भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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( १५ )

अनर्थकारिणी हथिनीरूप इच्छाके स्वरूप और उसके नाशके उपाय ... ... ५०५९-इन्द्र-कुलमें उत्पन्न हुए एक इन्द्रका विचार-दृष्टिसे परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार करके इस त्रिलोकीके इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित होना तथा अहंभावनाके निवृत्त होनेसे संसार-भ्रमके मूलोच्छेदका कथन ... ... ५२६
७५-भरद्वाज मुनिके उत्कण्ठापूर्वक प्रश्न करनेपर श्रीवाल्मीकिजीके द्वारा जगत्‌की असत्ता और परमात्माकी सत्ताका प्रतिपादन करते हुए कल्याणकारक उपदेश ... ... ५०९१०-शुद्ध चित्तमें थोड़ेसे ही उपदेशसे महान् प्रभाव पड़ता है, यह बतानेके लिये कहे गये भुशुण्डवर्णित विद्याधरके प्रसङ्गका उपसंहार, जीवन्मुक्त या विदेहमुक्तके अहंकारका नाश हो जानेसे उसे संसारकी प्राप्ति न होनेका कथन ... ... ... ५२७
७६-श्रीवाल्मीकिजीके द्वारा लय-क्रमका और भरद्वाजजीके द्वारा अपनी स्थितिका वर्णन, वाल्मीकिजीद्वारा मुक्तिके उपायोंका कथन, श्रीविश्वामित्रजीद्वारा भगवान् श्रीरामके अवतार ग्रहण करनेका प्रतिपादन एवं ग्रन्थश्रवणकी महिमा ... ... ५११११-मृत पुरुषके प्राणोंमें स्थित जगत्‌के आकाशमें भ्रमणका वर्णन तथा परब्रह्ममें जगत्‌की असत्ताका प्रतिपादन ... ... ५२८
निर्वाण-प्रकरण ( उत्तरार्ध )<br>१-कल्पना या संकल्पके त्यागका स्वरूप, कामना या संकल्पसे शून्य होकर कर्म करनेकी प्रेरणा, दृश्यकी असत्ता तथा तत्त्वज्ञानसे मोक्षका प्रतिपादन ... ... ... ५१६१२-जीवके स्वरूप, स्वभाव तथा विराट् पुरुषका वर्णन ... ... ... ५२९
२-समूल कर्मत्यागके स्वरूपका विवेचन ... ५१७१३-जगत्‌की सङ्कल्परूपता, अन्यथादर्शनरूप जीवभाव तथा अहम्भावरूप महाग्रन्थिके भेदनसे ही मोक्षकी प्राप्तिका कथन और ज्ञानबन्धुके लक्षणोंका वर्णन ... ... ५३०
३-संसारके मूलभूत अहंभावका आत्मबोधके द्वारा उच्छेद करके परमात्मस्वरूपसे स्थित होनेका उपदेश ... ... ५१८१४-ज्ञानीके लक्षण, जीवके बन्धन और मोक्षका स्वरूप, ज्ञानी और अज्ञानीकी स्थितिमें अन्तर, दृश्यकी असत्ता तथा परब्रह्मकी सत्ताका प्रतिपादन ... ... ५३१
४-उपदेशके अधिकारीका निरूपण करते हुए वसिष्ठजीके द्वारा भुशुण्ड और विद्याधरके संवादका उल्लेख—विद्याधरका इन्द्रियोंकी विषयपरायणताके कारण प्राप्त हुए दुःखोंका वर्णन करके उनसे अपने उद्धारके लिये प्रार्थना करना ... ... ५१९१५-मरुभूमिके मार्गमें मिले हुए महान् वनमें महर्षि वसिष्ठ और मङ्किका समागम एवं संवाद ... ... ... ५३३
५-भुशुण्डजीद्वारा विद्याधरको उपदेश—दृश्य-प्रपञ्चकी असत्ता बताते हुए संसार-वृक्षका निरूपण ... ... ५२२१६-मङ्किके द्वारा संसार, लौकिक सुख, मन, बुद्धि और तृष्णा आदिके दोषों तथा उनसे होनेवाले कष्टोंका वर्णन और वसिष्ठजीसे उपदेश देनेके लिये प्रार्थना ... ... ५३५
६-संसार-वृक्षके उच्छेदके उपाय, प्रतीयमान जगत्‌की असत्ता, ब्रह्ममें ही जगत्‌की प्रतीति तथा सर्वत्र ब्रह्मकी सत्ताका प्रतिपादन ... ५२३१७-संसारके चार बीजोंका वर्णन और परमात्माके तत्त्वज्ञानसे ही इन बीजोंके विनाशपूर्वक मोक्षका प्रतिपादन ... ... ५३६
७-चिन्मय परब्रह्मके सिवा अन्य वस्तुकी सत्ताका निराकरण, जगत्‌की निःसारता तथा सत्सङ्ग, सत्‌-शास्त्र-विचार और आत्मप्रयत्नके द्वारा अविद्याके नाशका प्रतिपादन ... ५२४१८-भावना और वासनाके कारण संसार-दुःखकी प्राप्ति तथा विवेकसे उसकी शान्ति, सर्वत्र ब्रह्मसत्ताका प्रतिपादन एवं मङ्किके मोहका निवारण ... ... ५३७
८-त्रसरेणुके उदरमें इन्द्रका निवास और उनके गृह, नगर, देश, लोक एवं त्रिलोकके साम्राज्यकी कल्पनाका विस्तार ... ५२५