प करते ही उस घरके लोगोंने वहाँ दो दिव्याङ्गनाओंको देखा, जो उस घरको अपनी प्रभासे उद्भासित कर रही थीं। वे दोनों लक्ष्मी और पार्वतीकी जोड़ी-सी जान पड़ती थीं। तदनन्तर ज्येष्ठशर्माने घरके अन्य लोगोंके साथ यह कहकर कि 'आप दोनों वन-देवियोंको नमस्कार है' उन दोनोंके लिये पुष्पाञ्जलि छोड़ी।

उस समय ज्येष्ठशर्मा आदि बोले—वनदेवियो ! आप दोनोंकी जय। निश्चय ही आप हमारे दुःखोंका नाश करनेके लिये आयी हैं; क्योंकि प्रायः दूसरोंका संकटसे उद्धार करना ही सत्पुरुषोंका अपना कार्य होता है।

ज्येष्ठशर्मा आदिके ऐसा कहनेके पश्चात् वे दोनों देवियाँ बड़े आदरसे बोलीं—'तुम सब लोग अपना वह दुःख बताओ, जिससे यह सारा जनसमुदाय दुखी दिखायी देता है।' तब उन ज्येष्ठशर्मा आदिने उन दोनों देवियोंसे क्रमशः ब्राह्मणदम्पतीके मरणरूप अपना सारा दुःख निवेदन किया।

ज्येष्ठशर्मा आदि बोले—देवियो ! यहाँ दो ब्राह्मण पति-पत्नी रहते थे, जिनका आपसमें बड़ा स्नेह था। वे यहाँ पधारे हुए सभी लोगोंका आतिथ्य-सत्कार करते थे। हमारी इस कुल-परम्पराके प्रवर्तक भी वे ही थे। द्विजातियोंकी मर्यादाके तो वे स्तम्भ ही थे। वे ही दोनों हमारे माता-पिता थे। इस समय पुत्रों, बन्धु-बान्धवों और पशुओंसहित इस घरको त्यागकर वे दोनों स्वर्गलोकको चले गये हैं, इससे हमें तीनों लोक सूने दिखायी देते हैं। इसलिये देवियो ! आप दोनों पहले हमारे इस शोकका निवारण करें, क्योंकि महात्माओंके दर्शन कभी निष्फल नहीं होते।

पुत्र ज्येष्ठशर्मा जब ऐसा कह चुका, तब माता लीलाने अपने हाथसे उसके मस्तकका स्पर्श किया। उसके उस स्पर्शसे ज्येष्ठशर्माके दुःख-दुर्भाग्यरूपी संकटका तत्काल निवारण हो गया। घरके सभी लोग उन दोनों देवियोंके दर्शनसे अमृत पीनेवाले देवताओंके समान दुःखसे मुक्त हो दिव्य शोभासे सम्पन्न हो गये।

श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! माता लीलाने अपने पुत्र ज्येष्ठशर्माको उसकी माताके रूपमें ही उसे क्यों नहीं दर्शन दिया ? आप पहले मेरे इस मोह (संदेह) का ही निराकरण कीजिये।

श्रीवसिष्ठजीने कहा - रघुनन्दन ! मनुष्य जैसी भावना करता है, उसके अनुसार ही इन पदार्थोंका

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