संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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४४- श्रीवसिष्ठजीका विद्याधरीके साथ लोकालोक पर्वतपर पाषाणशिलाके पास पहुँचना; उस शिलामें उन्हें विद्याधरीकी बतायी हुई सृष्टिका दर्शन न होना, विद्याधरीका इसमें उनके अभ्यासाभावको कारण बताकर अभ्यासकी महिमाका वर्णन करना .. · ५८१
४५- श्रीवसिष्ठजीके द्वारा आतिवाहिक शरीरमें आधिभौतिकताके भ्रमका निराकरण ५८४
४६- विद्याधरीका पाषाण-जगत्के ब्रह्माजीको ही अपना पति बताना और उन्हें समाधिसे जगाना, उनके और देवतादिके द्वारा वसिष्ठजीका स्वागत-सत्कार, वसिष्ठजीके पूछनेपर ब्रह्माजीका उन्हें अपने यथार्थ स्वरूपका परिचय देना और उस कुमारी नारीको वासनाकी देवी बताना... ५८५
४७- पाषाण-जगत्के ब्रह्माद्वारा वासनाकी क्षयोन्मुखता एवं आत्मदर्शनकी इच्छा बताकर शिलाकी चितिरूपता तथा जगत्की परमात्मसत्तासे अभिन्नताका प्रतिपादन करके वसिष्ठजीको अपने जगत्में जानेके लिये प्रेरित करना .. ५८७
४८- पाषाण-शिलाके भीतर बसे हुए ब्रह्माण्डके महाप्रलयका वर्णन तथा ब्रह्माके सङ्कल्पके उपसंहारसे सम्पूर्ण जगत्का संहार क्यों होता है, इसका विवेचन .. ५८८
४९- ब्रह्मा और जगत्की एकताका स्थापन तथा द्वादश सूर्योंके उदयसे जगत्के प्रलयका रोमाञ्चकारी वर्णन ... .. ५९०
५०- प्रलयकालके मेघोंद्वारा भयानक वृष्टि होनेसे एकार्णवकी वृद्धि तथा प्रलयाग्निका बुझ जाना ... ... ५९२
५१- बढ़ते हुए एकार्णवका तथा परिवारसहित ब्रह्माके निर्वाणका वर्णन ... ... ५९३
५२- ब्रह्मलोकवासियों तथा द्वादश सूर्योंका निर्वाण, अहंकाराभिमानी रुद्रदेवका आविर्भाव, उनके अवयवों तथा आयुधका विवेचन, उनके द्वारा एकार्णवके जलका पान तथा शून्य ब्रह्माण्डकी चेतनाकाशरूपताका प्रतिपादन .. ५९५
५३- रुद्रकी छायारूपिणी कालरात्रिके स्वरूप तथा ताण्डव-नृत्यका वर्णन ... ... ५९७
५४- रुद्र और काली आदिके रूपमें चिन्मय परमात्मसत्ताकी ही स्फूर्तिका प्रतिपादन तथा सच्चिदानन्दघनका विलास ही रुद्रदेवका नृत्य है—इसका कथन ... ... ५९९
५५- शिव और शक्तिके यथार्थ स्वरूपका विवेचन .. ६००
५६- प्रकृतिरूपा कालरात्रिके परमतत्त्व शिवमें लीन होनेका वर्णन ... ६०२
५७- रुद्रदेवका ब्रह्माण्डखण्डको निगलकर निराकार चिदाकाशरूपसे स्थित होना तथा वसिष्ठजीका उस पाषाणशिलाके अन्य भागमें भी नूतन जगत्को देखना और पृथ्वीकी धारणाके द्वारा पार्थिव जगत्का अनुभव करना · ६०३·
५८- श्रीवसिष्ठजीके द्वारा जल और तेजस्-तत्त्वकी धारणासे प्राप्त हुए अनुभवका उल्लेख ... ६०४
५९- धारणाद्वारा वायुरूपसे स्थित हुए वसिष्ठजीका अनुभव ... ६०६
६०- कुटीमें लौटनेपर वसिष्ठजीको अपने शरीरकी जगह एक ध्यानस्थ सिद्धका दर्शन, उनके सङ्कल्पकी निवृत्तिसे कुटीका उपसंहार, सिद्धका नीचे गिरना और वसिष्ठजीसे उसका अपने वैराग्यपूर्ण जीवनका वृत्तान्त बताना ... ६०७
६१- श्रीवसिष्ठजी और सिद्धका आकाशमें अभीष्ट स्थानोंको जाना, वसिष्ठजीका मनोमय देहसे सिद्धादि लोकोंमें भ्रमण करना, श्रीवसिष्ठजीका अपनी सत्यसङ्कल्पताके कारण सबके दृष्टिपथमें आना, व्यवहारपरायण होना तथा 'पार्थिव वसिष्ठ' आदि संज्ञाओंको प्राप्त करना, पाषाणोपाख्यानकी समाप्ति और सबकी चिन्मय ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन ... ... ६११
६२- परमपदके विषयमें विभिन्न मतवादियोंके कथनकी सत्यताका प्रतिपादन ... ६१४
६३- तत्त्वज्ञानी संतोंके शील-स्वभावका वर्णन तथा सत्सङ्गका महत्त्व .. ६१५
६४- सत्का विवेचन और देहात्मवादियोंके मतका निराकरण ... . ६१६
६५- सबकी चिन्मात्ररूपताका निरूपण तथा ज्ञानी महात्माके लक्षणोंका वर्णन ... ... ६१७
६६- इस शास्त्रके विचारकी आवश्यकता तथा इससे होनेवाले लाभका प्रतिपादन, वैराग्य