संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 168, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति-प्रकरण ] * लीलाकी सत्य-संकल्पता तथा उसे अपने अनेक जन्मोंकी स्मृति * १३३
अभ्यासजनित स्वरूप दिखायी देता है, किसी भी पदार्थका वास्तवमें कोई एक रूप नहीं है। लीलाने तो यह यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर लिया था कि पृथ्वी आदि भूतोंका अस्तित्व कदापि नहीं है। चेतन आकाशरूप जो ब्रह्म है, वही कल्पनाद्वारा मिथ्या प्रपञ्चरूपसे प्रकट हो भासित हो रहा है (उसका ज्येष्ठशर्माके प्रति पुत्र-सम्बन्धी-स्नेह नहीं रह गया था, इसलिये उसे अपनी माताके रूपमें लीलाका दर्शन नहीं हुआ) सर्वत्र सभी रूपोंमें केवल एक चेतनाकाशस्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही विराजमान है—जिसे ऐसा बोध प्राप्त हो गया है, उस मुनिके लिये कौन, किस प्रकार, कब और किस निमित्त-से पुत्र, मित्र एवं कलत्र हो सकते हैं। दृश्य-प्रपञ्च तो सृष्टिके आदिमें ही उत्पन्न नहीं हुआ। जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह अजन्मा ब्रह्म ही है। ऐसे यथार्थ ज्ञानवाले लोगोंको राग-द्वेषसे युक्त दृष्टि कैसे प्राप्त हो सकती है।
(सर्ग २५-२६)
लीलाकी सत्य-संकल्पता, उसे अपने अनेक जन्मोंकी स्मृति, लीला और सरस्वतीका आकाशमें भ्रमण तथा परम व्योम—परमात्माकी अनादि-अनन्त सत्ताका प्रतिपादन
**श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—**रघुनन्दन ! उस पर्वतके तट-प्रान्तमें बसेहुए ग्रामके भीतर उस ब्राह्मणके गृहरूपी आकाश-में ही खड़ी हुई वे दोनों स्त्रियाँ सहसा अदृश्य हो गयीं। उस घरके लोगोंने समझा कि दोनों वनदेवियोंने हमपर बड़ी भारी कृपा की है, अतः उनका सारा दुःख मिट गया और वे अपने-अपने काम-धंधोंमें लग गये। तत्पश्चात् उस मण्डपाकाशमें दूसरोंकी दृष्टिसे तिरोहित हुई लीलासे, जो वहाँ मुस्कराती हुई चुपचाप खड़ी थी, सरस्वतीने कहा—
**श्रीसरस्वतीजी बोलीं—**बेटी ! तुमने ज्ञातव्य वस्तुको पूर्णरूपसे जान लिया है, द्रष्टव्य पदार्थोंको देख लिया है। इस प्रकारकी यह ब्रह्मसत्ता है। बताओ, अब और क्या पूछती हो ?
**लीलाने पूछा—**देवि ! मेरे मृत-पतिको जीव जहाँपर राज्य करता है, वहाँपर मुझे उन लोगोंने क्यों नहीं देखा ? और यहाँ मेरे पुत्रने कैसे देख लिया ?
**श्रीसरस्वतीजीने कहा—**सुन्दरी ! मैं लीला हूँ—ऐसा जो तुम्हारा दृढ़ संस्कार था, वह पहले नष्ट नहीं हुआ था; क्योंकि उस संस्कारको मिटानेके लिये तुमने वैसा अभ्यास नहीं किया। जबतक वह संस्कार बना था, तबतक तुम्हारी सत्य-संकल्पता प्रकट नहीं हुई थी। अब वह संस्कार मिट जानेसे तुम सत्य-संकल्प हो गयी हो। इसलिये जब तुमने यह अभिलाषा की कि मेरा पुत्र मुझे देखे, तब तुम्हारा वह मनोरथ तत्काल सफल हुआ। इस समय यदि तुम अपने पतिके समीप जाओ तो उसके साथ भी तुम्हारा सारा व्यवहार पहलेकी ही भाँति होने लगेगा।
**लीला बोलीं—**देवि ! इसी मण्डपके आकाशमें मेरे पतिदेव ब्राह्मण उत्पन्न हुए और इसीमें मृत्युको प्राप्त होकर राजा हो गये। अन्य भूमण्डलरूप उनका वह संसार भी यहीं है। इसमें जो उनकी राजधानीका