संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
ही है, वास्तविक नहीं। अज्ञानियोंको समझानेके लिये ही कार्य-कारणभाव, सेवक-स्वामिभाव, हेतु-हेतुमद्भाव अवयवावयविभाव, भेदाभेद अथवा अन्वयव्यतिरेक, परिणाम आदिका विश्रम, भावोंके विचित्र विलास, विद्या-अविद्या और सुख-दुःखइत्यादि रूपसे मिथ्या संकल्पोंकी संकलना की गयी है। वास्तवमें जो सत्य वस्तु है, उसमें कोई भेद नहीं है। यह भेदवाद परम तत्त्वको न समझनेके कारण ही है। परमार्थ वस्तुके ज्ञात हो जानेपर द्वैत नहीं रह जाता। उस समय सारी कल्पनाएँ अथवा संकलनाएँ शान्त हो जाती हैं। फिर तो मौनस्वरूप परमार्थ-तत्त्व ही शेष रहता है। वह परमतत्त्व परमात्मा आदि और अन्तसे रहित, अविभक्त, एक, अखण्ड और सर्वरूप है। जिन्हें तत्त्वका ज्ञान नहीं हुआ है, ऐसे अज्ञ पुरुष अपने विकल्पोंसे उत्पन्न हुए तर्कोंद्वारा अद्वैतके विषयमें विवाद करते हैं। उपदेशसे तत्त्वज्ञान प्राप्त हो जानेपर यह वाद और द्वैत नहीं रह जाता। द्वैतके बिना वाच्य-वाचकका बोध नहीं सिद्ध होता। परंतु द्वैत किसी तरह भी सम्भव नहीं है। इसलिये मौनरूप परमात्मा ही पूर्णतया सिद्ध होता है।
रघुनन्दन ! 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्योंके अर्थमें अपनी बुद्धिको प्रतिष्ठित करके वचनभेदकी उपेक्षा कर दो और जो मैं कहता हूँ, इसे ध्यान देकर सुनो। चित्त ही विकासरूपसे जगत्को प्राप्त हुआ है। जैसे बालूके भीतर तेल नहीं है, उसी तरह ब्रह्ममें शरीर आदिकी सत्ता नहीं है। राग-द्वेष आदि क्लेशोंसे कलुषित यह चित्त ही संसार है। उन राग आदि दोषोंसे जभी छुटकारा मिल जाता है, तभी इस संसार-बन्धनका नाश हो गया, —यह कहा जाता है। चित्त ही साधन, पालन, विचार श्रेष्ठ पुरुषकी भाँति कर्तव्यका अनुष्ठान, आहार-व्यवहार, संचरण और आदरपूर्वक धारण करनेके योग्य है। तीनों लोकोंकी कल्पनाका आकाशरूप चित्त सम्पूर्ण दृश्यको अपने भीतर धारण करता है। सृष्टिके आरम्भमें पृथ्वी-आदिरूप यह सारा प्रपञ्च अविद्यमान—असत् ही था। अव्यक्तरूप अजन्मा ब्रह्म स्वप्नके समान इसे देखता हुआ भी वास्तवमें नहीं देखता। हृदयंगम दृष्टान्त और युक्तिसे तथा मधुर एवं युक्तियुक्त पदार्थवाली वाणीसे जो कुछ कहा जाता है, वह श्रोताके हृदयमें उसकी शङ्काको दूर करके सब ओर व्याप्त हो जाता है—ठीक उसी तरह, जैसे जलमें डाला हुआ तेल उसमें सब ओर फैल जाता है। जिसमें दृष्टान्त और मनोहर पद नहीं होते, जो दुर्बोध होता है, जिससे क्षोभ प्रकट होता है तथा जिसका प्रत्येक अक्षर अपने स्थानसे च्युत होता है और जिसके कई वर्ण मुँहमें ही रह जाते हैं---स्पष्टतः उच्चारित नहीं होते, ऐसा उपदेशवाक्य श्रोताके हृदयतक नहीं पहुँच पाता। वह राखमें आहुतिके रूपमें डाले गये घीके समान व्यर्थ हो जाता है। साधो! इस भूतलपर जो-जो महाभारत आदि आख्यान तथा छोटी-छोटी कथाएँ हैं, जो-जो प्रमाणोंद्वारा जाननेयोग्य प्रमेय ग्रन्थ हैं, जो औचित्यसे युक्त तथा शब्द और अर्थ दोनों ही दृष्टियोंसे मधुर एवं कोमल हैं, वे सभी लोकप्रसिद्ध दृष्टान्तों तथा प्रमाणयुक्त दर्शनोंके प्रतिपादनपूर्वक वर्णित होनेपर उसी प्रकार श्रोताके हृदयमें शीघ्र प्रकाशित हो जाते हैं, जैसे श्वेत किरणवाले चन्द्रमाके प्रकाशसे सारा विश्व प्रकाशित हो उठता है।
(सर्ग ८४)
यह दृश्य-प्रपञ्च मनका विलासमात्र है, इसका ब्रह्माजीके द्वारा अपने अनुभवके अनुसार प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं — निष्पाप रघुनन्दन ! पूर्व-कालमें ब्रह्माजीने मुझे जो उपदेश दिया था, वह सब उनकी कही हुई कथाके साथ मैं तुम्हें बता रहा हूँ। पहलेकी बात है, मैंने कमलयोनि भगवान् ब्रह्माजीसे पूछा—'ब्रह्मन् !