भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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१८८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ कान्तिवाली, तीन प्रवाहवाली तथा ऊपर-नीचे एवं मध्य —तीन मार्गोंपर विचरनेवाली गङ्गा जगद्रूपी पुरुषके यज्ञो- पवीतकी भाँति सुशोभित हो रही थीं। दिशारूपी लताओंमें विद्युद्रूपी फूलोंसे युक्त मेघरूपी पल्लव वायुसे टकराकर इधर-उधर झोंके खाते, बिखर जाते और फिर नये पैदा हो जाते थे। विभिन्न भुवनोंके भीतर समूह-के-समूह बसे हुए देवता, असुर, मनुष्य और नाग गूलरके फलोंमें रहनेवाले मच्छरोंके समान जान पड़ते थे। उन लोकोंमें युग, कल्प, क्षण, लव, कला और काष्ठा आदिसे युक्त एवं सबके अतर्कित विनाशकी प्रतीक्षा करनेवाला काल प्रवाहरूपसे स्थित था। अपने शुद्ध एवं उत्तम चित्तके द्वारा ऐसा दृश्य देखकर मैं बड़े विस्मयमें पड़ गया कि यह क्या है और कैसे प्रकट हुआ है। इस स्थूल नेत्रसे जो मुझे कुछ भी नहीं दिखायी देता, उसी अनुपम मायाजालको मैं मनसे आकाशमें स्पष्ट देख रहा हूँ-यह कैसे सम्भव हुआ है ? उसके बाद देरतक उस मायाजालको देखनेके पश्चात् मैंने मनसे ही उस ब्रह्माण्डके आकाशसे एक सूर्यको अपने समीप बुलाकर पूछा- 'देवदेवेश्वर ! महातेजस्वी सूर्य ! आओ, तुम्हारा स्वागत है' यों कहकर मैंने पहले तो उनका स्वागत किया। फिर उनके सामने अपना प्रश्न इस प्रकार रखा- 'भगवन् ! तुम कौन हो ? तुम्हारा यह जगत् कैसे उत्पन्न हुआ ? इसके अतिरिक्त जो और जगत् दिखायी देते हैं, इनकी उत्पत्ति भी किस प्रकार हुई है ? निष्पाप देव ! यदि जानते हो तो यह सब बताओ।' मेरे इस प्रकार पूछनेपर उन्होंने मेरी ओर देखा और पहचान लिया। फिर मुझे नमस्कार करके उत्तम पदोंसे युक्त वाणीद्वारा इस प्रकार कहा । सूर्य बोले-जगदीश्वर ! आप इस दृश्य-प्रपञ्चके नित्य कारण हैं, फिर भी इसे जानते कैसे नहीं ? और यदि जानते हैं तो मुझसे पूछते क्यों हैं ? सर्वव्यापी देव ! यदि मेरी बातें सुननेके लिये आपके मनमें कौतूहल हो तो सुनिये। महात्मन् ! आप परम महान् परमात्मा हैं (आपसे कुछ भी अज्ञात नहीं है)। 'सत्-असत्' का बोध न होनेसे जो मोहमें डालनेवाली हैं तथा जिनसे अनवरत नाना प्रकारकी सृष्टियाँ होती रहती हैं, उन सदसत् कलाओं (संकल्पों) से जो विस्तारको प्राप्त हुआ है, वह मन ही यहाँ विविध पदार्थोंके रूपमें विलसित हो रहा है। तात्पर्य यह कि यह सारा दृश्य-प्रपञ्च मनका ही विलास या संकल्प है। (सर्ग ८५-९१) स्थूल-शरीरकी निन्दा, मनोमय शरीरकी विशेषता, उसे सत्कर्ममें लगानेकी प्रेरणा, ब्रह्मा और उनके द्वारा निर्मित जगत्की मनोमयता, जीवका स्वरूप और उसकी विविध सांसारिक गति तथा सृष्टिके दोष एवं मिथ्यात्वका उपदेश श्रीवसिष्ठजी कहते हैं- रघुनन्दन ! इस संसारमें ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त सभी जातिके प्राणियोंके सदा दो-दो शरीर होते हैं। एक तो मनोमय शरीर होता है, जो शीघ्रतापूर्वक सब कार्य करनेवाला और सदा चञ्चल है। दूसरा मांसका बना हुआ स्थूलशरीर है, जो मनके बिना कुछ नहीं कर सकता। उक्त दोनों शरीरोंमेंसे जो मांसमय स्थूलशरीर है, वह सभी लोगोंको प्रत्यक्ष दिखायी देता है। उसीपर सब प्रकारके शापों, विद्याओं (आभि- चारिक कृत्यों) तथा विष, शस्त्र आदि विनाशके साधन- समूहोंका आक्रमण होता है। यह मांसमय शरीर असमर्थ, दीन, क्षणभङ्गुर, कमलके पत्तेपर पड़े हुए जलके समान चञ्चल तथा प्रारब्ध आदिके अधीन है। देहधारियोंका जो यह मन नामक दूसरा शरीर है, वह तीनों लोकोंमें प्राणियोंके अधीन होकर भी प्रायः अधीन नहीं रहता