संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
वासनाओंसे युक्त पुण्य-पाप कर्मरूपी रस्सियोंसे जिनका लिङ्गशरीर बँधा है, ऐसे वे जीव घूमते हुए कभी उत्तम लोकोंमें जाते हैं और कभी नरकोंमें गिरते हैं।
जीवोंकी ये सब जातियाँ वासनारूप ही हैं। कितने ही जीव हजारों जन्मोंतक कर्मरूपी बवंडरमें पड़कर चक्कर काटते हुए जंगलके पत्तोंकी भाँति झड़ जाते हैं और पर्वतके कुक्षिभागमें लुढ़कते फिरते हैं। कितने ही जीव जिन्हें सच्चिदानन्दघन परमात्माका ज्ञान नहीं है, अतएव जो मोहित रहते हैं, वे असंख्य जन्म धारण करते हैं। चिरकालसे जन्म लेकर इस संसारमें सैकड़ों कल्पोंतक जन्म और मरणकी परम्परामें बँधे रहते हैं। कतिपय जीव, जिनके कई असुन्दर जन्मान्तर व्यतीत हो चुके हैं, वर्तमान जन्ममें शुभकर्मपरायण हो इस जगत्में विचरण करते हैं। कई जातिके जीव तत्त्वज्ञान प्राप्त करके उसी तरह परमपदको प्राप्त हो गये हैं, जैसे वायुसे उड़ाये हुए समुद्रके जलबिन्दु पुनः समुद्रके ही जलमें प्रवेश कर जाते हैं। इस प्रकार यहाँ परमपदरूप ब्रह्मसे सम्पूर्ण जीवोंकी गुण और कर्मके अनुसार उत्पत्ति (सृष्टि) हुई है। यह सृष्टि आविर्भाव और तिरोभावके कारण क्षणभङ्गुर है तथा जन्म-मरणकी परम्पराको प्रकट करनेवाली है। वासनारूपी विषकी विषमतासे उत्पन्न हुए नाना प्रकारके दुःखरूपी ज्वरको धारण करती है। अनन्त संकटोंसे भरे हुए अनर्थकारी कार्योंका समादर करनेवाली है। अनेक दिशाओं, देशों, कालों तथा विविध पर्वतोंकी कन्दराओंमें घुमानेवाली—कर्मफलका भोग करानेवाली है। स्वयं निर्मित उत्तम विचित्रताओंसे इसने चारों ओर भ्रमका जाल बिछा रक्खा है। परमार्थदृष्टिसे यह सृष्टि असत् ही है। वत्स रामभद्र ! विक्षुब्ध मन ही जिसका शरीर है, वह संसाररूपी जंगलकी जीर्ण-शीर्ण लता यदि तत्त्वज्ञानरूपी कुल्हाड़ीसे जड़सहित काट दी जाय तो फरसेसे काटी गयी बेलके समान यह फिर पनप नहीं सकती।
(सर्ग ९२-९३)
जीवोंकी चौदह श्रेणियाँ तथा परब्रह्म परमात्मासे ही उत्पन्न होनेके कारण सबकी ब्रह्मरूपता
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! सात्त्विक, राजस और तामस भेदसे सभी पदार्थ उत्तम, मध्यम और अधम—इन तीन श्रेणियोंमें विभक्त होते हैं। इनकी जो इधर-उधर विभिन्न भुवनोंमें उत्पत्तियाँ बतायी गयी हैं, उनका विभाग इस प्रकार है—बताता हूँ, सुनो। जिस जीवको अपने पूर्वजन्ममें शम, दम आदि समस्त साधन तथा गुण-सम्पत्ति प्राप्त होनेपर भी ज्ञान नहीं हुआ, वह जीव इसी जन्ममें ज्ञान-लाभके योग्य बनकर उत्पन्न होता है; अतः यही उसका प्रथम जन्म है। उस श्रेणीके जीवका वह जन्म 'इदं प्रथम' नामसे विख्यात होता है। यह इदम्प्रथमता पूर्व-जन्मके शुभ अभ्याससे प्रकट होती है। वही इदम्प्रथमता यदि पूर्वजन्ममें वैराग्यकी कमीके कारण शुभ लोकोंका आश्रय लेनेवाली रही हो अर्थात् उत्तम लोकोंकी प्राप्ति-के लिये किये गये शुभ कर्मोंसे संयुक्त हो और इसीलिये विचित्र संसार-वासनाके कारण भोग-व्यवहारवाली हो तो भोगोंसे वासनाका क्षय होनेपर वह कुछ ही जन्मोंमें मोक्षकी प्राप्ति करा देती है। अतः शान्ति आदि गुणोंसे युक्त होनेके कारण उस दूसरी जीव-जातिको 'गुण-पीवरी' कहते हैं।
श्रीराम ! नाना प्रकारके सुख-दुःखरूपी फलोंको देनेमें मुख्य कारणभूत पूर्वजन्मके पुण्य और पापका अनुमान करानेवाली जो जीवोंकी श्रेणी है, उसे पुण्यात्मा पुरुषोंने 'ससत्त्वा' कहा है (क्योंकि वह सत्त्वगुणकी वृद्धिके द्वारा मोक्षकी भागिनी होती है)। जो जीव-श्रेणी विचित्र संसारकी वासनाओंसे युक्त होकर अत्यन्त कलुषित हो गयी हो अर्थात् पूर्वजन्ममें संचित किये गये अधिक दुष्कर्मजनित दुर्वासनाओंसे मलिन हो गयी