संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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बात यह हुई कि किसी शत्रुने आक्रमण किया और युद्धमें घायल होकर उनका शरीर धराशायी हो गया। (वे अन्तःपुरमें लाये गये और वहीं मर गये।) इस प्रकार राजाकी मृत्यु हो जानेपर लीला अन्तःपुरके मण्डपमें जलशून्य कमलिनीकी भाँति मुरझा गयी—उसका मुख मलिन हो गया। विपत्तुल्य उस निःश्वाससे उसका सारा अधर-पल्लव सूख गया। वह बेचारी बाणसे बिंधी हुई हरिणीके समान छटपटाती हुई मृत्यु-तुल्य अवस्थाको पहुँच गयी। तत्पश्चात् जलाशयके सूख जानेसे व्याकुल हुई मछलीके ऊपर जैसे आषाढ़की पहली वर्षा अनुकम्पा करती है, उसी प्रकार पतिके वियोगसे अत्यन्त विह्वल हुई लीलाके ऊपर दयामयी सरस्वतींने आकाशवाणीके रूपमें कृपा की।
(सर्ग १५-१६)
सरस्वतीकी आज्ञासे पतिके शवको फूलोंके ढेरमें रखकर समाधिस्थित हुई लीलाका पतिके वासनामय स्वरूप एवं राजवैभवको देखना तथा समाधिसे उठकर पुनः राजसभामें सभासदोंका दर्शन करना
श्रीसरस्वतीजीने कहा—बेटी! अपने पतिके शवको तुम फूलोंके ढेरमें छिपाकर रक्खो। ऐसा करनेसे तुम फिर अपने इस पतिको प्राप्त कर लोगी। न तो ये फूल मुरझायेंगे और न तुम्हारे पतिका यह शव ही सड़-गलकर नष्ट होने पायेगा। फिर थोड़े ही दिनोंमें यह शव पुनः जीवित होकर तुम्हारे पतिका उत्तरदायित्व सँभालेगा। इसका जीव जो आकाशके समान निर्मल है तुम्हारे इस अन्तःपुरके मण्डपसे शीघ्र बाहर नहीं निकल सकेगा।
तब अपने पतिको वहीं अन्तःपुरमें फूलोंके ढेरमें छिपाकर रखनेके पश्चात् रानीको कुछ आश्वासन मिला, परंतु घरमें निधि (खजाने) को रखकर भी उसके उपयोगसे वञ्चित होनेके कारण दरिद्रतापूर्ण जीवन बितानेवाली स्त्रीके समान लीला भी पतिकी सेवाके सुखसे वञ्चित होनेके कारण उस विषयमें दरिद्र ही बनी रही।