संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
DevanagariHindipublished750 पृष्ठ
पृष्ठ 21, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 21
( १९ )
| विवेचनको सुनाना, राजाद्वारा कुम्भका शिष्यत्व-स्वीकार ... ४५७ | ६४-महेन्द्रपर्वतपर अग्निके साक्ष्यमें मदनिका (चूडाला) और शिखिध्वजका विवाह, एक सुन्दर कन्दरामें पुष्प-शय्यापर दोनोंका समागम, शिखिध्वजकी परीक्षाके लिये चूडालाद्वारा मायाके बलसे इन्द्रका प्राकट्य, इन्द्रका राजासे स्वर्ग चलनेका अनुरोध, राजाके अस्वीकार करनेपर परिवारसहित इन्द्रका अन्तर्धान होना ४८३ |
| ५४-चिरकालकी तपस्यासे प्राप्त हुए चिन्तामणिका त्याग करके मणिबुद्धिसे काँचको ग्रहण करनेकी कथा तथा विन्ध्यगिरिनिवासी हाथीका आख्यान ४५९ | ६५-राजा शिखिध्वजके क्रोधकी परीक्षा करनेके लिये चूडालाका मायाद्वारा राजाको जारसमागम दिखाना और अन्तमें राजाके विकारयुक्त न होनेपर अपना असली रूप प्रकट करना ... ४८५ |
| ५५-कुम्भद्वारा चिन्तामणि और काँचके आख्यानके तथा विन्ध्यगिरिनिवासी हाथीके उपाख्यानके रहस्यका वर्णन ... ४६१ | ६६-ध्यानसे सब कुछ जानकर राजा शिखिध्वजका आश्चर्यचकित होना और प्रशंसापूर्वक चूडालाका आलिङ्गन करना तथा उसके साथ रात बिताना, प्रातःकाल संकल्पजनित सेनाके साथ दोनोंका नगरमें आना और दस हजार वर्षोंतक राज्य करके विदेहमुक्त होना ... ४८८ |
| ५६-कुम्भकी बातें सुनकर सर्वत्यागके लिये उद्यत हुए राजा शिखिध्वजद्वारा अपनी सारी उपयोगी वस्तुओंका अग्निमें झोंकना, पुनः देहत्यागके लिये उद्यत हुए राजाको कुम्भद्वारा चित्त-त्यागका उपदेश ... ४६३ | ६७-बृहस्पतिपुत्र कचकी सर्वत्याग-साधनसे जीवन्मुक्ति, मिथ्या पुरुषकी आख्यायिका और उसका तात्पर्य ... ४९१ |
| ५७-चित्तरूपी वृक्षको मूलसहित उखाड़ फेंकनेका उपाय और अविद्यारूप कारणके अभावसे देह आदि कार्यके अभावका वर्णन ... ४६७ | ६८-सब कुछ ब्रह्म ही है—इसका प्रतिपादन ... ४९६ |
| ५८-जगत्के अत्यन्ताभावका, राजा शिखिध्वजको परम शान्तिकी प्राप्तिका तथा जाननेयोग्य परमात्माके स्वरूपका प्रतिपादन ... ४६९ | ६९-भृङ्गीशके प्रति महादेवजीके द्वारा महाकर्ता, महाभोक्ता और महात्यागीके लक्षणोंका निरूपण ४९७ |
| ५९-चित्त और संसारके अत्यन्त अभावका तथा परमात्माके भावका निरूपण ... ४७२ | ७०-सर्वथा विलीन हुए या विलीन होते हुए अहंकार-रूप चित्तके लक्षण ... ४९८ |
| ६०-ब्रह्मसे जगत्की पृथक् सत्ताका निषेध तथा जन्म आदि विकारोंसे रहित ब्रह्मकी स्वतः सत्ताका विधान ... ४७४ | ७१-महाराज मनुका इक्ष्वाकुके प्रति, 'मैं कौन हूँ, यह जगत् क्या है'—यह बताते हुए देहमें आत्मबुद्धिका परित्याग कर परमात्मभावमें स्थित होनेका उपदेश ... ४९९ |
| ६१-राजा शिखिध्वजकी ज्ञानमें दृढ़ स्थिति तथा जीवन्मुक्तिमें चित्तरहित्य एवं तत्त्वस्थितिका वर्णन ... ४७५ | ७२-सात भूमिकाओंका, जीवन्मुक्त महात्मा पुरुषके लक्षणोंका एवं जीवको संसारमें फँसानेवाली और संसारसे उद्धार करनेवाली भावनाओंका वर्णन करके मनु महाराजका ब्रह्मलोकमें जाना ... ५०० |
| ६२-कुम्भके अन्तर्हित हो जानेपर राजा शिखिध्वजका कुछ कालतक विचार करनेके पश्चात् समाधिस्थ होना, चूडालाका घर जाकर तीन दिनके बाद पुनः लौटना, राजाके शरीरमें प्रवेश करके उन्हें जगाना और राजाके साथ उसका वार्तालाप ... ४७७ | ७३-श्रीवसिष्ठजीके द्वारा श्रीरामचन्द्रजीके प्रति जीवन्मुक्त पुरुषकी विशेषता, रागसे बन्धन और वैराग्यसे मुक्ति तथा तुर्यपद और ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन ... ५०३ |
| ६३-कुम्भ और शिखिध्वजका परस्पर सौहार्द, चूडालाका राजासे आज्ञा लेकर अपने नगरमें आना और उदास-मन होकर पुनः राजाके पास लौटना, राजाके द्वारा उदासीका कारण पूछनेपर चूडालाद्वारा दुर्वासाके शापका कथन और चूडालाका दिनमें कुम्भरूपसे और रातमें स्त्रीरूपसे राजा शिखिध्वजके साथ विचरण ४८० | ७४-योगकी सात भूमिकाओंका अभ्यासक्रम और लक्षण, योगभ्रष्ट पुरुषकी गति एवं महान् |