संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
DevanagariHindipublished750 पृष्ठ
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( १४ )
| १९-आत्मा या ब्रह्मकी समता, सर्वरूपता तथा द्वैतशून्यताका प्रतिपादन, जीवात्माकी ब्रह्म-भावनासे संसार-निवृत्तिका वर्णन ... ५३८ | ३२-वैराग्यके दृढ़ हो जानेपर पुरुषकी स्थिति, आत्माद्वारा विवेक नामक दूतका भेजा जाना, विवेकज्ञानसम्पन्न पुरुषकी महिमा तथा जीवके सात रूपोंका वर्णन ... ५६४ |
| २०-परमार्थ-तत्त्वका उपदेश और स्वरूपभूत परमात्म-पदमें प्रतिष्ठित रहते हुए व्यवहार करते रहनेका आदेश देते हुए वसिष्ठजीका श्रीरामके प्रश्नोंका उत्तर देना तथा संसारी मनुष्योंको आत्मज्ञान एवं मोक्षके लिये प्रेरित करना ... ५३९ | ३३-दृश्य जगत्की असत्ता, सबकी एकमात्र ब्रह्म-रूपता तथा तत्त्वज्ञानसे होनेवाले लाभका वर्णन ५६६ |
| २१-निर्वाणकी स्थितिका तथा 'मोक्ष स्वाधीन है' इस विषयका सयुक्तिकं वर्णन ... ५४२ | ३४-सृष्टिकी असत्यता और एकमात्र अखण्ड ब्रह्म-सत्ताका प्रतिपादन ... ५६७ |
| २२-जीवकी बहिर्मुखताके निवारणसे भ्रान्तिकल्पना-के निवर्तक उपाय तथा परलोककी चिकित्साका वर्णन ... ५४४ | ३५-परमात्मामें सृष्टिभ्रमकी असम्भवता, पूर्णब्रह्मके स्वरूपका निरूपण तथा सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन ... ५६८ |
| २३-जगत्के स्वरूपका विवेचन और ब्रह्मके स्वरूपका सविस्तर वर्णन ... ५४६ | ३६-ब्रह्ममें ही जगत्की कल्पना तथा जगत्का ब्रह्मसे अभेद, पाषाणोपाख्यानका आरम्भ—वसिष्ठजीका लोकगतिसे विरक्त हो सुदूर एकान्तमें कुटी बनाकर सौ वर्षोंतक समाधि लगाना ... ५७० |
| २४-जीवन्मुक्तिकी प्रशंसा तथा इच्छा ही बन्धन है और इच्छाका त्याग ही मुक्ति है, इसका सविस्तर वर्णन और उससे छूटनेके उपायका निरूपण ... ५४८ | ३७-अहंकाररूपी पिशाचकी शान्तिका उपाय—सृष्टिके कारणका अभाव होनेसे उसकी असत्ता तथा चिन्मय ब्रह्मकी ही सृष्टिरूपताका प्रतिपादन ... ५७१ |
| २५-तत्त्वज्ञान हो जानेपर इच्छा उत्पन्न होती ही नहीं और यदि कहीं उत्पन्न होती-सी दीखे तो वह ब्रह्मस्वरूप होती है—इसका सयुक्तिक वर्णन ... ५५० | ३८-समाधिकालमें वसिष्ठजीके द्वारा अनन्त चेतनाकाशमें असंख्य ब्रह्माण्डोंका अवलोकन ... ५७२ |
| २६-चेतन ही जगत् है—इसका तथा तत्त्वज्ञानी और जगत्के स्वरूपका वर्णन ... ५५२ | ३९-श्रीवसिष्ठजीका समाधिकालमें अपनी स्तुति करनेवाली स्त्रीका अवलोकन और उसकी उपेक्षा करके अनेक विचित्र जगत्का दर्शन करना तथा महाप्रलयके समय सब जीवोंके प्रकृति-लीन हो जानेपर पुनः किसको सृष्टिका ज्ञान होता है, श्रीरामके इस प्रश्नका उत्तर देना ... ५७३ |
| २७-जीवन्मुक्तके द्वारा जगत्के स्वरूपका ज्ञान, स्वभावका लक्षण तथा विश्व और विश्वेश्वरकी एकता और स्वात्मभूत परमेश्वरकी पूजाका वर्णन ५५३ | ४०-वसिष्ठजीके द्वारा चिदाकाशरूपसे देखे गये जगतोंकी अपनेसे अभिन्नताका कथन, आर्यापाठ करनेवाली स्त्रीके कार्य तथा सम्भाषण आदिके विषयमें श्रीरामके प्रश्न और वसिष्ठजीके उत्तर-का वर्णन ... ५७५ |
| २८-जगत्की असारताका निरूपण करके तत्त्वज्ञानसे उसके विनाशका वर्णन ... ५५५ | ४१-स्वप्नजगत्की भी ब्रह्मरूपता एवं सत्यताका प्रतिपादन ... ५७७ |
| २९-प्राणियोंके श्रान्त हुए मनरूपी मृगके विश्रामके लिये समाधिरूपी कल्पद्रुमकी उपयोगिताका वर्णन ... ५५७ | ४२-श्रीवसिष्ठजीके पूछनेपर विद्याधरीके द्वारा अपने जीवन-वृत्तान्तका वर्णन, अपनी युवावस्थाके व्यर्थ बीतनेका उल्लेख ... ५७८ |
| ३०-जीवात्माके ध्यान-वृक्षपर चढ़नेका और वास्तविक फलकी प्राप्तिका वर्णन ... ५६० | ४३-विद्याधरीका वैराग्य और अपने तथा पतिके लिये तत्त्वज्ञानका उपदेश देनेके हेतु उसकी वसिष्ठ मुनिसे प्रार्थना ... ५८० |
| ३१-ध्यानरूपी कल्पद्रुमके फलके आस्वादनसे मनकी स्थितिका तथा मुक्तिके विभिन्न साधनोंका वर्णन ... ५६१ |