भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 232, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 232

उत्पत्ति-प्रकरण ] * मनके द्वारा जगत्के विस्तार एवं त्रिविध आकाशका निरूपण * १९५

बन्धनसे रहित है, वह मुक्तिको प्राप्त होता है। मनके एकमात्र ब्रह्माकार होनेपर संसारका लय हो जाता है। यदि चित्तसे पृथक् जगत्की सत्ता होती तो जिसका चित्त लीन हो गया है, उस सम्पूर्ण प्राणिसमुदायकी दृष्टिमें सारे जगत्का लय क्यों हो जाता (अतः चित्तसे अतिरिक्त जगत् नहीं है)। जैसे एक ही काल विभिन्न ऋतुओंके कारण नाना रूपोंमें प्रकट होता है, उसी तरह एक ही मन विभिन्न कर्मोंके कारण विचित्र आकार धारण कर लेता और अनेक नामोंसे प्रतिपादित होता है। जैसे चेतन मकड़ीसे जड तन्तुकी उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार नित्य-प्रबुद्ध पुरुष परब्रह्म परमात्माके संकल्पसे जड प्रकृति एवं प्राकृत पदार्थ प्रकट होते हैं।
(सर्ग ९६)


मनके द्वारा जगत्के विस्तार तथा अज्ञानीके उपदेशके लिये कल्पित त्रिविध आकाशका निरूपण एवं मनको परमात्मचिन्तनमें लगानेकी आवश्यकता

श्रीरामचन्द्रजीने कहा—ब्रह्मन् ! आपके पूर्वोक्त कथनसे यह तात्पर्य प्रकट होता है कि यह जगत्रूपी आडम्बर मनसे ही आविर्भूत हुआ है। अतः यह जगत् मनका ही कार्य है।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—जैसे मरु प्रदेशका प्रचण्ड घाम अपनेमें मृगतृष्णारूपी जलका भ्रम ग्रहण करता है, उसी प्रकार दृढ़भावनासे अनुरञ्जित हुए मनने ही स्वयं-प्रकाश आत्मापर आवरण डालनेवाले जड जगत्को स्वीकार किया है। मैं ऐसा मानता हूँ कि विविध प्रकारके आचार-आकाश-प्रदेश, ग्राम और नगर आदिका रूप धारण करनेवाली विस्तृत आकृतिके द्वारा मन ही अपने स्वरूप-का विस्तार कर रहा है। ऐसी स्थितिमें शरीरोंके समुदाय तृण, काष्ठ और लता आदिके समान हैं। अतः उनके विचारसे कौन-सा प्रयोजन सिद्ध होगा। हमें तो इनके मूलभूत केवल मनका ही विचार करना चाहिये। मैं समझता हूँ कि यह सम्पूर्ण विस्तृत जगत् मनसे ही व्याप्त है। मनसे भिन्न तो केवल परमात्मा ही शेष रहते हैं। परमात्मा सर्वातीत, सर्वव्यापी और सर्वाधार हैं, परमात्माके ही प्रसादसे मन सम्पूर्ण संसारमें दौड़ लगाता एवं नाचता-कूदता है। मेरे मतमें मन ही क्रिया है और वही विभिन्न शरीरोंका कारण है। मन ही जन्म लेता और मरता है; क्योंकि ऐसे गुण (भाव-विकार) आत्मामें नहीं हैं। मेरी रायमें मन ही एक ऐसी वस्तु है, जिसका विचार करनेसे वह स्वयं विलीन हो जाता है। मनका विलय होनेमात्रसे परम श्रेय (मोक्ष) की प्राप्ति हो जाती है। भ्रम उत्पन्न करनेवाली मन नामकी क्रियाका क्षय होनेपर जीव मुक्त कहा जाता है। वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता है।

श्रीराम ! जिनका भीतरी भाग अत्यन्त विस्तृत है, ऐसे तीन आकाश विद्यमान हैं। पहला चित्ताकाश, दूसरा चिदाकाश और तीसरा भूताकाश। जो बाहर और भीतर परिपूर्ण है, जगत्की उत्पत्ति और विनाशका ज्ञाता है तथा सम्पूर्ण भूत-प्राणियोंमें व्यापक है; वह विज्ञानानन्दघन परमात्मा ही चिदाकाश कहलाता है। जो इन्द्रियो और महाभूतोंसे श्रेष्ठ है, कालकी कलना जिसका स्वभाव है और जिसने अपने संकल्पके द्वारा इस सम्पूर्ण जगत्का विस्तार किया है, वह समस्त प्राणियोंका हितकारी संकल्पात्मक मन ही चित्ताकाश कहा जाता है। दसों दिशाओंके मण्डलाकार विस्तारसे भी जिसका कलेवर सीमित नहीं होता तथा जो वायु और मेघ आदिका आश्रय है, वह भूतात्मक आकाश ही भूताकाश कहलाता है। भूताकाश और चित्ताकाश—ये दोनों परब्रह्म परमात्मरूप चिदाकाशकी शक्तिसे उत्पन्न हुए हैं। जैसे दिन अपनी संनिधिमात्रसे समस्त कार्य-