संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 222, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति-प्रकरण ] * जगत्की ब्रह्मसे पृथक् सत्ताका खण्डन और भेदकी व्यावहारिकताका प्रतिपादन * १८५
उसी प्रकार अणुसे भी अणु परमात्माने अपने स्वरूपमें इस जगत्रूपी अणुको अनेक बार उत्पन्न और विलीन किया है। जैसे बीजके भीतर फल और पल्लवोंसहित समूचे वृक्षका विस्तार निहित है और वह अत्यन्त सूक्ष्म दृष्टिसे देखा जाता है, उसी तरह चेतन परमात्मामें अनेक शाखा-प्रशाखाओंसे युक्त जगत् स्थित है और वह परमार्थ-दृष्टिसे उन्हींमें देखनेमें आता है (इसलिये जगत् वास्तवमें परमात्मासे अभिन्न ही है)। जैसे बीजके भीतर अपने शाखा, फल, फूल आदिका त्याग न करता हुआ वृक्ष स्थित है, वैसे ही चेतन परमात्मामें यह शाखा-प्रशाखाओं-सहित विशाल जगत् विद्यमान है। जैसे बीजके भीतर वृक्ष है, उसी प्रकार चेतन परमात्माके भीतर स्थित हुए द्वैतरूप जगत्को जो अद्वैत देखता है, उसीका देखना तत्त्वदर्शन है। वास्तवमें तो न द्वैत है न अद्वैत; न बीज है न अङ्कुर; न स्थूल है न सूक्ष्म; न जात है न अजात; न सत्ता है न असत्ता और न यह सौम्य है न क्षुब्ध। उस चेतन परमात्माके भीतर तीनों लोक, आकाश और वायु आदि भी कुछ नहीं हैं। न जगत् है, न उसका अभाव। केवल एक सर्वोत्कृष्ट उत्तम चेतन परमात्मा ही है।
( सर्ग ८०-८३ )
जगत्की ब्रह्मसे पृथक् सत्ताका खण्डन, भेदकी व्यावहारिकता तथा चित्तकी ही दृश्यरूपताका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! परमकारणभूत, आदि, अन्त और मध्यसे रहित, एक परमपदसे यद्यपि यह जगत् उत्पन्न नहीं हुआ है, तथापि उत्पन्न हुआ-सा प्रतीत होता है। जैसे जलराशिमें उठती हुई तरङ्गें जलसे भिन्न न होकर भी भिन्न-सी स्थित हैं, उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मामें सारी सृष्टियाँ अभिन्न होकर भी भिन्न-सी जान पड़ती हैं। जो नित्य उदित एवं नित्य प्रतिष्ठित है, वह ब्रह्म ही कर्ता-सा होकर इस जगत्का अनेक रूपोंमें निर्माण करता है। फिर भी वह अपनी समता और सौम्यता आदिका त्याग नहीं करता। जैसे बीजमें वृक्ष एवं फल आदि अभिन्नरूपसे ही स्थित हैं, तथापि वे उससे इस तरह प्रकट होते हैं मानो भिन्न हों, उसी तरह चेतन परमात्मामें यह चेत्य (स्थूलजगत्) अनन्य-भावसे स्थित होनेपर भी अन्य-सा प्रकट हुआ प्रतीत होता है। जैसे बीजसे लेकर फलपर्यन्त जो एक ही द्रव्य-सत्ता है, उसका विच्छेद न होनेके कारण फल और बीजमें कोई भेद नहीं है, जैसे जल और तरङ्गमें कोई भेद नहीं है, उसी प्रकार चित् और चेत्य (ब्रह्म और जगत्) में कोई भेद नहीं है। अविचार (विवेक-शून्यता) के कारण जो इनमें भेदकी कल्पना की जाती है, उसकी सिद्धि नहीं हो सकती; क्योंकि जिस किसी कारणसे भ्रान्तिवश उत्पन्न हुआ भेद विचारसे नष्ट हो जाता है। सारा जगत् ब्रह्मसे ही उत्पन्न हुआ है और सब-का-सब ब्रह्ममें ही लीन होता है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! 'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः' ( निश्चय ही सर्वत्र प्रसिद्ध इस परमात्मासे पहले-पहल आकाश-तत्त्व उत्पन्न हुआ ) इत्यादि श्रुतियोंमें जो 'तस्माद्' आदि पदोंमें पञ्चमी विभक्ति है, वह भेदका प्रतिपादन करनेवाली है अर्थात् जो वस्तु जिससे उत्पन्न होती है, वह उससे भिन्न है—इस बातको सूचित करती है। ऐसी दशामें आप यह कैसे समझते हैं कि देवेश्वर परमात्मासे उत्पन्न हुआ यह सारा जगत् उससे अभिन्न है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! उपदेशके लिये जो शास्त्रीय शब्द है अथवा लोकसिद्ध अर्थजनित व्यावहारिक भेदका उपपादक जो लौकिक-शब्द है, वह प्रतियोगी, व्यवच्छेद (अभाव), संख्या, लक्षण और पक्षसे युक्त होता है। जो भेद दिखायी देता है, यह व्यवहारदृष्टिसे