संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति-प्रकरण ] * स्थूलशरीरकी निन्दा, मनोमय शरीरकी विशेषता, उसे सत्कर्ममें लगानेकी प्रेरणा * १८९ वह यदि सदा बने रहनेवाले धैर्यका अवलम्बन करके अपने पौरुषके सहारे स्थित होता है, तो दुःखोंकी पहुँचसे बाहर हो जाता है-दुःखके हेतुभूत जो दोष हैं, वे उसे दूषित नहीं करते । प्राणियोंका मनोमय शरीर जैसे-जैसे चेष्टा करता है, वैसे-ही-वैसे वह अपने निश्चयके एकमात्र फलका भागी होता है । मांसमय देह (पाञ्चभौतिक स्थूलशरीर ) का कोई भी पौरुष-क्रम सफल नहीं होता, परंतु मनोमय शरीरकी प्रायः सभी चेष्टाएँ सफल होती हैं ( क्योंकि मन ही प्रधान है ) । माण्डव्य ऋषिने मानसिक पुरुषार्थसे मनको रागरहित और दुःखशून्य बना शूलीपर चढ़कर भी सम्पूर्ण क्लेशोंपर विजय प्राप्त कर ली थी ।* अन्धकारपूर्ण कुएँमें गिरे होनेपर भी दीर्घतपा ऋषिने मानसिक यज्ञोंका ही अनुष्ठान करके देवताओंका पद (स्वर्गलोक) प्राप्त कर लिया था । दूसरे भी जो सावधान धीर देवता और महर्षि हैं, वे मनसे की जानेवाली उपासना अथवा ध्यानका तनिक भी त्याग नहीं करते । संसारमें सावधान चित्तवाला कोई भी पुरुष कभी स्वप्न अथवा जागरणमें भी दोष-समूहोंसे थोड़ा-सा भी अभिभूत नहीं होता । इसलिये पुरुषको चाहिये कि वह इस संसारमें पुरुषार्थके साथ अपनी बुद्धिके द्वारा ही अपने मनको पवित्र मार्गमें लगाये । जैसे कुम्हारके घट-निर्माण-सम्बन्धी व्यापारके अनन्तर घड़ा अपने मृत्पिण्डावस्थाको त्याग देता है, उसी प्रकार पुरुष उत्तर पदार्थकी वासनाके पश्चात् पूर्वकी स्थितिका त्याग कर देता है ( तात्पर्य यह है कि आगेकी दृढ़ वासनासे पिछली वासना नष्ट हो जाती है ) । श्रीवसिष्ठजी कहते हैं- रघुनन्दन ! भगवान् ब्रह्माने पूर्वकालमें मुझसे ये बातें कही थीं, उन्हींका आज मैंने तुम्हारे समक्ष वर्णन किया है। नाम और रूपसे रहित उस सर्वात्मा ब्रह्मसे सम्पूर्ण प्रपञ्च उत्पन्न होता है। वह समय पाकर स्वयं ही घनताको प्राप्त हो संकल्प-विकल्परूप मनकी सामर्थ्यसे मनोरूप बन जाता है । इसलिये श्रीराम ! जो ये परमेष्ठी ब्रह्मा हैं, इन्हें तुम परमात्माका समष्टि मन ही समझो । समष्टि मनरूप तत्त्व ही जिनका आकार है, वे भगवान् ब्रह्मा संकल्पमय होनेके कारण जिस वस्तुका संकल्प करते हैं, उसीको देखते हैं । तदनन्तर उन्होंने इस अविद्याकी कल्पना की। अनात्मामें आत्माका अभिमान होना ही इस अविद्याका स्वरूप है । फिर उन ब्रह्माने क्रमशः पर्वत, तृण और समुद्ररूप इस जगत्की कल्पना की । इस प्रकार यद्यपि क्रमशः परब्रह्म-तत्त्वसे यह सृष्टि आयी है, तथापि कुछ लोगोंको यह और ही किसीसे उत्पन्न हुई दिखायी देती है । अतः श्रीराम ! तीनों लोकोंके भीतर वर्तमान सम्पूर्ण पदार्थोंकी उत्पत्ति ब्रह्मासे ही हुई है-ठीक उसी तरह, जैसे तरङ्गोंकी उत्पत्ति समुद्रसे होती है । जो अन्य व्यष्टि-चेतन शक्तियाँ अर्थात् प्राणी हैं, वे सब वास्तवमें सर्वशक्तिमान् ब्रह्मसे अभिन्न ही हैं-साक्षात् ब्रह्मस्वरूप ही हैं। जब यह जगत् विस्तारको प्राप्त होता है, तब वे ही प्राणी समष्टि-मनरूप ब्रह्मासे पूर्वकर्मानुसार विकासको प्राप्त होते हैं । ये सब सहस्रो व्यष्टि चेतन संसरणशील जीव कहे जाते हैं । वे जीव सच्चिदानन्दघन परमात्मासे ही प्रकट होकर आकाशमें तन्मात्राओंके साथ संयुक्त होते हैं । फिर आकाशस्थित वायुओंके मध्यवर्ती जो चौदह श्रेणियोंमें विभक्त जीव हैं, उनमेंसे जिस प्रकारकी जीव-जातिमें रहनेसे जो जीव जैसी वासना और कर्मके अभ्यासमें प्रवृत्त होते हैं, उसी जीव-जातिकी प्राणशक्तिद्वारा वे स्थावर अथवा जङ्गम शरीरमें प्रविष्ट हो रज-वीर्यरूपी बीजभावको प्राप्त होते हैं । तत्पश्चात् योनिसे जगत्में जन्म ग्रहण करते हैं । तदनन्तर वासना-प्रवाहके अनुसार अपने कर्मफलके भागी होते हैं । फिर शुभ और अशुभ
- माण्डव्य ऋषिकी कथा महाभारत, आदिपर्व, अध्याय १०६ में है।- १. जीवोंकी 'इदम्प्रथमता' आदि चौदह श्रेणियाँ आगे बतायी जायेंगी।