संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
DevanagariHindipublished750 पृष्ठ
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( १६ )
| और आत्मबोधके लिये प्रेरणा तथा विचारद्वारा वासनाको क्षीण करनेका उपदेश ... ६२० | ८०—श्रीवसिष्ठजीके ध्यानसे उत्पन्न हुई अग्निमें मृगके प्रवेशका तथा उसके विपश्चित्-देहकी प्राप्तिका वर्णन ... ६४१ |
| ६७—मोक्षके स्वरूप तथा जाग्रत् और स्वप्नकी समताका निरूपण ... ६२१ | ८१—प्राणियोंकी उत्पत्तिके दो भेद, मच्छरके मृग-योनिसे छूटकर व्याघ्ररूपसे उत्पन्न होनेपर उसे एक मुनिका ज्ञानोपदेश ... ६४३ |
| ६८—चिदाकाशके स्वरूपका प्रतिपादन तथा जगत्की चिदाकाशरूपताका वर्णन ... ६२२ | ८२—पाण्डित्यकी प्रशंसा, चित् ही जगत् है—इसका युक्तिपूर्वक समर्थन ... ६४५ |
| ६९—राजा विपश्चित्के सामन्तोंका वध, उत्तर दिशाके सेनापतिका घायल होकर आना तथा शत्रुओंके आक्रमणसे राजपरिवार और प्रजामें घबराहट ... ६२३ | ८३—मुनिका व्याघ्रके प्रति बहुतसे प्राणियोंको एक साथ सुख-दुःखकी प्राप्तिके निमित्तका निरूपण करना ... ६४६ |
| ७०—राजा विपश्चित्का अपने मस्तककी आहुतिसे अग्निदेवको संतुष्ट करके चार दिव्य रूपोंमें प्रकट होना ... ६२५ | ८४—मुनिके उपदेशसे आत्मज्ञानकी प्राप्ति, पूर्वदेहमें गमनकी असमर्थताके विषयमें प्रश्न करनेपर देह आदिके भस्म होनेके प्रसङ्गमें मुनिके आश्रम और दोनों शरीरोंके जलने तथा वायुद्वारा उस अग्निके शान्त होनेका वर्णन ... ६४८ |
| ७१—चारों विपश्चितोंका शत्रुओंके साथ युद्ध, भागती हुई शत्रुसेनाका पीछा करते हुए उनका समुद्र-तटतक जाना ... ६२६ | ८५—व्याध और उस मुनिके वार्तालापके प्रसङ्गमें जीवन्मुक्त ज्ञानीके स्वरूपका वर्णन तथा अभ्यास-की प्रशंसा ... ६५० |
| ७२—विपश्चित्के अनुचरोंका उन्हें आकाश, पर्वत, पर्वतीय ग्राम, मेघ, कुत्ते, कौए और कोकिल आदिको दिखाकर अन्योक्तियोंद्वारा विशेष अभिप्राय सूचित करना ... ६२७ | ८६—मुनिको परमपदकी प्राप्ति, व्याधके महाशवका वर्णन, अग्निका स्वर्गलोक-गमन, भासद्वारा आत्मकथा-का वर्णन तथा बहुतसे आश्चर्योंका वर्णन करके आत्मतत्त्वका निरूपण ... ६५२ |
| ७३—सरोवर, भ्रमर और हंसविषयक अन्योक्तियाँ ... ६३१ | ८७—राजा दशरथका विपश्चित्को पुरस्कार देनेकी आज्ञा देते हुए सभाको विसर्जित करना, दूसरे दिन सभामें वसिष्ठजीद्वारा कथाका आरम्भ, ब्रह्मके वर्णनद्वारा अविद्याके निराकरणके उपाय, जितेन्द्रियकी प्रशंसा और इन्द्रियोंपर विजय पाने-की युक्तियाँ ... ६५४ |
| ७४—बगुले, जलकाक, मोर और चातकसे सम्बन्ध रखनेवाली अन्योक्तियाँ ... ६३२ | ८८—दृश्यजगत्की चैतन्यरूपता, अनिर्वचनीयता, असत्ता तथा ब्रह्मसे अभिन्नताका प्रतिपादन ... ६५७ |
| ७५—वायु, ताड़, पलाश, कनेर, कल्पवृक्ष, वनस्थली और चम्पकवनका वर्णन करते हुए सहचरोंका महाराजसे राजाओंकी भेंट स्वीकार करके उन्हें विभिन्न मण्डलोंकी शासनव्यवस्था सौंपनेके लिये अनुरोध करना तथा विपश्चितों-का अग्निसे वरदान प्राप्त करके दृश्यकी अन्तिम सीमा देखनेके लिये उद्यत होना ... ६३३ | ८९—जीवन्मुक्त तथा परमात्मामे विश्रान्त पुरुषके लक्षण तथा आत्मज्ञानीके सुखपूर्वक शयनका कथन ६५८ |
| ७६—चारों विपश्चितोंका समुद्रमें प्रवेश और प्रत्येक दिशामें उनकी पृथक्-पृथक् यात्राका वर्णन ... ६३५ | ९०—जीवन्मुक्तके स्वकर्म नामक मित्रके स्त्री, पुत्र आदि परिवारका परिचय तथा उस मित्रके साथ रहनेवाले उस महात्माके स्वभावसिद्ध गुणोंका उल्लेख, तत्त्वज्ञानीकी स्थिति, जगत्की ब्रह्मरूपता तथा समस्तवादियोंके द्वारा ब्रह्मके ही प्रति-पादनका कथन ... ६५९ |
| ७७—विपश्चितोंके विहारका तथा जीवन्मुक्तोंकी सर्वात्मरूप स्थितिका वर्णन ... ६३६ | |
| ७८—मरे हुए विपश्चितोंके संसार-भ्रमणका तथा उत्तर दिशागामी विपश्चित्के भ्रमणका विशेष रूपसे वर्णन ... ६३८ | |
| ७९—शेष दो विपश्चितोंके वृत्तान्तका वर्णन तथा मृगरूपमें श्रीरामचन्द्रजीको प्राप्त हुए एक विपश्चित्का राजसभामें लाया जाना ... ६४० |