भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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उत्पत्ति-प्रकरण ] * लीलाका सरस्वतीकी आज्ञासे पतिके शवको फूलोंकी ढेरीमें रखकर समाधिस्थ होना * ११९


फिर उसी दिन आधीरातके समय जब सभी परिजन (सेवकगण) निद्रासे अचेत हो गये, लीलाने अन्तःपुर-के उस मण्डपमें विशुद्ध ध्यानसे युक्त अन्तःकरणके द्वारा ज्ञानमयी भगवती सरस्वतीदेवीका बड़े दुःखसे आवाहन किया। देवी उसके पास आ गयीं और बोलीं—

'बेटी ! तुमने क्यों मेरा स्मरण किया है ! तुम क्यों अपने मनमें शोकको स्थान देती हो ? जैसे मृगतृष्णामें झूठे ही जलकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार ये संसार-रूपी भ्रम मिथ्या ही प्रतीत होते हैं।'

लीलाने कहा—देवि ! मेरे पति कहाँ हैं ? क्या करते हैं और कैसे हैं? मुझे उनके पास ले चलिये। मैं उनके बिना अकेली नहीं जी सकती।

श्रीसरस्वतीजी बोलीं—सुमुखि ! एक शुद्ध चेतन परमात्मरूप आकाश है, दूसरा मनरूप आकाश है और तीसरा यह सुप्रसिद्ध भूताकाश है। चित्ताकाश और भूताकाश—इन दोनोंसे जो सर्वथा शून्य है उसीको तुम चिन्मय आकाश समझो। तुमने जो अपने पतिके रहने आदिका स्थान पूछा है, वह चेतन आकाशमय कोश ही है (उससे अतिरिक्त नहीं है); अतः चेतन आकाशका एकाग्रमनसे जब चिन्तन किया जाता है, तब पृथक् विद्यमान न होनेपर भी वह शीघ्र दिखायी देता और अनुभवमें आता है। भद्रे ! यदि तुम सम्पूर्ण सङ्कल्पोंको त्यागकर उस चेतनाकाशरूप परब्रह्ममें स्थित हो जाओ—उसीमें मनको एकाग्र कर दो तो तुम उस सर्वात्मपदको, जो परम तत्त्वरूप है, अवश्य प्राप्त कर लोगी—इसमें संशय नहीं है। सुन्दरि ! उक्त तत्त्व यद्यपि इस जगत्के अत्यन्ताभावका बोध होनेपर ही सुलभ होता है, दूसरे किसी उपायसे नहीं, तथापि तुम मेरे वरदान-के प्रभावसे उसे शीघ्र प्राप्त कर लोगी।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! यह कहकर देवी सरस्वती अपने दिव्य धामको चली गयीं और लीला लीलापूर्वक (अनायास) ही निर्विकल्प समाधिमें स्थित हो गयी।

रानीने निर्विकल्प समाधिके द्वारा चेतनाकाशमें स्थित होकर अपने उसी राजप्रासादके आकाशमें राजा पद्मको सिंहासनपर विराजमान देखा। (वे अपनी वासना और